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जीवन कौशल शिक्षा : ऑल राउण्ड डवलपमैंट कर सकती हैं शिक्षा की ये विधि!
RNE Special
शिक्षा का मुख्य उद्देश्य बच्चों का सर्वागीण विकास करना होता है। सर्वागीण विकास में बौद्धिक (Intellectual) शारीरिक, सामाजिक एवं नैतिक विकास (Moral development) सम्मिलित है। लेकिन क्या शिक्षा ऐसा कर पा रही है? इस प्रश्न का उत्तर देने की शायद आवश्यकता नहीं होगी। क्योंकि हमारी सम्पूर्ण प्रणाली उद्घोष तो विद्यार्थी के ऑल राउण्ड डवलेपमैंट का करती है। लेकिन हमारी शिक्षा में बौद्धिक विकास को अपेक्षाकृत अधिक महत्व मिलने के कारण वह ऑल राउण्ड डवलेपमैंट को पूर्ण नहीं कर पा रही है। बदलती दुनियावी परिस्थितियों में जीवन जीने के कौशलों को सिखाने के साथ ही हम बच्चों का ऑल राउण्ड डवलपमैंट कर सकते हैं।
जीवन कौशल शिक्षा का विकासः
सम्पूर्ण विश्व में जीवन के व्यवहारिक परेशानियों एवं समस्याओं में कुशलता पूर्वक जीवन जीने के लिए जीवन कौशलों को सीखने की आवश्यकता को देखते हुए 1986 में, स्वास्थ्य संवर्धन के लिए ओटावा चार्टर ने बेहतर स्वास्थ्य विकल्प बनाने के संदर्भ में जीवन कौशल को मान्यता दी। 1989 के बाल अधिकार सम्मेलन (सीआरसी) ने जीवन कौशल को शिक्षा से जोड़ा यह कहते हुए कि शिक्षा को बच्चे की पूरी क्षमता के विकास की ओर निर्देशित किया जाना चाहिए। सभी के लिए शिक्षा पर 1990 के जोमटियन घोषणापत्र ने इस दृष्टिकोण को आगे बढ़ाया और जीवन कौशल को अस्तित्व, क्षमता विकास और जीवन की गुणवत्ता के लिए आवश्यक शिक्षण उपकरणों में शामिल किया। 2000 के डकार विश्व शिक्षा सम्मेलन ने यह रुख अपनाया कि सभी युवा लोगों और वयस्कों को ‘‘ऐसी शिक्षा से लाभ उठाने का मानव अधिकार है जिसमें जानना, करना, साथ रहना और होना सीखना शामिल है।
भारत के सन्दर्भ में जीवन कौशल शिक्षाः
1978 और 1988 के बीच, भारत ने राष्ट्रीय स्तर की शिक्षक शिक्षा के लिए पाठ्यक्रम रूपरेखाओं के विकास की शुरुआत की। राष्ट्रीय शिक्षक शिक्षा परिषद (NCTE)ने शिक्षक शिक्षा में एकीकृत पाठ्यक्रमों के अध्ययन की शुरुआत की।
राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसंधान और प्रशिक्षण परिषद (NCER) द्वारा प्रकाशित राष्ट्रीय पाठ्यचर्या रूपरेखा (NCF) ने शिक्षा को जीवन कौशल, वास्तविक दुनिया के काम और मूल्य शिक्षा से जोड़ने पर महत्वपूर्ण जोर दिया। इस रूपरेखा का उद्देश्य शिक्षक प्रशिक्षुओं को भविष्य के युवा मुद्दों को संबोधित करने के लिए जीवन कौशल तत्वों से परिचित कराना था। छब्थ् (2010) ने न केवल शिक्षण कौशल में सुधार करने के लिए बल्कि छात्रों और उनके समुदायों को समझने के लिए भी बच्चों, युवाओं और किशोरों के लिए विकास और सीखने के दृष्टिकोण पर जोर दिया, जिसमें उनकी समस्याएं भी शामिल हैं। हालांकि, यह ध्यान देने योग्य है कि कई भारतीय स्कूलों में मूल्य शिक्षा और जीवन कौशल शिक्षा के बीच भ्रम की स्थिति रही है। जबकि मूल्य शिक्षा को पाठ्यक्रम में शामिल किया गया है, NCF में उल्लिखित सिफारिशों के बावजूद जीवन कौशल शिक्षा पर कम ध्यान दिया गया है। एनसीएफ (2010) के जवाब में, केंद्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड (सीबीएसई) व अन्य राज्य के बोर्डो ने विभिन्न कक्षाओं में जीवन कौशल शिक्षा शुरू की। राष्ट्रीय शिक्षा नीति (एनईपी) 2020 भारतीय शिक्षा क्षेत्र के लिए एक ऐतिहासिक क्षण के रूप में उभरी। इस दृष्टिकोण से प्रेरित होकर कि शिक्षा को हमारी भावी पीढ़ियों के समग्र विकास पर ध्यान केंद्रित करने के लिए अकादमिक परिणामों से परे जाना चाहिए, नीति ने पाठ्यक्रम के हिस्से के रूप में जीवन कौशल को शामिल करने की सिफारिश की। वर्तमान में राजस्थान में भी कक्षा 11 के लिए इसका पाठ्यक्रम निर्धारित किया गया है। जिसका मूूल्यांकन विद्यालय स्तर पर ही होता है।
क्या होते है जीवन कौशलः
विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) के अनुसार “अनुकूली और सकारात्मक व्यवहार की क्षमताएं जो व्यक्तियों को रोजमर्रा की जिंदगी की मांगों और चुनौतियों से प्रभावी ढंग से निपटने में सक्षम बनाती हैं। जीवन कौशल कहलाती हैं।” यूनिसेफ ने जीवन कौशल को “एक व्यवहार परिवर्तन या व्यवहार विकास दृष्टिकोण के रूप में परिभाषित करता है जिसे तीन क्षेत्रोंः ज्ञान, दृष्टिकोण और कौशल के बीच संतुलन स्थापित करने के लिए डिजाइन किया गया है”। यूनिसेफ , यूनेस्को और डब्ल्यूएचओ ने दस मुख्य जीवन कौशल रणनीतियों और तकनीकों को समस्या-समाधान, आलोचनात्मक सोच, प्रभावी संचार कौशल, निर्णय लेने, रचनात्मक सोच, पारस्परिक संबंध कौशल, आत्म-जागरूकता निर्माण कौशल, सहानुभूति और तनाव और भावनाओं से निपटने के रूप में सूचीबद्ध किया है। इस प्रकार, प्रत्येक शिक्षा प्रणाली को अपने शिक्षार्थियों के बीच जीवन कौशल के विकास का समर्थन करना चाहिए ताकि वे समाज में प्रभावी ढंग से कार्य कर सकें।
क्या है जीवन कौशल शिक्षा :
जीवन कौशल शिक्षा जीवन हेतु जरूरी कौशलों का विभिन्न माध्यमों से विद्यार्थियों में विकास करना ही है। जिससे अंतर्गत बालक में अपने जीवन का उचित निर्वहन करने तथा जीवन से जुड़ी गतिविधियों को व्यवस्थित तरीके से संचालित करने की क्षमता विकसित की जाती है। इसी शिक्षा के माध्यम से विद्यार्थी को इस प्रकार दक्ष बनाया जा सकता है कि वह विषम परिस्थितियों में भी अपनी योग्यता और बुद्धि से निर्णय ले सके। ताकि वह एक कुशल जीवन जीता हुआ सुनागरिक और संवेदनशील मनुष्य बन सके।
क्या है जीवन के बुनियादी जीवन कौशलः
- स्वयं को समझना और स्वप्रबन्धनः- इस विस्तृत विषय अन्तर्गत आत्म सम्मान, स्व-जागरूकता, निश्चयात्मकता, तनाव का सामना करना, संवेदनशीलता के साथ जीना जैसे कौषल रखे जाते हैं।
- अन्यों को जानना व उनके साथ जीने का कौशलः- इसके अन्तर्गत प्रभावी सम्प्रेषण, अंतर्वैयक्तिक संबंध , समानुभूति व सहानुभूति व जीवन के विभिन्न संधर्ष और उनके समाधान रखे जाते हैं।
- समस्याओं और अन्य मुद्दों को हल करने का कौशलः- इसके अन्तर्गत समालोचनात्मक सोच, सृजनात्मक सोच, निर्णय लेने की क्षमताऔर समस्या समाधान जैसे जरूरी कौशल होते हैं।
क्यों जरूरी है जीवन कौशल शिक्षाः
बच्चों की शैक्षणिक, व्यावसायिक और सामाजिक सफलता यानी की सफल जीवन के लिए ‘‘जीवन कौशल शिक्षा’’ का दिया जाना जरूरी है। दरअस्ल जीवन कौशल विषय ही नहीं है वरन् जीवन जीने का तरीका है।
ये महत्वपूर्ण जीवन कौशल बच्चों को सिखाए जाने चाहिए ताकि वे ध्यान केंद्रित कर सकें और आत्म-नियंत्रण विकसित कर सकें। हस्तक्षेप से बच्चों के संचार कौशल, समझ क्षमताओं और सूचित निर्णय लेने और स्वायत्त सामाजिक संबंध स्थापित करने की क्षमता के विकास में मदद मिलेगी। विद्यार्थी जीवन में प्राप्त ये कौशल उनकी युवावस्था में आलोचनात्मक सोच से संबंधित संज्ञानात्मक क्षमताओं को बढ़ाता है और समस्या-समाधान कौशल के विकास में सहायता हेतु आवश्यक है।
क्यों नहीं हो पाया जीवन कौशल शिक्षा का सही विकासः
पाठ्यक्रम में विभिन्न विषयों के साथ इसका आरेखण होने के बावजूद भी इसका समुचित लाभ शिक्षा को नहीं मिल पाया है। इसका मुख्य कारण है कि जीवन कौशल शिक्षण और मूल्यांकन के विभिन्न पहलुओं पर शिक्षकों को पर्याप्त प्रशिक्षण के अभाव अपर्याप्त शिक्षण-शिक्षण संसाधन और शिक्षकों की कम तैयारी स्कूलों में जीवन कौशल शिक्षा (एलएसई) के सफल कार्यान्वयन में बाधा पैदा करने वाले रहे हैं। इसके साथ ही हमारी शिक्षण प्रणाली में अकादमिक योग्यता के प्रति अत्याधिक अनुराग व अभिभावकों का नम्बरों की दोड़ में अपने बच्चों को दोड़ाने की प्रवृत्ति ने भी जीवन कौशल शिक्षा के विकास को नुकसान पहुंचाया है।
कैसे किया जाए जीवन कौशलों का विकासः
1. एनईपी 2020 हेतु निर्धारित एनसीएफ 2023 में जीवन कौशल शिक्षा को पर्याप्त महत्व दिया गया है। लेकिन देखना यह जरूरी हो जाता है कि राज्यों द्वारा विकसित किये जा रहे पाठ्क्रमों में जीवन कौशल को कितना महत्व मिलता है। दरअस्ल जीवन कौशल अलग से विषय लगाना भी पढ़ाई के बोझ को बढ़ाना हो सकता है। इसके लिए जरूरी है कि जीवन कौशलों की अन्तर्वस्तुएं अन्य विषयो के साथ समाहित हों।
2. अभिभावकों, विद्यार्थियोें, शिक्षकों और संस्था प्रधानों की विषय को फालतू माने जाने वाली सोच में परिवर्तन किया जाना चाहिए।
3. जीवन कौशलों को संबोधित कर उन्हें पहचानने और मूल्यांकन हेतु विशिष्ट प्रकार के प्रशिक्षण की आवश्यकता है। इसके लिए शिक्षकों और संस्था प्रधानों को प्रशिक्षित किया जा सकता है।?
4. जीवन कौशलों के मापन हेतु एक समानान्तर प्रणाली का विकास किया जाए। जिससे विद्यार्थी इस विषय को अन्य विषय की तरह महत्व देवें।
5. कक्षा कक्ष में विभिन्न विषयों के अध्यापन के समय आवश्यकतानुसार रोल प्ले, समूह कार्य, प्रोजेक्ट वर्क, विभिन्न प्रकार के सामूहिक खेल इत्यादि गतिविधियां लगातार की जाएं। ताकि विद्यार्थी विषय के प्रति समझ बनाने के साथ-साथ आवश्यक जीवन कौशलों का प्रशिक्षण प्राप्त कर सके।
पाठ्यक्रम में अन्य विषयों की तरह महत्व दिया जाएः
यह कहना गलत नहीं होगा कि जीवन कौशल जीवन के लिए जरूरी ऐसे कौशल, सामथ्र्य और सक्षमताएं होती हैं जो मनुष्य को प्रतिदिन के जीवन में आने वाली समस्याओं का सकारात्मक अभिवृत्ति से सामना करना और इन मुद्दों का प्रभावशाली रूप में हल निकालना सिखलाती हैं। जीवन कौशल जीवन जीने के लिए आवश्यक क्षमताओं को मजबूत बनाते हैं और सरलता से आत्मविश्वास के साथ जीवन की समस्याओं का सामना करने में सहायता करते हैं। दरअस्ल जीवन कौशल व्यक्ति निर्णय लेने, प्रभावशाली रूप में सम्प्रेषण करने, और स्वस्थ और उत्पादनशील जीवन जीने के प्रबन्धन और समस्याओं का सामना करने के लिए विकास करने में सहायता करते हें । जीवन कौशल जैसे आत्मसम्मान, स्व-जागरूकता, निश्चिंता, तनाव का सामना, भावनाओं को झेलना आदि आपको, आपकी सामथ्र्य और कमजोरियों, आपके चरित्र और व्यक्तित्व को, आपके मूल्यों और सिद्धान्तों के साथ स्वयं को समझने के योग्य बना
सकते हैं। अतः इसका जीवन में महत्व अकादमिक विषयों से अधिक है। इसलिए इसे पाठ्यक्रम में अन्य विषयों की तरह महत्व दिया जाकर समावेशित किया जाना आवश्यक है।
डा.प्रमोद चमोली के बारे में:
शिक्षण में नवाचार के कारण राजस्थान में अपनी खास पहचान रखने वाले डा.प्रमोद चमोली राजस्थान के माध्यमिक शिक्षा निदेशालय में सहायक निदेशक पद पर कार्यरत रहे हैं। राजस्थान शिक्षा विभाग की प्राथमिक कक्षाओं में सतत शिक्षा कार्यक्रम के लिये स्तर ‘ए’ के पर्यावरण अध्ययन की पाठ्यपुस्तकों के लेखक समूह के सदस्य रहे हैं। विज्ञान, पत्रिका एवं जनसंचार में डिप्लोमा कर चुके डा.चमोली ने हिन्दी साहित्य व शिक्षा में स्नातकोत्तर होने के साथ ही हिन्दी साहित्य में पीएचडी कर चुके हैं।
डॉ. चमोली का बड़ा साहित्यिक योगदान भी है। ‘सेल्फियाएं हुए हैं सब’ व्यंग्य संग्रह और ‘चेतु की चेतना’ बालकथा संग्रह प्रकाशित हो चुके है। डायरी विधा पर “कुछ पढ़ते, कुछ लिखते” पुस्तक आ चुकी है। जवाहर कला केन्द्र की लघु नाट्य लेखन प्रतियोगिता में प्रथम रहे हैं। बीकानेर नगर विकास न्यास के मैथिलीशरण गुप्त साहित्य सम्मान कई पुरस्कार-सम्मान उन्हें मिले हैं। rudranewsexpress.in के आग्रह पर सप्ताह में एक दिन शिक्षा और शिक्षकों पर केंद्रित व्यावहारिक, अनुसंधानपरक और तथ्यात्मक आलेख लिखने की जिम्मेदारी उठाई है।
राधास्वामी सत्संग भवन के सामने, गली नं.-2, अम्बेडकर कॉलौनी, पुरानी शिवबाड़ी रोड, बीकानेर 334003