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आखाबीज बीकानेर: ‘भूतण को लूटा, डंडल को काटा, पटील से बधर गये पेच...

धूप को धता बता हजारों लोग छतों पर चढ़े, आसमान में नाच रही पतंगें!
 

RNE BIKANER 

बीकानेर के आकाश की रंगत देखकर कहा जा सकता है कि सूरज की इस शहरवासियों से ठन गई है। सूरज आगबबूबला हुआ धूप बरसा रहा है और बीकानेर के बाशिंदें झुलसाती धूप में भी छतों पर खड़े मांझे की डोर थामे हैं। नजर आकाश में उन पतंगों पर है जो उनकी अंगुली के इशारे से थिरक रही हैं। लगता है सूरज को खुली चेतावनी है कि ‘अपने धूप के बाण चला लो लेकिन हम टस से मस नहीं होने वाले। पूरे आकाश को पतंगों से ढंक देंगे।’

दरअसल आज रविवार को यह नजारा राजस्थान के बीकानेर शहर का है। यह शहर आज अपना स्थापना दिवस यानी वर्षगांठ मना रहा है। तपते रेगिस्तान के बीच बसे शहर में इस मौके पर झुलसाने वाली धूप और 40 से 45 डिग्री सेंटिग्रेड के बीच तापमान घूमता है लेकिन शहरवासियों के उत्साह को यह गर्मी डिगा नहीं पाती। अलसुबह से लोग लटाई, किन्ना लेकर छतों पर जा चढ़े हैं। आकाश में पतंगें सरसरा रही हैं और हर छत से गूंज रहा है ‘बोई काट्या है...।’ पतंगबाजों ने सिर पर टोपी, आंखों पर सन ग्लास लगाने के साथ ही गले में स्कार्फ डाल लिय है ताकि धूप से कुछ बचाव हो सके। दोपहर होते-होते हालांकि पतंगों का दौरा थोड़ा कम हुआ लेकिन इसकी जगह ’क्लासिक किन्नाबाजी’ यानी लंबी लड़त ने ले ली। जब ज्यादा पतंगें उड़ती है तो कोई भी, कभी भी, किसी से भी पेंच भिड़ा लेता है लेकिन दोपहर में जब कम पतंगें उड़ती हैं अलग-अलग छतों वालों के बीच ‘लड़त’ शुरू हो जाती है और ये आपस में ही एक-दूसरे कि ‘किन्ने’ काटने में जुट जाते हैं।
नाम जान हो जाएंगे हैरान:
इन सबके बीच छतों से जो नाम गूंज रहे हैं उन्हें सुनकर वे लोग हैरान रह सकते हैं जो बीकानेर की पतंगबाजी से नावाकिफ है। मसल, कभी गूंजता है डंडल ले.. तो कोई कहता है भूतण ले...। ये पतंगों के रंगों-डिजाइन के मुताबिक नाम है। इन नामों में पटील, मकड़ल, आंखल, पांखल, परियल, टीकल, मेणकी.. आदि-आदि शामिल हैं। कभी भूतण लूटते हैं तो कभी डंडल काटते हैं। कभी पटील से पेच बधर जाते हैं तो कभी आंखल ‘टीकी-टीकी’ हो जाती हैं।
नाम सिर्फ डिजाइन और रंग के आधार पर ही नहीं होते वरन पतंग की साइज और बनावट भी इस पर असर डालती है। मसलन, छोटी पतंग टकलड़ी, इससे थोड़ी बड़ी हो तो दुलड़ी, फैला हुआ तिग्गा, ‘ए-फोर‘ साइज में चौगा। इससे बड़ी पतंगों को राजा पतंगें कहा जाता है जिनमें अधा, पूणिया शामिल हैं। इसी तरह अगर इनके नीचे छोटी-सी पूंछ लगी हो तो ये फिमेल पतंगें हो जाती है। इनमें छोटी हो तो ‘किन्नी’ और साइज बड़ा होते ही हो जाती है ‘छरी’।
लूटना भी आनंददायी:
पतंग उड़ाना जितना उत्साहजनका होता है उससे कहीं अधिक आनंददायी है पतंग लूटना। कई लोग ऐसे हैं जो इस दिन सिर्फ पतंग लूटते हैं। लूटने के लिए चाहे उन्हें सड़क पर दौड़ना पड़े या छते पर लंबी छड़ी का उपयोग करना पड़े वे किसी सूरत में नहीं चूकते। इस लूट को कई लोग शुभ शगुन भी मानते हैं। ऐसे में कटकर खुद ब खुद छत पर आ गिरने वाली एकाध पतंग को कुछ लोग संभालकर भी रखते हैं।
कई दिनों से चल रही तैयारी:
दरअसल यह जो छतों पर उत्साह दिख रहा है इसकी तैयारी कई दिनों से चल रही है। पतंगों का बाजार सजा है। बरेली से लेकर जयपुर, दिल्ली तक से पतंगें डोर बीकानेर पहुंची है। बीसियों अस्थायी दुकानें लगी हैं। बीती दो रातों से ये दुकानें रात-रातभर खुली रही है और लटाई में मांझा-सादी चढ़ती रही है।

आरएनई अपील: परिंदों का रखें ख्याल, चाइनीज मांझा न उपयोग लें: 
इस उत्साह के बीच कुछ दर्दनाक और चिंताजनक बातें भी सामने आती है। बाइक पर पिता के साथ जा रहे आठ वर्षीय बच्चे की पतंग के मांझे से गर्दन कटने और मौत होने के मामले ने पूरे बीकानेर को झकझोर दिया है। बीसियों लोग पतंग के मांझे से घायल होकर हॉस्पिटल पहुंच रहे हैं। अति उत्साह में कई बच्चे छतों से गिर जाते हैं या चोट लग जाती है। परिंदों के पर कट रहे हैं। बिजली के तारों में मांझा उलझने से बिजली तो बंद हो ही जाती है कई बार धातु मिला धागा उपयोग करने से करंट का खतरा भी रहता है। ऐसे में ‘रूद्रा न्यूज एक्सप्रेस’ पतंगबाजों से अपील करता है कि पूरे उत्साह से यह यह त्यौहार मनाए लेकिन सावधानी बरतें ताकि खुद को नुकसान न हो ना ही किसी और को नुकसान पहुंचाएं।