साहित्य के क्षेत्र में अनेक लोगों को पुरस्कार अर्पित किए गए
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देश के प्रख्यात विचारक, आलोचक और कथाकार प्रो. पुरुषोत्तम अग्रवाल ने कहा है कि आज कबीर को किसी संत, अवतार या देवता की बजाय कवि के रूप में जानने-समझने की आवश्यकता है। उन्होंने अपने काव्य के माध्यम से जो संदेश दिये हैं, वे तर्क के साथ दिए हैं। यही उनकी सबसे बड़ी खूबी है।
वे रविवार शाम को यहां नोजगे ऑडिटोरियम में सृजन सेवा संस्थान एवं नोजगे पब्लिक स्कूल की ओर से आयोजित व्याख्यान ‘कबीर: तब और अब’ विषय पर संबोधित कर रहे थे। उन्होंने कहा कि कबीर आडम्बरों का विरोध करते हैं। वे भक्ति का वास्तविक रूप प्रस्तुत करते हैं। कबीर बताते हैं कि भक्ति का अर्थ केवल समर्पित हो जाना नहीं है। भक्ति का अर्थ भागीदारी भी है। तर्क के साथ जिम्मेदारी भी है। प्रो. पुरुषोत्तम अग्रवाल ने माना कि कबीर अपने समय में जितने प्रासंगिक थे, उतने ही प्रासंगिक आज भी हैं। वे तब भी निडर होकर आडम्बरों का विरोध करते थे और उनकी वाणी आज भी पाखंडों का तर्कपूर्ण तरीके से विरोध करती है। वे तर्क को महत्व देते हैं, वे अपनी जो भी बात कहते हैं, वह तर्क के साथ मजबूती से कहते हैं।
प्रो. अग्रवाल ने कहा कि कबीर ने तब भी तर्क रखा था और आज भी तर्क की ही आवश्यकता है। कबीर तब भी भक्ति को आडंबरों से बचाना चाहते थे और उसे भागीदारी के असली अर्थ तक पहुंचाना चाहते और आज भी भक्ति आडंबरों और असमानताओं की भारी शिकार है। उन्होंने रेखांकित करते हुए कहा कि आज तो मूर्खता का स्वर्णकाल है और व्यक्ति मूर्ख घोषित होने में गर्व का अनुभव कर रहा है। कबीर इसलिए अब और ज्यादा अनिवार्य हो जाते हैं ताकि व्यक्ति का बाहर भीतर एक हो सके और उसमें संतुलन बन सके।
प्रो. अग्रवाल ने क्षेत्रीय भाषाओं के महत्व पर बहुत जोर दिया और कहा कि इन भाषाओं में बहुत मूल्यवान बातें कही गई हैं। उन्होंने अनेक उदाहरण दिए जिनमें गीता और राम कथा को इन भाषाओं में रचा गया। प्रो. पुरुषोत्तम अग्रवाल ने कहा कि हमारे वेदों में कहा गया है कि जो कुछ अच्छा है, वह हम तक पहुंचना चाहिए। इसलिए औपनिवेशिकता के नाम पर बेहतर विचार या तकनीक को भी स्वीकार न करना संकीर्ण मानसिकता का द्योतक है। उन्होंने अपने व्याख्यान में वेदों और उपनिषिदों से शुरू करके आधुनिक समय तक की विस्तार से चर्चा की।
कबीर की वाणी ‘तू कहता कागज की लेखी, मैं कहता आंखिन की देखी’ का उदाहरण देते हुए डॉ. पुरुषोत्तम अग्रवाल ने कहा कि खाली सोशल मीडिया पर अनर्गल प्रलाप कर देने से कोई बात सिद्ध नहीं हो जाती। अनुभव सबसे बड़ी चीज है और कबीर जो भी कहते हैं, वह उसी अनुभव के सहारे कहते हैं। कबीर ने इस समाज को एक दिशा दी है। वह दिशा तब भी सार्थक थी और आज भी सार्थक है।
इससे पहले नोजगे पब्लिक स्कूल के प्रबंध निदेशक डॉ. पीएस सूदन और सृजन के अध्यक्ष डॉ. अरुण शहैरिया ‘ताइर’ ने प्रो. अग्रवाल का अभिनंदन किया। सचिव कृष्णकुमार आशु ने कार्यक्रम की रूपरेखा पर प्रकाश डाला और कहा कि सृजन प्रेम और भाईचारे के लिए सतत प्रत्यनशील है और रहेगा। मंच संचालन कार्यक्रम संयोजक डॉ. संदेश त्यागी ने किया। कार्यक्रम में सभी वर्गों और समुदायों से संबंधित पांच सौ से अधिक लोग मौजूद थे। इनमें साहित्य, कला, संस्कृति, शिक्षा, वकालत, व्यापारिक और विभिन्न सामाजिक संगठनों से जुड़े लोग शामिल थे।
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पंद्रह साहित्यकारों को मिले सृजन सम्मान:
कार्यक्रम में सृजन सेवा संस्थान की ओर से शब्दशिल्पियों के सम्मान में वार्षिक समर्पित अर्पित किए गए। इनमें इस वर्ष से नलिन शर्मा के सौजन्य से शुरू किया गया इक्कीस हजार रुपए का पहला राकेश शरमा सृजन शिखर सम्मान प्रो. पुरुषोत्तम अग्रवाल को अर्पित किया। इसी के साथ ग्यारह-ग्यारह हजार रुपए की सम्मान राशि के काव्य विधा का कृष्ण कक्कड़ के सौजन्य से शिक्षक ‘निमित्त’ काव्य सृजन सम्मान कैलाश मनहर (मनोहरपुरा, जयपुर) को, डीडी शर्मा के सौजन्य से ललित-कृष्ण कथा सृजन सम्मान मनीषा कुलश्रेष्ठ (जयपुर) को, डॉ. अरुण शहैरिया ‘ताइर’ के सौजन्य से मेजर ओ.पी. शहैरिया गजल सृजन सम्मान शायर जिया टोंकी (टोंक) को, डॉ. पीएस सूदन के सौजन्य से माता नामदेवी व्यंग्य सृजन सम्मान शांतिलाल जैन (उज्जैन) को तथा आनंद मायासुत के सौजन्य से माया-मोहन आलोक राजस्थानी सृजन सम्मान डॉ. मदन सैनी (बीकानेर) को दिए गए। इसी तरह 5100-5100 रुपए का आलोचना-निबंध विधा पर प्रहलादराय टाक के सौजन्य से देय सुरजाराम जालीवाला आलोचना सृजन सम्मान डॉ. अन्नाराम शर्मा (बीकानेर) को, बाल साहित्य पर संदीप-नीरज बॉबी अनेजा के सौजन्य से शिक्षक सुभाष अनेजा बाल साहित्य सृजन सम्मान सत्यनारायण ‘सत्य’ (रायपुर, भीलवाड़ा) को, साहित्यिक पत्रकारिता पर अमित नागपाल के सौजन्य से कमल नागपाल साहित्यिक पत्रकारिता सृजन सम्मान-कथादेश, सम्पादक हरिनारायण (नई दिल्ली) को, अनुवाद पर द्वारकाप्रसाद नागपाल के सौजन्य से श्रीमती शांतिदेवी नागपाल अनुवाद सृजन सम्मान डॉ. ओपी तिवारी (श्रीगंगानगर), महिला साहित्यकार को अंशुल-नेहा आहुजा व यशस्विनी-विपुल वधवा के सौजन्य से माता रामदेवी वागीश्वरी सृजन सम्मान मोनिका गौड़ (बीकानेर) को, युवा रचनाकार को अर्शरूपसिंह के सौजन्य से सरदार भूपेंद्रसिंह प्रोत्साहन सृजन सम्मान पूनम चौधरी (बीकानेर) को, राजस्थानी बाल साहित्य पर दानिश भाटिया के सौजन्य से गीता-योगराज भाटिया राजस्थानी बाल साहित्य पुरस्कार पवन पहाड़िया (डेह, नागौर) को तथा आनंद टाक के सौजन्य से सुरजाराम जालीवाला राजस्थानी सृजन सम्मान कुमार अजय (चूरू) को दिया गया। हनुमानगढ़ निवासी नरेश मेहन के सौजन्य से 3100 रुपए का कान्ता-कृष्ण मेहन महाविद्यालयी सृजन पुरस्कार टांटिया यूनिवर्सिटी के शिक्षा संकाय में अध्ययनरत सोनपाल सूडा को दिया गया। इन सभी को शॉल ओढ़ाकर, सम्मान पत्र एवं पुस्तक के साथ सम्मान राशि के चैक देकर सम्मानित किया गया। हरिनारायण, पवन पहाड़िया एवं डॉ. ओपी तिवारी के सम्मान क्रमशः सुरेंद्र सुंदरम, अरुण उर्मेश एवं डॉ. घनश्याम त्रिपाठी ने ग्रहण किए।