Bikaner : लूणकरणसर-खाजूवाला को छोड़ बीकानेर निगम सहित जिले की किसी पालिका में भाजपा को बहुमत नहीं
Rudra News Express Bikaner.
बीकानेर नगर निगम के चुनाव में कांग्रेस को भारी जीत मिली है। निगम के 80 वार्डों में से 01 में निर्विरोध जीत दर्ज कर बढ़त के साथ चुनाव मैदान में उतरी भाजपा को यहां मुंह की खानी पड़ी है। पार्टी की निवर्तमान मेयर सुशीला कंवर चुनाव हार गई वहीं तीन बार के पार्षद किशोर आचार्य, वरिष्ठ नेता मोहन सुराणा की पत्नी मधु सुराणा सहित कई दिग्गज चुनाव हार गए। जिस वार्ड में महावीर रांका का ‘टिकट कट’ प्रकरण हुआ था वहां भी भाजपा को हार का मुंह देखना पड़ा।
यह महज बीकानेर नगर निगम क्षेत्र की है। बात जब पूरे जिले की करें तो लूणकरणसर में जहां भाजपा को 35 में से 23 सीटों के साथ जबरदस्त जीत मिली है वही खाजूवाला में बोर्ड बनाने लायक स्पष्ट बहुमत मिल गया। नापासर में बहुमत से दूरी है वहीं श्रीडूंगरगढ़, नोखा, देशनोक पालिका में बुरी हार का सामना करना पड़ा है।
ऐसे में बीकानेर में जितनी चर्चा कांग्रेस की जीत की हो रही है उससे ज्यादा चर्चा भाजपा की हार पर हो रही है। इसकी कई वजह यह है। पहली ये केन्द्रीय मंत्री अर्जुनराम मेघवाल का शहर है खुद उनका वोट भी बीकानेर नगर निगम क्षेत्र में हैं। इतना ही नहीं वे पूरी तरह चुनाव में जुटे हुए थे और टिकट वितरण की रणनीति से लेकर जयपुर में टिकट फाइनल होने तक की मीटिंग में रहे।
बीकानेर से पार्षदों को जिताने के लिए मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा खुद सड़क पर उतरे और शहर की गलियांे में घूमे। इस शहर के दोनों विधायक भाजपा के हैं। इनमें बीकानेर पश्चिम के विधायक जेठानंद व्यास और पूर्व की विधायक सिद्धीकुमारी है। ऐसे में शुरुआत से ही भाजपा बढ़त लेती दिख रही थी। यही वजह है कि जितनी चर्चा कांग्रेस की जीत की होनी चाहिए उससे ज्यादा चर्चा बीजेपी की हार की रही।
आपस में लड़ती रही भाजपा:
यहां हार की सबसे बड़ी वजह बीजेपी से बीजेपी की लड़ाई सामने आती है। टिकट वितरण में नेताआंे के बीच तालमेल की कमी साफ दिख रही थी और कई वार्डो में टिकट का फैसला जयपुर से लेकर दिल्ली तक जाकर हुआ। महावीर रांका टिकट प्रकरण इसका जीता-जागता उदाहरण है।
महावीर रांका प्रकरण हावी रहा:
महावीर रांका को वार्ड संख्या 75 से टिकट की हरी झंडी मिली और उन्होंने नामांकन दाखिल कर दिया। इसके बाद टिकट विशाल गोलछा को दिया गया। बताया जाता है कि इसके लिए दिल्ली तक बात पहुंची। नतीजा, रांका के समर्थक गोलछा को हराने में जुट गए और कांग्रेस के धर्मवीर नाहटा को यहां जीत मिली।
इतना ही नहीं रांका और मोहन सुराणा की भाजपा में प्रतिद्वंद्विता जग जाहिर है। मोहन सुराणा की पत्नी मधु सुराणा वार्ड 28 से भाजपा प्रत्याशी बनी। यह वार्ड महावीर रांका का भी। रांका अलग वार्ड से मैदान में उतरने वाले थे लेकिन टिकट प्रकरण के बाद माहौल बदला और वैश्य बाहुल्य भाजपा का गढ़ माने जाने वाले इस वार्ड से भाजपा की मधु को निर्दलीय लक्ष्मी कातेला के हाथों हार का मुंह देखना पड़ा।
गंगाशहर से जुड़े दूसरे वार्डों में भी यह असर साफ दिखा। वार्ड संख्या 26 में शिवकुमार रंगा को टिकट फाइनल होने और कटने के प्रकरण के बीच वहां भाजपा को हार देखनी पड़ी। दरअसल वैश्य समाज से जुड़े कुछ लोगांे ने रांका प्रकरण को नाक का सवाल बनाया और जहां तक संभव हुआ हर जगह भाजपा के खिलाफ वोट दिए। इसका असर शहर के कई वार्डों में साफ दिखा।
मेयर चुनने में जुटी भाजपा पार्षदों को भूली:
दरअसल भाजपा इस चुनाव में अपनी जीत मारकर चल रही थी और पहले दिन से मेयर की तलाश या मेयर बनने की चाह वाले कैंडीडेट्स की बाढ़-सी आ गई। परआपाधापी में यह भी भूल गए कि जिस वार्ड में मेयर के प्रत्याशी उतार रहे हैं वहां के स्थानीय कार्यकर्ता जो सालों से मेहनत कर रहे हैं उनको टिकट नहीं मिलने से निराशा होगी। शहर में जगह-जगह दूसरे वार्डों के बड़े चेहरे उतरे। इनमें से कई जीते, कई हारे लेकिन कार्यकर्ता का जमीनी उत्साह कम हो गया।
क्या सुशीला कंवर की हार, भाजपा के बोर्ड के खिलाफ जनादेश:
भाजपा की निवर्तमान मेयर सुशीला कंवर पार्षद का चुनाव हार गई। सुशीला मेयर बनने से पहले राजनीति में नहीं थी। उनके ससुर गुमानसिंह भाजपा के वरिष्ठ नेता है। वे पहले देवीसिंह भाटी के खास हुआ करते थे। सामाजिक न्याय मंच में भी गए। बाद में अर्जुनराम मेघवाल के संपर्क-समर्थन से भाजपा की मुख्यधारा में लौटे। भाजपा में वापसी के साथ उनकी पुत्रवधू को मेयर बनाया गया।
इस चुनाव से ही पार्टी का मूल कार्यकर्ता काफी निराश था वहीं भाजपा बोर्ड के कार्यकाल मेंकई विवाद भी रहे। शहर के बिगड़े हालात को लेकर पूरे पांच साल चर्चाएं चलती रही। सीवरेज के काम की खराब क्वालिटी, टूटी सड़कें, वार्डों मेंअसमान बजट वितरण आदि के आरोप लगे। हालांकि सुशीला फिर पार्षद बनने के लिए मैदान में उतरी लेकिन उन्हें कांग्रेस की किरण भाटी से हार का सामना करना पड़ा। ऐसे में एक सवाल यह भी है कि क्या भाजपा के बोर्ड के कार्यकाल के खिलफ यह जनादेश रहा!
अध्यक्ष गौण, अपने वार्ड में हार :
बीकानेर शहर में भाजपा ने पहली महिला अध्यक्ष सुमन छाजेड़ को बनाया। यह बनाना भी एक विवाद का समाधान था। दरअसल महावीर रांका और मोहन सुराणा दोनों अध्यक्ष पद के दावेदार थे। पार्टी किसी वैश्य को अध्यक्ष बनाने का मन बना चुकी थी। ऐसे में इन दोनां के बीच का रास्ता सुमन छाजेड़ के रूप में निकाला गया। दरअसल सुमन छाजेड़ इससे पहले पार्षद रही और सामान्य महिला मेयर की सीट होने से वे मेयर पद की भी दावेदार रही थी। ऐसे में उस वक्त मेयर नहीं बना पाते की पूर्ति करने के साथ ही सुमन को अध्यक्ष बनाकर वैश्य समाज को साधने और पहली महिला अध्यक्ष बनाने का संदेश दिया गया।
इससे इतर जमीनी स्थिति यह है कि अध्यक्ष के तौर पर छाजेड़ की संगठन पर कोई खास पकड़ अब तक नजर नहीं आई। अलगस-अलग नेता, विधायक, पूर्व अध्यक्ष, पूर्व महामंत्री अलग-अलग प्रतिनिधिमंडलों के साथ प्रशासन से मिलते नजर आ रहे हैं। इन सबका नतीजा यह हुआ कि खुद अध्यक्ष सुमन छाजेड़ के वार्ड में बीजेपी को हार का मुंह देखने पड़ा। यहाँ हैरानी की बात यह है कि इस वार्ड में पहली बार बीजेपी को हार मिली है।
नेता अपने-अपने प्रत्याशियों के साथ जुटे:
अधिकांश विधायक, नेता सिर्फ उन प्रत्याशियों के लिए ही जोर आजमाइश करते दिखे जिन्हें उन्होंने खुद अपनी पहल से टिकट दिलवाया। कई बार नेता एक ही गली में वार्ड के एक तरफ वाले भाजपा प्रत्याशी के लिए वोट मांगने निकले जबकि दूसरी तरफ उनके खास माने जाने वाले समर्थक खुलकर भाजपा को हराने में जुट गए।
सबसे महत्वपूर्ण बात, मूल कार्यकर्ता हताश:
भाजपा की बीकानेर में हार का सबसे मूल कारण कोई बताया जाए तो वह है इस चुनाव में भाजपा का मूल कार्यकर्ता खास उत्साहित नजर नहीं आया। सांसद से पार्षद तक चुनावों में मूल कार्यकर्ता को पन्ना प्रमुख से लेकर बूथ एजेंट तक का ही दायित्व मिलता रहने और बड़े चेहरों को कार्यकर्ता के ऊपर थोपने का आखिर धीरे-धीरे असर यह हुआ कि अधिकांश जगह कार्यकर्ता बाकी बन मैदान में उतर गए, चुप्पी साध ली या वार्ड स्तर पर पार्टी को महत्व नहीं देते हुए किसी निर्दलीय या दूसरे दल के साथ हो गए।