Bikaner Municipal Election : 22 हजार वोट ज्यादा और 15 सीटों की बढ़त! क्या बीकानेर में कांग्रेस की वापसी !
Rudra News Express Bikaner.
बीकानेर नगर निगम चुनाव का नतीजा कांग्रेस के लिए इसलिए चौंकाने वाला है क्योंकि जिस पार्टी का चुनावी अभियान शुरू होने से पहले ही भीतर से बिखरा हुआ दिखाई दे रहा था, उसी कांग्रेस ने मतदान के बाद भाजपा को करारी शिकस्त दे दी। चुनाव की शुरुआत ही उसके लिए अच्छी नहीं रही।
वार्ड 69 में भाजपा प्रत्याशी लीला गहलोत निर्विरोध निर्वाचित हो गईं और कांग्रेस चुनाव शुरू होने से पहले ही एक सीट गंवा बैठी। इसके बाद चुनावी माहौल में कांग्रेस की अंदरूनी कलह लगातार सुर्खियों में रही।
खुद से भिड़ रही थी कांग्रेस :
हालात यहां तक पहुंचे कि पार्टी के वर्तमान अध्यक्ष मदन गोपाल मेघवाल पर कांग्रेस कार्यकर्ताओं द्वारा हमला कर दिया गया। बात आपसी मुकदमेबाजी तक पहुंची। पार्टी के एक पूर्व अध्यक्ष का ऑडियो भी सामने आया, जिसे वर्तमान अध्यक्ष के खिलाफ साजिश के तौर पर देखा गया। पार्टी की महिला अध्यक्ष की भूमिका को लेकर भी जांच शुरू की गई।
यानी चुनाव के दौरान भाजपा से ज्यादा कांग्रेस अपने ही घर के विवादों से जूझती दिखाई दी। ऐसे में सवाल उठता है कि इन अंतर्विरोधों के बावजूद ऐसा क्या हुआ कि नतीजों में यही कांग्रेस 42 सीटें लेकर सबसे बड़ी ताकत बनकर उभरी? यहाँ एक महत्वपूर्ण बात यह है कि इतने बड़े घटनाक्रम के बाद भी कांग्रेस अध्यक्ष मदनगोपाल मेघवाल ने हौसला नहीं छोड़ा और पार्टी के भीतर छिड़ी इस जंग को लड़ते हुए भी मैदानी जंग में कमजोर नहीं दिखे।
22 हजार वोट ज्यादा और 15 सीटों की बढ़त :
वार्डवार परिणामों का गणित कांग्रेस की इस जीत की तस्वीर और साफ करता है। कांग्रेस प्रत्याशियों को कुल 1,18,869 वोट मिले, जबकि भाजपा प्रत्याशियों के खाते में 96,360 वोट आए। यानी कांग्रेस ने भाजपा से 22,509 वोट ज्यादा हासिल किए। सीटों में यह अंतर और बड़ा दिखाई दिया। कांग्रेस ने 42 वार्ड जीते, जबकि भाजपा 27 वार्डों में सिमट गई। यानी कांग्रेस ने भाजपा से 15 पार्षद ज्यादा जिताए। सिर्फ भाजपा और कांग्रेस को मिले वोटों को आधार मानें तो कांग्रेस की हिस्सेदारी 55.23 प्रतिशत रही, जबकि भाजपा 44.77 प्रतिशत पर रही।
ये है वोट और सीट शेयर :
कांग्रेस : 1,18,869 वोट - 42 सीट
भाजपा : 96,360 वोट -27 सीट
वोटों का अंतर : 22,509
सीटों का अंतर : 15
वार्डवार परिणाम में कई जगह कांग्रेस की जीत का अंतर भी खासा बड़ा रहा। वार्ड 38 में छेल सिंह को 3,535 वोट मिले, वार्ड 55 में जावेद पडिहार को 3,928, वार्ड 62 में अकबर अली को 3,445 और वार्ड 77 में राहुल कुमार को 3,901 वोट मिले। मतलब यह कि ज्यादा वोट मिलने में कुछ वार्डों का असर ज्यादा है लेकिन ज्यादा जीत का मतलब यह है कि हर वार्ड में हिस्सेडायरी बधाई है।
चुनाव शुरू हुआ तो कांग्रेस मुश्किल में थी :
इस परिणाम को इसलिए सामान्य जीत नहीं माना जा सकता क्योंकि चुनाव की शुरुआत में कांग्रेस की स्थिति बेहद असहज दिखाई दे रही थी। टिकट वितरण से लेकर प्रत्याशियों के चयन तक असंतोष सामने आया। कई जगह बागी मैदान में उतरे। संगठन के भीतर खींचतान की खबरें आती रहीं। ऊपर से पार्टी के भीतर अध्यक्ष को लेकर विवाद सड़क तक पहुंच गया।
कार्यकर्ताओं के बीच टकराव, मारपीट और मुकदमेबाजी ने कांग्रेस की चुनावी तैयारी पर सवाल खड़े किए। एक पूर्व अध्यक्ष से जुड़ा कथित ऑडियो सामने आने के बाद विवाद और गहरा गया। महिला अध्यक्ष की भूमिका की जांच की चर्चा ने भी संगठन की मुश्किलें बढ़ाईं। ऐसे माहौल में कांग्रेस के सामने भाजपा से लड़ने से पहले अपने भीतर के संकट को संभालने की चुनौती थी।
..बीडी कल्ला ने संभाला फ्रंट :
यहीं पूर्व मंत्री डॉ. बी.डी. कल्ला की भूमिका महत्वपूर्ण हो जाती है। 10 विधानसभा चुनाव लड़ चुके कल्ला के पास चुनावी राजनीति का लंबा अनुभव है। उन्होंने शुरुआती दौर में ही दो चीजें पहचान लीं। एक, भाजपा के खिलाफ जमीन पर एंटी इनकंबेंसी का भाव मौजूद है; और दूसरा, कांग्रेस खुद इतनी कमजोर और बंटी हुई है कि इस नाराजगी को अपने पक्ष में बदलना आसान नहीं होगा।
यानी कांग्रेस के सामने दो मोर्चे थे। एक तरफ भाजपा और दूसरी तरफ कांग्रेस की अपनी अंदरूनी फूट। कल्ला के सामने सबसे बड़ी चुनौती यही थी कि पार्टी के भीतर सड़क पर आ चुकी फूट के गड्ढों को चुनाव से पहले कैसे भरा जाए। यही वजह है कि अध्यक्ष मदन गोपाल मेघवाल, पूर्व अध्यक्ष यशपाल गहलोत सहित पार्टी के नेताओं को एक जाजम पर बिठाया। साथ लेकर चुनावी मैदान में उतरे। यहाँ
गली-गली घूमे, अपने घर से भी प्रत्याशी उतारा :
कल्ला ने चुनाव को सिर्फ संगठन के भरोसे छोड़ने के बजाय खुद मैदान में उतरना चुना। वे गली-गली घूमे, कार्यकर्ताओं और मतदाताओं से संपर्क किया और कांग्रेस के पक्ष में माहौल बनाने की कोशिश की। यहां तक कि अपने परिवार से भतीजे अनिल कल्ला को भी चुनाव मैदान में उतारा।
संदेश साफ था कि वे चुनाव को गंभीरता से ले रहे हैं और पार्टी के लिए व्यक्तिगत रूप से भी मैदान में उतरने को तैयार हैं। धीरे-धीरे कांग्रेस के भीतर बिखरे खेमों को एक मंच पर लाने की कोशिश हुई। यह प्रयास कितना सफल रहा, इसका सबसे बड़ा प्रमाण परिणाम है।
वोटिंग आते-आते बदल गया चुनाव का माहौल :
शुरुआत में जिस चुनाव में कांग्रेस अपनी ही अंदरूनी लड़ाई में उलझी दिखाई दे रही थी, मतदान नजदीक आते-आते उसका माहौल बदलने लगा। कांग्रेस का प्रचार ज्यादा आक्रामक हुआ। स्थानीय मुद्दे सामने आए। पुराने कार्यकर्ता सक्रिय हुए। जिन वार्डों में कांग्रेस को कमजोर माना जा रहा था, वहां भी मुकाबला जीवंत होने लगा। जब ईवीएम खुलीं तो तस्वीर शुरुआती चुनावी धारणा से बिल्कुल अलग निकली। कांग्रेस 42 सीटों के साथ सबसे बड़े दल के रूप में सामने आई। भाजपा, जिसने संगठनात्मक स्तर पर 80 में से सभी वार्डों में प्रत्याशी उतारे थे, 27 सीटों पर रुक गई।
कुछ वार्डों के नतीजे ने चौंकाया :
कांग्रेस की जीत का सबसे महत्वपूर्ण पहलू सिर्फ 42 सीटों की संख्या नहीं है। असली संकेत उन वार्डों में छिपा है जहां पार्टी लंबे समय से जीत की तलाश में थी और इस बार उसने वहां भी सेंध लगाई। शहर भाजपा अध्यक्ष सुमन छाजेड के वार्ड में भाजपा पहली बार जीती। महावीर सुराणा की पत्नी मधु सुराणा को उसी वार्ड में हराया जो भाजपा का गढ़ माना जाता है। इसका मतलब यह है कि कांग्रेस का वोट केवल अपने पारंपरिक इलाकों तक सीमित नहीं रहा।
कांग्रेस की वापसी या भाजपा के लिये खतरे की घंटी से ज्यादा वोटों का बंटवारा :
हालांकि ये कांग्रेस के लिये उत्साहित करने वाले और भाजपा के लिये खतरे की घंटी वाले आंकड़े है लेकिन इन नतीजों को क्या बीकानेर में कांग्रेस की वापसी कहना अभी जल्दबाजी होगा। सांसद, विधायक के चुनाव हार चुकी कांग्रेस की वापसी नहीं तो कम से कम एकबारगी उत्साह का माहौल जरूर बना है। वापसी इसलिये नहीं कह सकते क्योंकि निर्दलीय और बागियों को मिले वोट चौंकाने वाले हैं। ये दोनों दलों के लिये अलारमिंग है।
कल्ला का ‘फ्रंट’ कितना काम आया?
कांग्रेस की इस जीत का श्रेय केवल किसी एक नेता को देना भी सही नहीं होगा। लेकिन चुनाव के सबसे मुश्किल दौर में डॉ. बी.डी. कल्ला का फ्रंट पर आना निश्चित रूप से कांग्रेस के लिए महत्वपूर्ण राजनीतिक घटनाक्रम रहा। उन्होंने भाजपा के खिलाफ मौजूद नाराजगी को पहचाना और यह भी समझा कि अगर कांग्रेस अपने भीतर के झगड़े खत्म नहीं करती तो यह नाराजगी उसके खाते में नहीं आएगी।उन्होंने पार्टी को जैसे-तैसे एक मंच पर लाने की कोशिश की। नतीजा यह है कि जिस कांग्रेस के भीतर चुनाव शुरू होते ही तनाव, मारपीट, मुकदमेबाजी, ऑडियो विवाद और जांच की चर्चा थी, वही कांग्रेस चुनाव खत्म होने पर 42 पार्षदों के साथ भाजपा से 15 सीट आगे पूर्ण बहुमत के साथ खड़ी है।