बीकानेर पुष्करणा सावा: सारा शहर मंडप है, हर घर से बाराती..
RNE Bikaner.
पुष्करणा सावा जब भी आता है न जाने क्यों अचानक जेहन में ‘होली आई रे’ फिल्म में मुकेश का गाया सदाबहार रोमांटिक गीत ‘मेरी तमन्नाओं की तकदीर तुम संवार दो..’ गूंजने लगता है। वर्ष 1970 में आई इस फिल्म का यह गीत प्रख्यात गीतकार इंदीवार ने लिखा था और कल्याणजी-आनंदजी ने संगीत दिया था। गीतकार इंदीवर का बीकानेर कनेक्शन तो कहीं सुना-पढ़ा नहीं इसलिए ये नहीं कह सकते कि उन्होंने कभी पुष्करणा सावा देखा-सुना होगा। यह देखे सुने-बिना उन्होंने जाने इस गीत की जो सबसे जानदार पंक्तियां है वे लिखी है तो कहीं न कहीं कोई दृश्य उनके दिलो-दिमाग में जरूर रहा होगा। ये पंक्तियां है...
‘सारा गगन मंडप है, सारा जग बराती
मन के फेरे सच्चे, सच्चे हैं हम साथी
लाज का ये घूंघट पट आज तो उतार दो
प्यासी है जिदंगी और मुझे प्यार दो...’
हालांकि इंदीवार यूपी के झांसी इलाके से थे। यूपी में कुछ दशक पहले तक ऐसे मेले लगते थे जिसमें लोग शादियां तय करने के लिए ही जुटते थे। ऐसे मंे कल्पना हो सकती है कि कहीं न कहीं बीकानेर के सावे जैसी झलक रही होगी। खैर, फिलहाल बात बीकानेर के पुष्करणा सावे।
दरअसल बीकानेर मंे पहले चार साल से और अब दो साल से होने वाले पुष्करणा ब्राह्मण सावे मंे कमोबेश ऐसे ही हालात होते हैं। लगभग हर गली से बारात निकलती है। हर तीसरे-चौथे घर मंे दूल्हा पोखा जाता है। ऐसा कोई चौक नहीं है जो बारातों की आवाजाही का रास्ता न हो। यही वजह है कि हर चौक को सजा दिया जाता है। इस बार भी ऐसा ही हो रहा है। सारा शहर मंडप बन गया गया है। हर घर से बारात नहीं तो कम से कम बाराती जरूर निकलने वाले हैं।
छींकी के साथ शुरू हुई सावे की रमक-झमक:
इस बार भी सावे की रमक-झमक शुरू हो गई है। शादियों का मुहूर्त 10 फरवरी को है। ऐसे मंे आज यानी 08 फरवरी को दुल्हा-दुल्हन के हाथकाम हो रहे हैं। इससे पहले बीती रात देरावड़ी-मायरे और इससे एक दिन पहले जनेऊ वाली छींकियों का दौर रहा। दरअसल छींकी पुष्करणा शादियों की सबसे रोचक, धार्मिक परंपरा है जिसमें मस्ती घुलने के साथ ही इसमें शामिल लोग ही नहीं देखने वाले भी खूब उत्साहित होते हैं। अपभ्रंश के साथ मंत्रों को ‘ओमना सूं सी सा..’ बोलते हुए कुछ इस अंदाज में जोर-जोर से सामूहिक रूप से गाया जाता है कि लगता है दो पक्षांे में नारायुद्ध चल रहा है। लय के साथ अंदाज बदलता रहता है। दरसअल यह गणेश परिक्रमा है जिसमें मंत्रोच्चार करते हुए दूल्हा को दुल्हन के घर तक और दुल्हन को दूल्हे के दरवाजे तक लाया और ले जाया जाता है। यज्ञोपवीत वाले बटुक को अपने घर के इर्द-गिर्द ही एक खास रास्ते मंे इसी तरह चक्कर लगवाया जाता है। जनेऊ हो या शादी ननिहाल से मायरा जरूर आ रहा है। इसके साथ ही गूंज रहा है
‘बीरा रमक-झमक होय आयजो,
सरदार भतीजा सागै लायजो जी...
बीरा रमक-झमक होय जो..;’
ननिहाल से आए कपड़े पहनकर ननिहाल के बडेरो, कुल देवता को धोक लगाने की रस्मक कह लाती है देरावड़ी या लडूड़ी धरावण। देरावड़ी का भी अपना खास अंदाज है जिसमे लौंकार (लाल रंग की चादर) को चार कोने से पकड़े हुए लोगों के बीच उसकी छांह में चलता है बटुक। इसके साथ गूंजता है केसरियो लाडो:
‘ओ तो जींवतो-जींवतो डोळे,
जागो पिया रे डोळावै
म्हांरे ‘फलाणचंद’ रो बाप
केसरियो लाडो जीवतो रेवै..’।
शादी की इन सहायक रस्मों की आज यानी 08 फरवरी से शुरुआत हो चुकी है। जनेऊ का दौर दो दिन पहले से ही चल रहा है। कहीं छींकी के समझ नहीं आने वाले मंत्र गूंज रहे हैं तो कहीं ‘केसरिया लाडा’ गाया जा रहा है। चौक-मोहल्ले सजे-संवरे हैं और चारों ओर गूंज रहे हैं मंगलगीत। इन सबके बीच से गुजरते हुए आपका जेहन इंदीवर के बोल पर मुकेश की आवाज में खो जाता है ‘सारा गगन मंडप है सारा जग बराती...।’