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निकाय चुनाव : पाला बदलने वाले सदस्यों पर दल बदल कानून लागू क्यों नहीं होता? राजनीतिक सुचिता की पहली पाठशाला तो शुद्ध रहे

 

 

 

RNE, POLITICAL DESK.

जब बाबा साहेब भीमराव अंबेडकर ने देश के संविधान की संरचना की तो उनको इस अंदाजा नहीं था कि देश में आगे चलकर दलबदल भी सत्ता पाने या हथियाने का एक साधन बन जायेगा। इस कारण संविधान में केवल उप चुनाव की व्यवस्था की गई। वह तब होना था जब कोई सदस्य इस्तीफा दे दे, किसी अन्य पद पर पहुंच जाए, या देवलोक गमन हो जाये, तब रिक्त होने वाली सीट पर उप चुनाव का प्रावधान किया गया।

मगर राजनीति का स्वरूप बिगड़ता गया। दलबदल से सरकारें बनने लगी, गिरने लगी। तब संविधान में संशोधन हुआ और दलबदल विरोधी कानून बना। जिसका थोड़े दिन तो भय रहा, मगर बाद में इसका भी तोड़ निकाल लिया गया। अब बड़ी संख्या में इस्तीफा विधायक देते हैं, सरकार गिर जाती है और ज्यादा सीटों वाले दल की सरकार बन जाती है। इस्तीफा देने वाले सरकार वाले दल में आ जाते हैं, फिर चुनाव लड़कर विधायक बन जाते हैं। जिस विधायक पद से इस्तीफा देते हैं, उसी का उप चुनाव भी लड़ते हैं। जब दुबारा लड़ना ही था तो इस्तीफा क्यों दिया ? संविधान में इस तरह के उप चुनाव की तो परिकल्पना ही नहीं थी। मगर इस पद्धति से कई राज्यों में सरकारें बनी और गिरी भी है। दलबदल विरोधी कानून का यह बड़ा तोड़ हो गया। 

 

निकाय पंचायत राज में यह कानून क्यों नहीं ?

अभी राज्य में स्थानीय निकाय के चुनाव हुए हैं। मतगणना कल होनी है। उसके बाद राज्य में पंचायत राज के भी चुनाव होंगे। अभी 11 को निकाय चुनाव में मतदान की प्रक्रिया पूरी हुई है। इन निकायों में अपना बोर्ड बनाने के लिए भाजपा और कांग्रेस ने पूरी ताकत झोंकी हुई है।

सब तरफ से खबर आ रही है कि दोनों दलों ने केवल अपने दल के ही प्रत्याशियों की नहीं अपितु अन्य दल व निर्दलीयों की भी बाड़ेबंदी की है। ताकि उनके सहारे बोर्ड बनाया जा सके। अक्सर इन चुनावों में देखा गया है कि पार्षद इधर से उधर जाते रहते हैं। राज्य में जिस दल की सरकार होती है वह जोड़ तोड़ में ज्यादा सफल रहती है। बीकानेर नगर निगम भी इसका उदाहरण है। पिछले चुनाव में पार्षद कांग्रेस के ज्यादा थे, भाजपा के कम। मगर 5 साल बोर्ड भाजपा का रहा। निर्दलीयों के सहारे चला। अब वो पार्षद कैसे पक्ष में आये, यह जगजाहिर है। कुछ दूसरे दल के पार्षद भी प्रलोभन में इधर आ गए।

इस बार के चुनाव में भी दोनों दलों ने अभी से बाड़ेबंदी कर ली है। निर्दलीयों व छोटे दलों से सौदेबाजी हो रही है। जिसके पास बहुमत नहीं होगा, सम्भव है वो भी बोर्ड बना ले। भारी दलबदल होने की पूरी संभावना है। यह खबरें रोज अखबारों की सुर्खियां बन रही है।

तब एक सवाल स्वाभाविक रूप से दिमाग मे उठता है कि जब देश की सबसे बड़ी पंचायत लोकसभा में दलबदल विरोधी कानून लागू है तो सबसे छोटी पंचायत स्थानीय निकाय में यह कानून लागू क्यों नहीं है ? कानून लागू करने की प्रक्रिया तो नीचे से आरम्भ होनी चाहिए। पहले यह कानून स्थानीय निकाय में लागू होना चाहिए था, मगर यहां तो लागू ही नहीं है। पार्षदों को दलबदल की पूरी छूट मिली हुई है। इस विषय में यदि केंद्र व राज्य सरकारें पहल नहीं करती है तो माननीय न्यायालय को स्वतः संज्ञान लेकर संविधान के मूल भाव की रक्षा करनी चाहिए। संविधान की रक्षा का जिम्मा ही माननीय न्यायालय के पास है। इस पर विचार होना चाहिए।

पहली पाठशाला से सुचिता जरूरी

राजनीति की पहली पाठशाला स्थानीय निकाय है, यहां से ही लोकतंत्र व संविधान की रक्षा के लिए सुचिता की शुरुआत की जानी चाहिए। दलबदल करने वाले पार्षदों की भी सदस्यता समाप्त की जानी चाहिए। अन्य कठोर सजा का प्रावधान भी माननीय न्यायालय को करना चाहिए। ताकि यहां से शुरुआत हो और सबसे बड़ी पंचायत लोकसभा तक इसकी धमक हो। दलबदल करने वाले नेताओं के मन में डर बैठे। तभी लोकतंत्र व संविधान की रक्षा सम्भव होगी।