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संसद के बजट सत्र में राजस्थानी भाषा की मान्यता का मुद्दा उठाने की मांग

 

RNE Network.

अखिल भारतीय राजस्थानी भाषा मान्यता संघर्ष समिति के संभागीय महामंत्री एवं नेम प्रकाशन के पुरोधा पवन पहाड़िया ने प्रदेश के 30 सांसदों को ज्ञापन लिखकर संसद के बजट सत्र में राजस्थानी भाषा की संवैधानिक मान्यता की पुरजोर मांग उठाने की गुहार की है। पहाड़िया ने अपने ज्ञापन में लिखा कि राजस्थानी भाषा प्रदेश की प्रतीक एवं विश्व के 16 करोड़ नागरिकों की मातृभाषा है।आजादी के पूर्व रियासती काल एवं ब्रिटिश सरकार के शासनकाल में भी पूरे देश में अफसरों, कर्मचारियों के लिए राजस्थानी भाषा की जानकारी अनिवार्य कर रखी थी। इंपीरियर गजेटियर ऑफ इंडिया 1901 में इसका स्पष्ट उल्लेख है।

अंग्रेजों ने यह बात मानी कि बगैर राजस्थानी की जानकारी के कोई भी शासक, प्रशासक एवं मुलाजिम अपना उत्तरदायित्व भली-भांति नहीं निभा सकते। राजस्थानी का विशाल शब्दकोश, लोकोक्तियां, मुहावरे, लोककथाएं, लोकगाथाएं,लोकगीत विश्व पटल पर अपनी अलग पहचान बनाये हुए हैं। प्रदेश की संस्कृति से प्रभावित होकर प्रतिवर्ष करोड़ों विदेशी मेहमान यहां आकर हमारी कला संस्कृति एवं परम्पराओं की खुले दिल से तारीफ करते हैं इससे प्रदेशवासियों एवं सरकार को करोड़ों रूपए का राजस्व मिलता है। यह दुख की बात है कि केन्द्र एवं राज्य सरकार राजस्थानी संस्कृति की तो खूब प्रशंसा करती है। इसे बढ़ावा देने के लिए करोड़ों रूपए खर्च भी करती हैं लेकिन इन सब बातों की जननी राजस्थानी भाषा की मान्यता के मु्द्दे पर चुप्पी साध लेती है ।

संघर्ष समिति के संघर्ष से प्रभावित होकर राजस्थान सरकार ने 3 अगस्त 2003 को राजस्थान विधानसभा से सर्वसम्मति से राजस्थानी भाषा को आठवीं अनुसूची में शामिल करने का संकल्प पारित कर केंद्र सरकार को भेज दिया था। उसके बाद यह मुद्दा केंद्र सरकार ने ठंडे बस्ते में डाल रखा है। जनगणना 2011 में  4 करोड़ 70 लाख प्रदेशवासियों ने अपनी मातृभाषा राजस्थानी लिखवाई थी। राज्य सरकार की ओर से राजस्थानी भाषा मान्यता के लिए अब तक केंद्र सरकार को 15 पत्र लिख चुकी है। आजादी के बाद प्रदेशवासियों ने हिन्दी का मार्ग प्रशस्त करने के लिए अपनी मातृभाषा राजस्थानी की कुर्बानी दे दी थी उसका दुष्परिणाम हम आजादी के 79 वर्षों बाद भी भुगतते आ रहे हैं। पहाड़िया ने स्मरण कराया कि संघर्ष समिति पिछले तीन दशक से प्रदेश के सांसदों को बार-बार इस मुद्दे पर आग्रह करती आ रही है। संघर्ष समिति द्वारा इतना करने के बावजूद प्रदेश के सांसद न जाने क्यों चुप्पी साधे बैठे हैं।

राजस्थानी की मान्यता का सवाल युवाओं के भविष्य से जुड़ा हुआ है इसलिए अब यह जरूरी हो गया है कि प्रदेश के सभी सांसद संसद के बजट सत्र में राजस्थानी भाषा की मान्यता का मुद्दा उठाकर अपने दायित्व का सफल निर्वाह करें अन्यथा आने वाली पीढ़ी सांसदों को माफ नहीं करेगी।