Deshnok Chunav : देवीसिंह की विरासत V/S भंवरसिंह की सियासी जमीन, अंशुमान ने झोंकी ताकत, 81.55% मतदान ने मुकाबले का ताप बढ़ाया
Rudra News Express Deshnok-Bikaner.
देशनोक शब्द का उच्चारण होते ही जेहन में सबसे पहले करणी माता की करुणामय तस्वीर उभरती है। दुनिया में ‘चूहों वाली माता’ के नाम से विख्यात डोकरी को दया और करुणा का प्रतिरूप माना जाता है। मान्यता है कि जो इसकी शरण में आता है, उसे कुछ न कुछ सकारात्मक हासिल होता है। यही वजह है कि देश-दुनिया की बड़ी हस्तियां भी इस दरबार में धोक लगाने पहुंचती हैं।
फिलहाल देशनोक का जिक्र आस्था नहीं, राजनीति के नजरिए से हो रहा है। वजह है नगर पालिका चुनाव। हालांकि चुनाव राजस्थान के दूसरे निकायों में भी हो रहे हैं, लेकिन देशनोक की राजनीतिक हैसियत अलग है। यहां छोटा चुनाव भी बड़ा संदेश देता है। वजह साफ है, देशनोक कोलायत विधानसभा क्षेत्र का हिस्सा है और कोलायत की राजनीति पिछले कई दशकों से राजस्थान की चर्चित सियासी लड़ाइयों में रही है।
इस बार तो मामला और बड़ा है। देशनोक का चुनाव दो चिर-परिचित राजनीतिक प्रतिद्वंद्वियों यानी "भाटी परिवारों" की अगली पीढ़ी के बीच शक्ति परीक्षण के रूप में देखा जा रहा है।
देवीसिंह बनाम भंवरसिंह : पुरानी जंग, नई पीढ़ी
कोलायत की राजनीति में देवीसिंह भाटी एक युग का नाम हैं। वे सात बार विधायक और मंत्री भी रहे। लंबे समय तक उनकी राजनीतिक पकड़ इतनी मजबूत रही कि कांग्रेस के कई दिग्गज उनके सामने टिक नहीं पाए। इनमें कांग्रेस के कद्दावर नेता और भंवरसिंह भाटी के पिता रघुनाथसिंह भाटी भी शामिल रहे।
फिर राजनीतिक कहानी ने करवट ली। रघुनाथसिंह के बेटे भंवरसिंह भाटी सीधे देवीसिंह के सामने आए। वर्ष 2013 में भंवरसिंह ने देवीसिंह को विधानसभा चुनाव में हरा दिया। इसके बाद लगातार वर्ष 2018 में उन्होंने देवीसिंह की पुत्रवधू पूनम कंवर भाटी को भी शिकस्त दी। इस तरह एक दौर ऐसा आया जब देवीसिंह परिवार पर भंवरसिंह ने राजनीतिक बढ़त बना ली।
2023 में कहानी ने फिर पलटा खाया। देवीसिंह भाटी के पोते और पूर्व सांसद स्वर्गीय महेंद्रसिंह भाटी के पुत्र अंशुमानसिंह भाटी भाजपा प्रत्याशी बनकर मैदान में उतरे और उन्होंने भंवरसिंह भाटी को बड़े अंतर से पराजित कर विधानसभा में अपनी जगह बनाई। यानी यह सिर्फ दो नेताओं की लड़ाई नहीं है। यह दो राजनीतिक परिवारों के बीच कई चुनावों से चली आ रही प्रतिस्पर्धा है, जिसमें पीढ़ियां बदलती गईं, लेकिन मुकाबला कायम रहा।
अंशुमान के लिये यह महज पालिका चुनाव नहीं :
अंशुमानसिंह के विधायक बनने के बाद यह पहला बड़ा स्थानीय चुनाव है, जिसमें उन्हें अपने विधानसभा क्षेत्र की राजनीतिक जमीन पर संगठन और व्यक्तिगत प्रभाव की परीक्षा देनी है। यही वजह है कि उन्होंने देशनोक के छोटे से पालिका चुनाव को भी हल्के में नहीं लिया। भाजपा ने यहां पूरी ताकत झोंकी और अंशुमानसिंह खुद चुनावी गतिविधियों में सक्रिय नजर आए। भाजपा ने 25 वार्डों में प्रत्याशी उतारने की तैयारी की थी और चुनाव कार्यालय भी विधायक के नेतृत्व में खोला गया।
यह शैली कहीं न कहीं देवीसिंह भाटी की उस चुनावी कार्यशैली की याद दिलाती है, जिसमें कोई चुनाव छोटा नहीं होता था। पहली बार विधायक और अपेक्षाकृत कम समय से सीधे राजनीतिक मैदान में होने के बावजूद अंशुमान में यह राजनीतिक परिपक्वता दिखाई दे रही है कि वे पालिका चुनाव को भी विधानसभा की लंबी लड़ाई की एक कड़ी के रूप में देख रहे हैं। यही कारण है कि इस चुनाव के नतीजे सबसे ज्यादा महत्व अंशुमानसिंह भाटी के लिए रखते हैं।
2021 में देवीसिंह दूर, अर्जुनराम के हाथ में कमान :
देशनोक की पिछली नगरपालिका लड़ाई का राजनीतिक संदर्भ भी कम दिलचस्प नहीं है। 2021 के चुनाव में कांग्रेस की कमान तत्कालीन मंत्री भंवरसिंह भाटी के हाथ में थी। भाजपा की तरफ से केंद्रीय मंत्री अर्जुनराम मेघवाल ने मोर्चा संभाला था, जबकि उस समय देवीसिंह भाटी भाजपा से अलग हो चुके थे और चुनाव से दूरी बनाए हुए थे।
यहां एक और पुराना राजनीतिक पहलू जुड़ता है। देवीसिंह भाटी और अर्जुनराम मेघवाल एक ही पार्टी में रहते हुए भी दोनों के बीच 36 का आंकड़ा किसी से छिपा नहीं रहा। दोनों के समर्थक खेमों की राजनीति बीकानेर जिले में लंबे समय से चर्चा का विषय रही है।
इसलिए 2021 में देवीसिंह की दूरी और अर्जुनराम के हाथ में भाजपा की देशनोक कमान ने चुनाव को अलग रंग दिया था। नतीजा भी कांटे का आया, कांग्रेस 11, भाजपा 10, तीन निर्दलीय और एक एनसीपी प्रत्याशी जीते। कांग्रेस ने बाद में बोर्ड बनाया जो देशनोक में कांग्रेस का पहला बोर्ड था। संदेश गया देवीसिंह के बिना देशनोक में भाजपा का बोर्ड नहीं बन सकता। यानी देशनोक ने साफ संदेश दिया था, यहां बड़े नेताओं की प्रतिष्ठा सीधे पार्षदों की जीत-हार से जुड़ जाती है।
2026 में तस्वीर पेचीदा : 25 वार्ड, 61 प्रत्याशी:
- भाजपा 24
- कांग्रेस 22
- निर्दलीय 15
- कुल वार्ड 25
- मतदाता 16,220
- पड़े वोट 13,227
- मतदान 81.55 प्रतिशत
12 वार्डों में सीधा भाजपा-कांग्रेस मुकाबला :
वार्ड 1, 2, 4, 5, 13, 14, 16, 18, 22, 23, 24 और 25 में मुकाबला सीधे भाजपा और कांग्रेस के बीच है।
13 वार्डों में खेल खुला :
वार्ड 3, 6, 7, 8, 10, 17 और 20 में त्रिकोणीय मुकाबला है। वार्ड 9 और 11 में चार-चार प्रत्याशी हैं।
सबसे दिलचस्प चार वार्ड :
वार्ड 12, 15, 19 और 21नंबर दिलचस्प मुकाबला है । वार्ड 12 में भाजपा मैदान से बाहर है और कांग्रेस के सामने निर्दलीय है। वार्ड 15, 19 और 21 में कांग्रेस का प्रत्याशी नहीं है। यानी देशनोक में चुनाव भाजपा बनाम कांग्रेस भर नहीं है। यहां कई सीटों पर निर्दलीय उम्मीदवार परिणाम का पूरा गणित बदल सकते हैं।
25 वार्डों में भाजपा के 24 क्यों ?
यह भी इस चुनाव का बड़ा राजनीतिक सवाल है। भाजपा ने शुरुआत में 25 वार्डों के लिए प्रत्याशियों की सूची जारी की थी। लेकिन नामांकन जांच के बाद तस्वीर बदल गई। वार्ड 12 में भाजपा प्रत्याशी घेवरदान का पर्चा खारिज हो गया। नामांकन जांच में तीन पर्चे खारिज हुए और इसके बाद अंतिम मैदान में भाजपा 24 वार्डों में रह गई। नतीजा यह कि वार्ड 12 में अब कांग्रेस के गोविंददान और निर्दलीय सोन कंवर के बीच मुकाबला है।
दूसरी तरफ कांग्रेस 22 वार्डों में ही है। उसके प्रत्याशी वार्ड 15, 19 और 21 में नहीं हैं। इसलिए दोनों दलों की संगठनात्मक पहुंच को देखें तो भाजपा को इस बार एक वार्ड की बढ़त जरूर है, लेकिन कई जगह निर्दलीय ही असली तीसरा ध्रुव बन गए हैं।
चुनाव के बीच ACB की एंट्री :
देशनोक चुनाव की राजनीतिक गर्मी सिर्फ प्रत्याशियों और परिवारों तक सीमित नहीं रही। पूर्व पालिकाध्यक्ष ओमप्रकाश मूंधड़ा का नाम भी चुनाव के दौरान विवाद के केंद्र में आया। ACB ने मूंधड़ा सहित अन्य के खिलाफ पद के दुरुपयोग से जुड़ा मामला दर्ज कर जांच शुरू की। मामला इसलिए ज्यादा राजनीतिक हो गया क्योंकि मूंधड़ा कांग्रेस से जुड़े चुनावी समीकरण में भी महत्वपूर्ण हैं।
प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष गोविंदसिंह डोटासरा ने आरोप लगाया कि भाजपा सरकार सरकारी मशीनरी का दुरुपयोग कर कांग्रेस पर दबाव बना रही है। डोटासरा ने खास तौर पर कहा कि मूंधड़ा के खिलाफ शिकायत 2024 में हुई थी, लेकिन करीब दो साल तक कार्रवाई नहीं हुई और चुनाव आने पर ACB ने मामला दर्ज किया गया। यानी देशनोक में चुनावी मुकाबला सिर्फ वोट का नहीं रहा—एजेंसियों, प्रशासन और राजनीतिक दबाव के आरोप भी चुनावी विमर्श का हिस्सा बन गए।
शराब कांड ने सियासी पारा बढ़ाया :
तनाव की स्थिति का अंदाजा इस बात से भी लगाया जा सकता है कि चुनाव के बीच देशनोक में अवैध शराब पकड़ी गई। कार्रवाई के दौरान प्रचार सामग्री मिलने का दावा किया गया और भाजपा की ओर से इसे कांग्रेस से जोड़कर आरोप लगाए गए।
इस पूरे विवाद में पूर्व पालिकाध्यक्ष ओमप्रकाश मूंधड़ा का नाम भी राजनीतिक तौर पर जोड़ा गया। हालांकि यह किस दल, प्रत्याशी या व्यक्ति से जुड़ी है इसका पता लगाना पुलिस का काम है लेकिन मतदान से पहले इस तरह की कार्रवाई ने देशनोक की चुनावी गर्मी को और बढ़ा दिया।
भंवरसिंह खेमे का पलटवार : सत्ता के दुरुपयोग का आरोप
दूसरी तरफ पूर्व मंत्री भंवरसिंह भाटी, देहात कांग्रेस अध्यक्ष बिशनाराम सियाग और प्रह्लादसिंह मार्शल सहित कांग्रेस नेताओं ने जिला कलेक्टर से मुलाकात कर अपनी शिकायतें रखीं।
कांग्रेस ने आरोप लगाया कि चुनाव में सत्ता का दुरुपयोग किया जा रहा है और पुलिस पर भी दबाव है। बाहरी लोगों की मौजूदगी को लेकर भी सवाल उठाए गए। कांग्रेस नेताओं ने शांतिपूर्ण और निष्पक्ष चुनाव के लिए प्रशासन से हस्तक्षेप की मांग की। मतलब साफ है कि दोनों खेमे चुनाव को लेकर असाधारण रूप से सतर्क और आक्रामक रहे।
यानी देशनोक की चुनावी तस्वीर में एक तरफ भाटी परिवारों की राजनीतिक प्रतिष्ठा दांव पर है तो दूसरी तरफ भाजपा-कांग्रेस की सीधी जंग है। तीसरी तरफ 15 निर्दलीय अपनी मौजूदगी की कहानी कह रहे हैं वहीं चौथी तरफ आरोप-प्रत्यारोप का तनावी माहौल। है वजह है कि भारी पुलिस बंदोबस्त के बीच यहां चुनाव हुआ और छिटपुट घटनाओं को छोड़ शांति रही।
2023 के चुनाव का देशनोक पालिका चुनाव पर कितना असर :
2021 में कांग्रेस 11 और भाजपा 10 पर थी। इस बार भाजपा ने 24 और कांग्रेस ने 22 वार्डों में प्रत्याशी उतारे हैं। लेकिन सिर्फ प्रत्याशी संख्या से ताकत का अनुमान नहीं लगाया जा सकता, क्योंकि 15 निर्दलीय कई सीटों पर निर्णायक भूमिका में हैं। अंशुमानसिंह भाटी के सामने चुनौती यह है कि 2023 की विधानसभा जीत को स्थानीय निकाय की जमीन पर राजनीतिक स्वीकार्यता में बदला जाए।
भंवरसिंह भाटी के सामने चुनौती उससे अलग नहीं, बल्कि शायद ज्यादा बड़ी है। उन्हें यह साबित करना कि 2023 में विधानसभा सीट गंवाने के बावजूद कोलायत की स्थानीय राजनीति में उनका नेटवर्क और प्रभाव खत्म नहीं हुआ है। यही वजह है कि देशनोक में पार्षद का चुनाव लड़ रहे 61 प्रत्याशियों के पीछे नजर असल में दो राजनीतिक परिवारों की ताकत पर है।
देशनोक का क्वार्टर फाइनल :
अगर इसे पूरी राजनीतिक पटकथा में देखें तो तस्वीर कुछ इस तरह दिखाई देती है। देशनोक नगरपालिका चुनाव-क्वार्टर फाइनल। इसके बाद कोलायत विधानसभा क्षेत्र में होने वाले पंचायत चुनाव - सेमीफाइनल। फिर विधानसभा चुनाव- फाइनल।
दोनों के लिये नाक का सवाल :
अंशुमानसिंह भाटी के लिए यह चुनाव इसलिए ज्यादा अहम है क्योंकि वे पहली बार विधायक हैं और उन्हें अपने दादा देवीसिंह भाटी की विरासत को अपनी राजनीतिक शैली में आगे बढ़ाना है। भंवरसिंह के लिए यह चुनाव इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि उन्हें यह साबित करना है कि 2023 की विधानसभा हार के बावजूद कोलायत की जमीन पर उनकी राजनीतिक पकड़ कायम है।
इसलिए देशनोक में सवाल सिर्फ यह नहीं है कि 25 वार्डों में किसके कितने पार्षद जीतेंगे। सवाल यह है कि 14 सितंबर को जब ईवीएम खुलेंगी तो कोलायत की राजनीति में किस परिवार की आवाज ज्यादा बुलंद सुनाई देगी—देवीसिंह की विरासत वाले अंशुमान की या रघुनाथसिंह की राजनीतिक विरासत वाले भंवरसिंह की? करणी माता के दरबार में फैसला 25 वार्डों का होगा, लेकिन संदेश पूरे कोलायत का निकलेगा।