चुनावी खुरचन : कांग्रेस व भाजपा के बागी, निर्दलीय बैठने को आतुर थे, पर कोई मनुहार करने ही नहीं आया, अब चुनाव उनके लिए बोझ बन गया, सीएम को शहर में इसलिए लाये कि किरकिरी न हो
इस बार कांग्रेस और भाजपा, दोनों में कुछ वार्ड स्तर के नेताओं ने पर्चा भरा। सोचा मनुहार होगी, पूछ होगी या ' कुछ मिलेगा ' तो वापस बैठ जायेंगे। मगर बेचारे मनुहार और ' कुछ मिलने ' को उडीकते ही रहे। कोई आया ही नहीं। बड़े बोल बोल तो दिए, अब खड़े रहने के अलावा कोई चारा नहीं। चुनाव बोझ की तरह इन चुनावी परिंदों के गले पड़ गया।
पाटेबाज
कांग्रेस व भाजपा के कुछ वार्ड स्तर के नेताओं ने पहले के चुनावों की तरह अपनी पूछ बढ़ाने के लिए चुनाव लड़ने की घोषणा कर दी। चर्चा पाने के लिए पार्टी से टिकट भी मांग लिया। अपने कुछ जान पहचान वाले पत्रकारों से संभावित उम्मीदवार के रूप में नाम भी उछलवा लिया। पार्टियों ने उनको उनकी राजनीतिक का अंदाजा कर भाव ही नहीं दिया। इनको थोड़ा गुस्सा आ गया, आना स्वाभाविक भी था।
आनन - फानन में नामांकन दाखिल कर दिया। सोचा अब तो पार्टी या उस वार्ड का अधिकृत उम्मीदवार मनुहार करने आएगा तो कुछ अकड़ दिखा, कुछ पाकर, पर्चा उठाने का अहसान कर देंगे। तब भी बात नहीं बनी। पर्चा उठाने की तारीख निकलने के बाद भी कोई मनुहार करने नहीं आया। फिर सोचा, थोड़ा प्रचार करते हैं, उसे देख मनुहार मिल जाएगी, मगर बात तो अब तक भी नहीं बनी।
कुछ बड़े उम्मीदवारों व हॉट सीट वाले वार्डों में ऐसे लोग खड़े हैं। पाटेबाज अब उनके चुनाव का मजा ले रहे हैं। वे कहते हैं, नमाज पढ़ने गए, रोजे गले पड़ गए। सोचा ' कुछ ' मिलेगा, मगर चुनाव गले पड़ गया। अब वे एकांत में अपने खास लोगों से बात में कहते हैं, कोई मनाने ही नहीं आया। पार्टी से भी गए, कुछ हाथ भी नहीं लगा। पाटेबाजों को उनकी उडीक पर अब मजा आ रहा है, वे उनको दिलासा देते हैं कि उडीक रखो, वे पूछते हैं कब तक, पाटेबाज कहते हैं अगले निगम चुनाव तक। बस, पाटे पर बैठे लोग इस सवाल जवाब पर अट्टहास लगाना शुरू कर देते हैं। वे पाटे से यह सोचकर उठ जाते हैं कि ज्यादा बैठे तो ' चिलड़े ' ज्यादा उतरेंगे। अब तक लोगों के ' चिलड़े ' उतरते थे अब उनके ' चिलड़े ' उतर रहे हैं। एक तो उडीक, दूसरा चुनाव गले, तीसरा माया मिली न राम और चौथा चिलड़े, पाटेबाजों से बचना ही उनको ठीक लगता है।
किरकिरी से बचने के लिए शहर को चुना
शहर के पाटों पर सीएम के रोड शो की बड़ी चर्चा है। सीएम ने तो एक नवाचार करते हुए स्थानीय सरकार के चुनाव से भी खुद को जोड़ा और जनता से सीधे संवाद के लिए रोड शो बीकानेर में किया। सीएम को किस रूट पर उतारा जाए, यह बड़ा सवाल था। आखिरकार शहरी क्षेत्र को प्रमुखता से चुना। क्योंकि भीड़ यहीं अधिक सम्भव थी। छोटी सड़कों के कारण कम लोग भी अधिक दिखते हैं।
इसके अलावा इन चुनावों में अन्य नेताओं व संगठन से अधिक सक्रिय तो शहरी क्षेत्र के विधायक जेठानंद व्यास रहे हैं। वे ही वार्ड वार्ड घूम रहे हैं। उनके द्वारा ही भीड़ जुटाना सम्भव था। पाटेबाजों का मानना है कि इसी वजह से सीएम का रूट शहरी क्षेत्र में अधिक रखा गया। पाटों की साफ टिप्पणी है कि बाकी नेता सीएम आये तो दिख गए, चुनाव में तो उनके दीदार कम ही होते हैं।