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जनरंजन : पूर्व सीएम अशोक गहलोत कल बीकानेर में, एक तीर कई शिकार, कांग्रेस की गुटीय राजनीति में गोविंद राम मेघवाल की मजबूत दखल

 

 

 

 

बीकानेर में पंचायत राज चुनाव के लिए एक तरफ जहां भाजपा, कांग्रेस व आरएलपी ने अपनी बिसात बिछा ली है, वहीं नेताओं ने भी अपने स्तर पर प्रयास आरम्भ कर दिए हैं। कांग्रेस में केवल प्रदेश ही नहीं अपितु बीकानेर स्तर पर भी गुटबाजी तीव्र है, तो यहां गुटीय शक्ति परीक्षण भी सामने आ रहा है। पूर्व सीएम अशोक गहलोत के 13 के संभावित दौरे को इसी छांव में देखा जा रहा है।

 

मधु आचार्य ' आशावादी '

राज्य में पंचायत राज चुनाव की रणभेरी बजी हुई है और पूरा ग्रामीण क्षेत्र चुनावी रंग में पूरी तरह रंगा हुआ है। गांवों में वैसे भी शहर से अधिक राजनीतिक चेतना होती है। स्थानीय निकायों के बाद पंचायत राज चुनावों का होना, राज्य की भाजपा सरकार के लिए बड़ी परीक्षा है। राज्य में भाजपा की भजनलाल शर्मा सरकार को बने हुए ढाई साल से भी अधिक हो गए। यह चुनाव भाजपा सरकार पर एक तरह से ग्रामीण क्षेत्र में हो रहा जनमत है।

यह चुनाव बहुत बड़ा है। 1 लाख 54 हजार 640 सीटों पर इसमें मतदान होगा। जिसे बड़ा जनमत माना जाना चाहिए। पंचायत समितियों के 8245 वार्ड सदस्यों को इसमें चुनाव होना है। ग्रामीण क्षेत्र की सर्वोच्च बॉडी जिला परिषद के 1403 वार्ड सदस्य इस चुनाव में चुने जाने हैं। क्योंकि जिला परिषद के सदस्यों की संख्या 33 से बढ़कर अब 41 हो गयी है। 41 जिला प्रमुख चुने जाने हैं।

ठीक इसी तरह पंचायत समितियों की संख्या भी 352 से बढ़कर 457 हो गयी। 457 प्रधान चुने जाने हैं। पंचायत राज की आधार ग्राम पंचायत होती है जिनमें इस बार 1 लाख 30 हजार 589 वार्ड पंचों का चुनाव होना है। जिला परिषद व पंचायत समितियों के सदस्यों के चुनाव में ईवीएम का प्रयोग होगा, जबकि सरपंच और वार्ड पंचों का चुनाव मत पत्र से होगा। इन सभी पदों के लिए चुनाव की प्रक्रिया शुरू हो गयी है और राजनीतिक दल भी अपने स्तर पर सक्रिय हो गए हैं।

कांग्रेस की प्रतिष्ठा है दाव पर

पंचायत राज चुनावों में कांग्रेस की प्रतिष्ठा दाव पर है। क्योंकि इन चुनावों में सदा से ही कांग्रेस का वर्चस्व रहा है। जिस तरह से शहरी निकायों में भाजपा मजबूत रहती आयी है उसी तरह पंचायत राज में कांग्रेस का बोलबाला रहा है। भाजपा ने भी इस बार पंचायत चुनाव को अपनी प्रतिष्ठा का सवाल बनाया है। उसने भी पहली बार बड़ी सफलता के लिए रणनीति पर काम करना आरम्भ किया है। 

यदि संख्यात्मक दृष्टि से देखें तो स्थानीय निकाय चुनाव में भाजपा को बड़ी सफलता मिली थी मगर गुणात्मक दृष्टि से बड़ी सफलता उसे नहीं कहा जा सकता। भाजपा ने 10 में से 9 नगर निगम जीते, वहीं पालिका व परिषदों को मिलाकर 65 प्रतिशत से अधिक सफलता हासिल की। मगर गुणात्मक दृष्टि से देखें तो उसे कांग्रेस से केवल 0.94 फीसदी वोट ही अधिक मिले थे। इस कारण भाजपा अब पंचायत चुनावों पर ज्यादा जोर लगा रही है। क्योंकि ये दोनों चुनाव ही अगली सरकार के लिए सेमीफाइनल है।

गहलोत का बीकानेर आना, कई कयासों को जन्म

स्थानीय निकाय चुनावों में कांग्रेस के बड़े नेताओं पर आरोप लगा कि उन्होंने पूरे राज्य में प्रचार नहीं किया और न ही अपना किला बचा सके। सरकार के प्रति लोगों की जो नाराजगी है उसे भी वे भुना नहीं सके। जबकि दूसरी तरफ खुद मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा ने अनेक शहरों में रोड शो किये। जिसके परिणाम भी उनको मिले।

इस बार बड़े नेता कांग्रेस के भी फील्ड में आते दिख रहे हैं, भले ही उसका आधार गुटबाजी हो। बीकानेर में निकाय चुनाव के समय कमान पूरी तरह से केवल पूर्व मंत्री डॉ बी डी कल्ला के पास ही थी। उस समय शहर में कांग्रेस गुटबाजी का शिकार नहीं थी। मगर पंचायत चुनाव में कांग्रेस पूरी तरह से गुटबाजी से ग्रसित है। क्योंकि अब दिग्गज नेता रामेश्वर डूडी दुनिया में रहे नहीं। एक तरफ डूडी समर्थक हैं तो दूसरी तरफ पूर्व मंत्री गोविंद मेघवाल है। दोनों के बीच टकराहट भी पिछले 8 महीनों से चल रही है। 

देहात कांग्रेस संगठन पर डूडी समर्थक बिसनाराम सियाग काबिज है और उनके साथ नोखा विधायक व डूडी की धर्मपत्नी सुशीला डूडी है। इनके व गोविंद मेघवाल के बीच टकराहट है।

गोविंद मेघवाल को अशोक गहलोत का कट्टर समर्थक व उनके गुट का माना जाता है। डूडी की प्रथम पुण्यतिथि पर 3 अक्टूबर को जो श्रद्धांजलि सभा हुई, वो चुनावी शंखनाद के रूप में बदल गई। उस सभा में पीसीसी चीफ गोविंद डोटासरा व नेता प्रतिपक्ष टीकाराम जुली शामिल हुए। अगुवाई डूडी समर्थकों के पास थी। जबकि अब मेघवाल भी पंचायत चुनाव में वर्चस्व चाहते हैं।

इसी कारण से मेघवाल ने अपने वर्चस्व को दिखाने के लिए 13 अक्टूबर को पूर्व सीएम अशोक गहलोत की सभा नाल में आयोजित की है। नाल मेघवाल के ही विधानसभा क्षेत्र खाजूवाला का हिस्सा है।

गोविंद गुट दिखा रहा अपनी शक्ति

दरअसल गहलोत का यह दौरा भी एक तरह से शक्ति प्रदर्शन ही है। पिछली बार भी पंचायत चुनाव गोविंद ने दमखम से लड़ा मगर चली डूडी की। उम्मीद यही थी कि इस बार कमान गोविंद के हाथ रहेगी। मगर डूडी समर्थकों से टकराहट हो गयी और पार्टी ने कमान पूरी तरह से देहात संगठन को सौंप दी। देहात अध्यक्ष बिसनाराम सियाग को पीसीसी चीफ डोटासरा का निकटस्थ माना जाता है। 

 

इसी कारण अपने वजूद, शक्ति प्रदर्शन के लिए गोविंद पूर्व सीएम गहलोत को ला रहे हैं। ताकि उनकी भूमिका को पंचायत चुनाव में नजरअंदाज नहीं किया जा सके। गहलोत के वे कट्टर समर्थक हैं और उनके जरिये प्रदेश संगठन में दखल देना चाहते हैं ताकि पंचायत चुनाव में उनको कम न आंका जाए। इस कारण नाल की गहलोत की सभा को शक्ति प्रदर्शन के रूप में देखा जा रहा है।

निकाय चुनाव में नहीं निकले थे गहलोत

स्थानीय निकाय चुनाव के दौरान गहलोत प्रदेश में प्रचार के लिए नहीं निकले थे। जोधपुर में भी सीमित प्रचार किया। इस बार के उनके निकलने के राजनीतिक मायने निकाले जा रहे हैं। माना जा रहा है कि गहलोत अपने समर्थक दिग्गजों को विधानसभा चुनाव आने से पहले एकजुट रखने में लगे हैं। जो कांग्रेस की राज्य स्तरीय गुटबाजी का ही प्रतिफल है।

गहलोत के बीकानेर दौरे की सूचना भी गोविंद मेघवाल ने दी है, देहात कांग्रेस अभी भी इस दौरे को लेकर चुप है। इससे साफ प्रतीत होता है कि गुटीय राजनीति से कांग्रेस अब भी उबर नहीं पाई है।