गणगौर: सुबह सजावट, दोपहर दांतणिया, रात को गूंजते गीत
हर गली गवर की गूंज
Rajaldo Bohra
RNE Bikaner.
‘उठि उठि गवर निंदाड़ो खोल...’ युवतियों की समवेत मीठी आवाज में गूंजते इस गीत से बीकानेर की सुबह हो रही है। परकोटे के भीतरी शहर मंे कमोबेश हर घर की छत पर छोटी-छोटी लड़कियों से लेकर युवतियों-महिलाओं तक के ग्रुप जुट रहे हैं। सफेद मिट्टी से फर्श पर आकृति उकेर उसमें गवर, ईसर, भाइया के चित्र तो बना ही रहे हैं साथ ही हर दिन किसी नइ थीम की पेंटिंग यहां नजर आती है। मिट्टी से बनाई इन आकृतियों में गुलाल के रंग भर उसे आकर्षक रूप देते हुए उनके चेहरे पर उत्साह के साथ श्रद्धा भी साफ तौर पर देखी जा सकती है।
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गुलाल से आकृतियां रंगती जाती है और साथ-साथ गूंजते रहते हैं गणगौर के गीत। कभी ‘बाड़ी आळा बाड़ी खोल, बाड़ी री किंवाड़ी खोल...’ गूंजता है तो कभी ‘ओ कुण बीरो बाग लगायो, ओ कुण सींचण जायसी...’ की टेर लगती है। इसके साथ ही गवर पूजने वाली सभी युवतियों के भाई के बाग लगाने और बहिनों के ‘सींचण आने’ का क्रम गुनगुनाया जाता है। सूरज चढ़ते-चढ़ते गीतों का कारवां आगे बढ़ता है और गणगौर को गुलाल के रंग से पूरी तरह रंग देने के बाद शुरू होता है ‘पाळसिया पूजन।’ बची हुई गुलाल इस पाळसिये में सजाकर उस पर ‘केसर कूंकू- केसर कूंकू, बाड़ी रे...’ गाते हुए टीकी लगती है। सात हाथ लगाकर इस पाळसिये को ‘एक हिंडोळो तेळ-मेळ...’ गाते हुए हिंडा दिया जाता है। यह सुबह का गवर पूजन क्रम पूरा होता है।
दोपहर होते-होते पूजन का नया दौर शुरू होता है। अब गुलाल में पानी मिलाकर उसे रंग बनाया जाता है। इस बार मिट्टी की बजाय इसी गुलाल से गवर के चित्र बनते है और इसके साथ गूंजते हैं दांतणियों को गीत। जब रात गहराने लगती है तो घर मंे रखी लकड़ी की सजी-धजी गवर, ईसर, भाइया को लगता है भोग। इसके कहते हैं ‘बासा देणा।’ इस बासे देने के भी अपने गीत होते हैं। इसमें पूरे परिवार के महिलाएं शामिल हो जाती है।
धुलंडी से शुरू हुआ गणगौर पूजन का क्रम 16 दिन चलता है और अगर आपको लगता है कि गणगौर के लिए सबकुछ इन 16 दिनों में ही होता है तो आप गलत है। वास्तविकता यह है कि इसके लिए महीनों पहले से तैयारियां शुरू हो जाती है। यूं कहा जाएं कि कुछ कलाकार-कारीगर ऐसे हैं तो पूरे साल गणगौर की तैयारी करते हैं। तब भी अतिश्योक्ति नहीं होगी।
जैसा कि लकड़ी को गणगौर का आकार देने वाले कलाकार नरेन्द्र सुथार कहते हैं, हमारे दादा-परदादा गणगौर बनाते हैं। ये गण और गौरी से बना हुआ शब्द है। गण यानी शिव है और गौरी यानी पार्वती माता। हम इसी भाव के सथ गवर-ईसर की प्रतिमाएं बनाते हैं। पूरी आस्था के साथ यह काम होता है और पूरे साल यह काम चलता है। हमारे यहां बनी हुई गणगौर देश ही नहीं दुनियाभर में फेमस है। यहां से आस्ट्रेलिया तक भी गणगौर जाती है।
नरेंद्र सुथार अकेले नहीं है जो पूरे साल यह काम करते हैं। यहां बाकायदा एक मोहल्ला है जिसे अब गणगौर बाजार तक कहा जाने लगा है। इस महात्मा मथेरी मोहल्ले के कई मथेरी परिवारों में छोटे-बच्चों से लेकर बुजुर्ग, महिलाएं सभी गणगौर को सजाने-संवारने का कम करते हैं। प्रसिद्ध मथैरण कला का इसमें सांगोपांग दर्शन होता है।
इस काम को पेशे की तरह करने वाले अब सैकड़ों लोग हो गए हैं वहीं कई महिलाएं ऐसी भी हैं जो गवर को सजाने-संवारने के सेवा का काम मानती हैं। इन्हीं में एक है किसनादेवी बोहरा। हर साल बीसियों परिवारों की गवर के कपड़े तैयार कर उन्हें सजाने वाली किसना देवी कहती है, इस सेवा से यूं लगता है कि गवर माता का आशीर्वाद मिल रहा है और गवर माता ने ही मुझे निमित्त बनाया है।
अगर आपको लगता है कि गणगौर पूजन या गवर के गीत सिर्फ महिलाओं तक ही सीमित हैं तो आप एक रात आप बीकानेर के परकोटे में घूम लीजिये। यहां कहीं न कहीं आपको पुजारी बाबा पूरी मंडली के साथ मिल जाएंगे बुलंद और सधी आवाज मंे गवर के गीत गाते हुए। ये पूरी मंडली अलग-अलग घरों, चौक-मोहल्लों मंे जाकर लोगों के बुलावे पर गवर के गीत गाती है। इसके बदले में पारितोषिक के तौर पर कुछ नहीं लेती। हालत यह है कि जिस मोहल्ले में ये गीत होते हैं वहां आस-पास के लोग सुनने के लिए जुट जाते हैं। ऐसे मंे सुबह से रात तक हर ओर गणगौर की ही गूंज सुनाई दे रही है। इसमें बच्चे, बढ़े, जवान, युवतियां सभी अपनी भागीदारी निभा रहे हैं। हो सकता है कि जब आप बीकानेर में एक दिन सुबह से रात तक गणगौर की इन विविध पूजाओं-गीतों से गुजरे तो घर जाते वक्त खुद-ब-खुद आपके मुंह से बोल निकल सकते हैं ‘ ले सो ले सो ईसरदस जी रो कांगसियो म्हैं मोल लेसौ राज...’