कर्नाटक के राज्यपाल ने गुरु तेग बहादुर जी की शहादत पर राष्ट्रीय संगोष्ठी का उद्धाटन किया
RNE Bikaner.
कर्नाटक के राज्यपाल श थावरचंद गेहलोत ने गुरु नानक इंजीनियरिंग कॉलेज, बीदर में आयोजित राष्ट्रीय संगोष्ठी "सिख धर्म में शहादत की परंपरा और गुरु तेग बहादुर जी का शहादत" का उद्घाटन किया। इस संगोष्ठी का आयोजन भारत के संस्कृति मंत्रालय तथा साहित्य अकादेमी ने गुरुद्वारा श्री नानक झीरा साहिब प्रबंधन समिति, बीदर के सहयोग से किया था।
उद्घाटन संबोधन में माननीय राज्यपाल ने गुरु तेग बहादुर जी की शहादत को मानवीय इतिहास के उन महानतम उदाहरणों में से एक बताया जिसमें किसी अन्य के धर्म-स्वतंत्रता और अंतरात्मा की आज़ादी की रक्षा के लिए अपने प्राणों की आहुति दी गई। उन्होंने कहा कि गुरु तेग बहादुर जी का सर्वोच्च बलिदान धर्म-सीमाओं से परे जाकर मानवीय अधिकार, न्याय, सहिष्णुता और नैतिक साहस का सार्वभौमिक प्रतीक बन गया है।
गुरु तेग बहादुर जी को "हिंद की चादर" कहते हुए श्री गेहलोत ने कहा कि नवें गुरु ने धार्मिक स्वतंत्रता, मानव गरिमा और सामाजिक बहुलवाद जैसे भारतीय स्थायी मूल्यों की रक्षा के लिये अपने जीवन की आहुति दी। उन्होंने उल्लेख किया कि गुरु की यह शहादत सिख धर्म में निःस्वार्थ बलिदान की परंपरा को प्रेरित करने वाली रही और अंततः उसने गुरु गोबिंद सिंह जी द्वारा खालसा की स्थापना के नैतिक आधार को सुदृढ़ किया। राज्यपाल ने कहा कि गुरु का संदेश असहिष्णुता, उत्पीड़न और अन्याय का सामना करने में आज भी मार्गदर्शक है और आधुनिक भारत के संवैधानिक मूल्यों के साथ गहरे रूप से प्रासंगिक बना हुआ है।
राज्यपाल ने संस्कृति मंत्रालय, भारत सरकार को भारत की समृद्ध सभ्यतागत विरासत पर शोध और संवाद को बढ़ावा देने के लिये सराहा। उन्होंने साहित्य अकादेमी की भी प्रशंसा की कि उसने इतिहास, साहित्य और दार्शनिक आयामों पर विद्वानों को राष्ट्रीय मंच प्रदान किया। गुरुद्वारा श्री नानक झीरा साहिब प्रबंधन समिति, बीदर के सहयोग की प्रशंसात्मक टिप्पणी करते हुए उन्होंने कहा कि गुरु नानक देव जी के आगमन से पावन बीदर ऐसे महत्वपूर्ण राष्ट्रीय सेमिनार के लिये उपयुक्त स्थल है।
इससे पूर्व साहित्य अकादेमी के सचिव डॉ. वरुण गुलाटी ने स्वागत भाषण दिया और राज्यपाल, विशिष्ट अतिथियों, विद्वानों व देशभर से आए प्रतिनिधियों का स्वागत किया। उन्होंने साहित्य अकादेमी की भारतीय भाषाओं, साहित्य और सांस्कृतिक संवाद को बढ़ावा देने की प्रतिबद्धता को रेखांकित किया। उन्होंने यह भी जानकारी दी कि संस्कृति मंत्रालय, भारत सरकार, नई दिल्ली और साहित्य अकादेमी द्वारा श्री गुरु तेग बहादुर जी की 350वीं शहादत स्मृति में देश के अलग-अलग भागों में कई राष्ट्रीय सेमिनार आयोजित किए जा रहे हैं।
साहित्य अकादेमी की उपाध्यक्ष प्रो. कुमुद शर्मा ने उद्घाटन सत्र की अध्यक्षता की और अपने अध्यक्षीय भाषण में शोध, साहित्य और अकादमिक संवाद के माध्यम से भारत की साझा सांस्कृतिक विरासत को संरक्षित करने के महत्व पर ज़ोर दिया।
गुरुद्वारा श्री नानक झीरा साहिब प्रबंध समिति, बीदर के अध्यक्ष सरदार बलबीर सिंह, गणमान्य अतिथि के रूप में समारोह में उपस्थित रहे और उन्होंने संस्कृति मंत्रालय एवं साहित्य अकादेमी को बीदर में यह संगोष्ठी आयोजित करने के लिये धन्यवाद एवं आभार व्यक्त किया।
मुख्य व्याख्यान डॉ. मनमोहन ने दिया, जिन्होंने सिख शहादत परंपरा के ऐतिहासिक विकास और दार्शनिक आधारों की पड़ताल की तथा समकालीन समाज में गुरु तेग बहादुर जी की शहादत की प्रासंगिकता पर प्रकाश डाला।
संगोष्ठी के विषय एवं विशिष्ट अतिथियों का परिचय साहित्य अकादेमी के पंजाबी परामर्श मंडल के संयोजक डॉ. रवेल सिंह ने दिया। उन्होंने गुरु तेग बहादुर जी की शहादत की भारतीय इतिहास में अनूठी उपस्थिति को रेखांकित करते हुए संगोष्ठी के उद्देश्यों को बताया — जिसका उद्देश्य सिख इतिहास, दर्शन और साहित्य पर गंभीर अकादमिक बातचीत को प्रोत्साहित करना था।
समापन भाषण गुरुद्वारा श्री नानक झीरा साहिब प्रबंध समिति, बीदर की उपाध्यक्ष सरदारनी रेशमा कौर ने दिया, जिन्होंने राज्यपाल, संस्कृति मंत्रालय, साहित्य अकादेमी, विद्वानों, प्रतिनिधियों तथा आयोजन समिति का सेमिनार की सफलता के लिये धन्यवाद व्यक्त किया।