लाला कामेश्वर दयाल ‘हज़ी’ : दर्द, सादगी और इंसानियत का लहजा
इमरोज़ नदीम
RNE Special.
उर्दू अदब की तारीख़ में कुछ शायर ऐसे भी गुज़रे हैं जिनका कलाम महज़ अल्फ़ाज़ का हुस्न नहीं, बल्कि दिल का सच मालूम होता है। लाला कामेश्वर दयाल ‘हज़ी’ उन्हीं में से एक हैं। उनकी शायरी में न कोई बनावट है, न दिखावा बल्कि एक सादा, सच्चा और दर्द से भरा हुआ लहजा है, जो सीधे दिल में उतर जाता है।
हज़ी साहब का ताल्लुक़ उस दौर और माहौल से है जहाँ उर्दू अदब ने इंसानी जज़्बात की नुमाइंदगी का फ़र्ज़ बड़ी शिद्दत से निभाया। उनका जन्म 23 फ़रवरी 1917 को मेरठ के लालकुर्ती इलाके में हुआ। तालीम मेरठ और देहरादून में हासिल की, बी.एससी. किया, और बाद में ज़िंदगी ने उन्हें बीकानेर ला खड़ा किया, जहाँ उन्होंने साइंस टीचर के तौर पर तालीमी ख़िदमत अंजाम दी। राजस्थान सरकार ने उन्हें “टीचर्स डे” पर सम्मानित भी किया। होम्योपैथी में भी महारत रखते थे ।
अदबी सफ़र की शुरुआत उन्होंने अफ़साना-निगारी से की। उनके कई अफ़साने उस दौर के रिसालों में शाया हुए, मगर यह एक अहम हक़ीक़त है कि उनके अफ़सानों का कोई मुकम्मल मजमुआ किताब की सूरत में सामने न आ सका। इसके बावजूद उनका अफ़सानवी तजुर्बा उनकी शायरी में जगह-जगह झलकता है जहाँ हर शे’र एक मुकम्मल कहानी का असर देता है और हर मिसरा एक तजुर्बे की आवाज़ बन जाता है।
ग़ज़लगोई : दर्द की रवानी और एहसास की सच्चाई
दीवान-ए-हज़ी के अशआर पर नज़र डाली जाए तो साफ़ महसूस होता है कि उनकी शायरी का मरकज़ इश्क़ और ज़िंदगी का तजुर्बा है। मगर यह इश्क़ महज़ रूमानी एहसास नहीं, बल्कि एक गहरा इंसानी तजुर्बा है
“तुलूए सुबह देखा है, गुरूबे शाम देखा है,
किया है इश्क़ हमने, इश्क़ का अंजाम देखा है।”
इस शे’र में ज़िंदगी और इश्क़ दोनों का मुकम्मल तजुर्बा एक साथ बयान होता है। इसी तरह
“तुम्हारी याद में रहता है कोई बेकरार अब भी,
चले आओ कि किसी को है तुम्हारा इंतज़ार अब भी।”
यहाँ जुदाई का दर्द महज़ शख़्सी नहीं रहता, बल्कि एक आम इंसानी एहसास बन जाता है।
दीवान के कई अशआर इस दर्द को और गहराते हैं
“ज़िंदगी हमसे आँखें चुराती रही,
ज़िंदगी से हम आँखें मिलाते रहे।”
“जिगर छलनी है अब तक और सीना है फ़िगार अब भी।”
इन अशआर में दर्द का बयान महज़ तख़य्युल नहीं, बल्कि जिया हुआ तजुर्बा बनकर सामने आता है।
फ़न, बहर और लहजा:
अगर फ़नकारी नुक्ता-ए-नज़र से देखा जाए तो हज़ी साहब की ग़ज़लों में बहर की पाबंदी और लफ़्ज़ों की नर्मी क़ाबिले-तारीफ़ है। उनकी ज़्यादातर ग़ज़लें आसान और रवां बह्रों में कही गई हैं, जिससे उनका कलाम पढ़ने और सुनने दोनों में असर पैदा करता है।
उनके यहाँ क़ाफ़िया और रदीफ़ की पाबंदी भी साफ़ दिखाई देती है। मिसाल के तौर पर “अब भी” जैसी रदीफ़ उनके कई अशआर में एक ख़ास कैफ़ियत पैदा करती है, जो जुदाई और इंतज़ार के एहसास को और गहरा कर देती है।
हज़ी साहब की शायरी की सबसे बड़ी ताक़त उसकी सादगी है। उन्होंने मुश्किल इस्तिआरों और पेचीदा अल्फ़ाज़ से परहेज़ किया। उनका अंदाज़ बयान सीधा और असरदार है। यही वजह है कि उनका कलाम अवाम में भी मक़बूल रहा और ख़ास में भी सराहा गया। उनके यहाँ जज़्बात का उबाल भी है और एक ठहरी हुई कैफ़ियत भी जैसे समंदर में तूफ़ान भी हो और गहराई का सुकून भी। हज़ी साहब के मरासिम साबिक गवर्नर मोहम्मद उस्मान आरिफ़ साहब से बहुत अच्छे थे और दोनों परिवार आज भी इन रिश्तों को शिद्दत से निभा रहे हैं ।
तख़य्युल और फ़िक्र की वुसअत:
हज़ी साहब के यहाँ इश्क़ का तसव्वुर महज़ आशिक़ और माशूक़ के दरमियान महदूद नहीं रहता। वह ज़िंदगी, वक़्त और इंसानी हालात से भी मुहब्बत का रिश्ता जोड़ते हैं। उनके अशआर में एक मुकम्मल फ़लसफ़ा नज़र आता है
“ज़िंदगी हमसे आँखें चुराती रही,
ज़िंदगी से हम आँखें मिलाते रहे।”
यहाँ इश्क़ ज़िंदगी से जंग का नहीं, बल्कि उसके साथ समझौते और तआल्लुक़ का इस्तिआरा बन जाता है।
इंसानियत और तालीमी ख़िदमत:
हज़ी साहब की शख़्सियत का दूसरा अहम पहलू उनकी तालीमी और इंसानी ख़िदमत है। बीकानेर में उन्होंने बरसों तक पढ़ाया और अपने किरदार से साबित किया कि असल उस्ताद वही है जो इल्म के साथ इंसानियत भी सिखाए। यही वजह है कि उनके तलबा आज भी उन्हें सिर्फ़ टीचर नहीं, बल्कि एक रहबर के तौर पर याद करते हैं।
उनकी शायरी में भी यही इंसानियत झलकती है जहाँ दर्द महज़ अपना नहीं, बल्कि दूसरों का भी होता है और मुहब्बत महज़ एक रिश्ता नहीं, बल्कि पूरी ज़िंदगी का रवैया बन जाती है।
विरासत और असर:
हज़ी साहब का इंतिक़ाल 18 जुलाई 1985 को हुआ, मगर उनका कलाम आज भी ज़िंदा है। उनकी अदबी विरासत को आगे बढ़ाने में उनकी साहबज़ादी डॉ. सुलक्षणा दत्ता का अहम किरदार है, जो खुद भी उम्दा कवयित्री हैं और वालिद साहब की याद में कई अदबी कार्यक्रम आयोजित कर चुकी हैं।
आज भी जब उर्दू अदब में सादगी, दर्द और सच्चाई की बात होती है, तो हज़ी साहब का नाम एहतिराम से लिया जाता है। उनका कलाम हमें यह एहसास दिलाता है कि असल शायरी वही है जो दिल से निकले और दिल तक पहुँचे और यही उनकी सबसे बड़ी पहचान है।