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पॉलिटिकल नब्ज : 15 प्रत्याशियों का चुनावी अखाड़ा, आमने-सामने संजय आचार्य और दीपक व्यास, कांग्रेस के बागी ने बढ़ाई टेंशन, दो निर्दलीय महिलाएं भी मैदान में, साढ़ुओं की चुनावी चर्चा भी चटखारे ले रही

 

 

 

 

 

RNE वार्ड राउंड : पॉलिटिकल नब्ज | वार्ड 2

बीकानेर के जिन वार्डों में इस बार सबसे दिलचस्प और बहुकोणीय चुनावी मुकाबला देखने को मिल रहा है, उनमें वार्ड संख्या 2 सबसे ऊपर है। सामान्य वर्ग के इस वार्ड में शहर के किसी भी वार्ड से ज्यादा 15 प्रत्याशी चुनाव मैदान में हैं। इनमें 13 निर्दलीय हैं, जबकि दो निर्दलीय महिलाएं भी मुकाबले का हिस्सा हैं। ऐसे में यहां मुकाबला सिर्फ भाजपा और कांग्रेस के बीच नहीं रह गया है, बल्कि हर प्रत्याशी अपने हिस्से का वोट तलाश रहा है।

दीपक की पारिवारिक पृष्ठभूमि, संजय के राजनीतिक सोच में मुकाबला : 

वार्ड की मुख्य लड़ाई भाजपा के दीपक व्यास और कांग्रेस के संजय आचार्य के बीच मानी जा रही है।कांग्रेस ने यहां युवा कांग्रेस और NSUI के पूर्व अध्यक्ष तथा संगठन महासचिव की जिम्मेदारी संभाल चुके गांधीवादी एक्टिविस्ट संजय आचार्य को मैदान में उतारा है। संजय का राजनीतिक सफर संगठन और सामाजिक सक्रियता से जुड़ा रहा है। दूसरी ओर भाजपा के दीपक व्यास युवा चेहरे के साथ राजनीतिक परिवार से आते हैं। वे भाजपा के पूर्व शहर अध्यक्ष और दिग्गज नेता रामकिसन आचार्य के भांजे हैं।

दीपक के साथ अनुभव की टीम : 

दीपक व्यास के चुनावी अभियान में युवा चेहरे के साथ संगठन और चुनावी राजनीति का अनुभव भी दिखाई दे रहा है। उनके रणनीतिकारों में पूर्व उप महापौर अशोक आचार्य जैसे अनुभवी नेता शामिल हैं। ऐसे में भाजपा अपने युवा प्रत्याशी के पक्ष में संगठनात्मक ताकत और अनुभवी चुनावी प्रबंधन को जोड़ने की कोशिश में है।

संजय के साथ दिलचस्प ‘साढ़ू फैक्टर’ : 

वार्ड-2 का चुनाव सिर्फ राजनीतिक समीकरणों के कारण ही चर्चा में नहीं है। यहां एक पारिवारिक संयोग भी चुनावी चटखारे का विषय बना हुआ है। संजय आचार्य के रिश्ते में साढ़ू और पूर्व मंत्री बी.डी. कल्ला के भतीजे अनिल कल्ला भी एक वार्ड से चुनाव मैदान में हैं। लिहाजा बीकानेर की चुनावी चर्चाओं में अब ‘साढ़ुओं की चुनावी जोड़ी’ भी अपने अंदाज में चर्चा बटोर रही है।

13 निर्दलीयों में कांग्रेस का बागी फैक्टर : 

इस पूरे मुकाबले में सबसे अहम पेंच 13 निर्दलीय प्रत्याशियों का है। इनमें शिवशंकर बिस्सा ने कांग्रेस से टिकट मांगा था, लेकिन टिकट नहीं मिलने के बाद वे निर्दलीय के तौर पर मैदान में डटे रहे। इसलिए राजनीतिक तौर पर उन्हें "कांग्रेस का बागी प्रत्याशी" कहा जा सकता है। हालांकि चुनाव में किसी निर्दलीय को सीधे किसी पार्टी के वोट काटने वाला मान लेना जल्दबाजी होगी। असली सवाल यह है कि सुरेंद्र स्वामी, राजेन्द्र कुमार, सुरेश, लक्ष्मी पारीक, विनोद कुमार, शिवशंकर बिस्सा, दिधिति शर्मा, गोपाल, गिरधारी लाल सुथार, तेजेंद्र श्रीमाली, खेतनाथ, चन्द्रमोहन और रास बिहारी इन 13 निर्दलीयों में से कितने प्रत्याशी वास्तव में अपना व्यक्तिगत वोट बैंक मैदान में उतार पाते हैं। यही इस वार्ड के चुनाव को और पेचीदा बनाता है।

2019 में सिर्फ 67 वोट का फैसला : 

वार्ड-2 का पिछला चुनाव भी बेहद करीबी था। 2019 में भाजपा की सुधा आचार्य ने कांग्रेस की भावना को महज 67 वोटों से हराया था। उस चुनाव में भाजपा को 1,249 और कांग्रेस को 1,182 वोट मिले थे।अब 2026 में तस्वीर पूरी तरह बदल गई है। वार्ड सामान्य हो चुका है, मतदाताओं की संख्या बढ़कर 7,289 हो गई है और मैदान में 15 प्रत्याशी हैं।

पॉलिटिकल नब्ज : 

वार्ड-2 में एक तरफ दीपक व्यास का राजनीतिक परिवार और संगठनात्मक अनुभव, दूसरी तरफ संजय आचार्य की संगठनात्मक पृष्ठभूमि और गांधीवादी छवि है। इनके बीच 13 निर्दलीय प्रत्याशी चुनाव को त्रिकोणीय या बहुकोणीय बनाने की क्षमता रखते हैं। सबसे बड़ा सवाल यही है क्या मुकाबला भाजपा बनाम कांग्रेस रहेगा, या 13 निर्दलीय प्रत्याशी इस चुनाव की पूरी तस्वीर बदल देंगे? वार्ड-2 में वोटों की बिखराव की दिशा ही नतीजे की दिशा तय कर सकती है। अब देखना यह है कि क्या संजय कांग्रेस की हार का बदला लेंगे? या सुधा आचार्य की सीट बचा लेंगे दीपक व्यास! यही है वार्ड-2 की पॉलिटिकल नब्ज।