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साढ़े पांच दशक से रंगकर्म को जी रहे हैं प्रदीप भटनागर, अपने कर्म से ही वे बने हैं बीकानेर थियेटर के प्रयाय

आज भी जिनकी रंग सक्रियता करती है युवाओं को शर्मिंदा
नाटक उनके लिए ग्लैमर नहीं, जीने का सलीका है
 

मधु आचार्य ' आशावादी '

RNE Special.
 

नाट्य समीक्षक व नटरंग के संपादक स्व नेमीचंद्र जैन ने एक बार समग्र भारतीय रंगमंच का मूल्यांकन करते हुए नाट्यालेख लिखा था। जिसमें उत्तर, दक्षिण व पूर्वी भारत के रंगमंच पर गहन दृष्टिपात किया था। उस आलेख में स्व जैन ने बीकानेर के लिए अनमोल बात लिखी। अपने उस आलेख में स्व जैन ने बीकानेर को उत्तर भारत की नाट्य राजधानी बताया। 

उस आलेख के बाद पूरे देश के रंगकर्मी बीकानेर की तरफ ध्यान देने लगे। या यूं कहें कि बीकानेर के रंगकर्म को नोटिस करने लगे। नहीं तो देश में बात केवल बड़े शहरों के रंगकर्म की ही होती थी। पश्चिम भारत की सीमा पर बसे इस बीकानेर का प्रतिभाओं की मौजूदगी के बाद भी कभी कोई जिक्र नहीं होता था। उस आलेख के बाद यहां के रंगकर्म को राष्ट्रीय फलक पर बड़ी पहचान मिली।
 

वरिष्ठ रंगकर्मी व समीक्षक स्व जैन ने बीकानेर के लिए यह लाइन यूं ही नहीं लिखी थी। उस समय बीकानेर में जबरदस्त रंगकर्म होता था। चार रंग संस्थाएं बराबर नाटक मंचित करती थी। एक महीनें में एक नहीं कम से कम 3 नए नाटक मंचित होते थे। उनकी प्रस्तुतियां भी 3 से 4 तक होती थी।

मतलब बीकानेर में समय 12 दिन तक नाटक मंचित होते थे। यह संख्या बहुत बड़ी थी, वजह यह कि यहां का पूरा रंगकर्म अव्यावसायिक था। बीकानेर ने प्रस्तुतियों के मामले में जयपुर, उदयपुर, जोधपुर, कोटा और अजमेर को भी पीछे छोड़ दिया था। वह भी लगातार दो साल तक।

उस समय मंचित होने वाले अधिकतर नाटकों में एक रंगकर्मी हर समय मौजूद दिखता था। चाहे अभिनय हो, प्रस्तुति प्रबन्ध हो, मेकअप हो, मंच सज्जा हो या नाटक की रिहर्सल। उस सक्ष की मौजूदगी केवल और केवल नाटक के लिए होती थी। वह अभिनेता को बारीकियां बताता। रिहर्सल के स्थान की सफाई करनी होती तो वह भी करता। कलाकारों के लिए पानी की व्यवस्था करनी होती तो वह भी करता। यह सब काम एक समर्पित भाव से किया करता था। जरा सी शिकन उसके चेहरे पर नहीं आती। ऐसा लगता जैसे उसका जीवन रंगमंच के लिए ही बना है। जबकि वह स्वयं सेल टेक्स विभाग में अच्छे ओहदे की सर्विस में भी थे। हर रंगकर्मी के इस चहेते कलाकार का नाम था प्रदीप भटनागर। जिसे देखते ही हर समर्पित रंगकर्मी का सिर श्रद्धा से झुक जाता था। वे बहुत ही विनम्र। बड़ों को हाथ जोड़ते और छोटों का दुलार करते। उस सख्स प्रदीप भटनागर की पहचान खालिस रंगकर्मी के रूप में थी। हर नाटक, हर कलाकार, हर निर्देशक, हर दर्शक उनकी नजर से गुजरता था।

रंगकर्म के प्रयाय हैं प्रदीप जी:

आज  यदि हम बीकानेर रंगमंच के 50 साल के इतिहास को उठाकर देखें तो हर बड़े रंग कदम पर हमें मजबूती से खड़े हुए प्रदीप भटनागर अवश्य दिखते हैं। उनको इसी कारण बीकानेर व बाहर के रंगकर्मी शान से बीकानेर रंगमंच का प्रयाय भी कहते हैं।

एक समय था जब बीकानेर में मंचित होने वाले 60 फीसदी से अधिक नाटकों में प्रदीप जी बतौर कलाकार शामिल दिखते थे। अच्छे रंग निर्देशक व समीक्षक कहते हैं,  जो बात सही भी है कि नाटक कलाकार का माध्यम है। प्रदीप जी ने इस बात को प्रमाणित किया है। बीकानेर में लोगों ने वो दौर भी देखा है जब दर्शक को नाटक देखने के लिए आने का कोई निमंत्रण देता था तो उसका पहला सवाल यही होता था कि क्या नाटक में प्रदीप भटनागर अभिनय कर रहे हैं क्या? जब उत्तर हां में मिलता तो वो दर्शक नाटक देखने अवश्य आता था। एक कलाकार जब नाटक का प्रयाय बन जाये तो उसका रंगकर्म सार्थक हो जाता है। बीकानेर में यह गौरव प्रदीप भटनागर को हासिल है। इस बात का फक्र हर रंगकर्मी को भी है।
 

उस 70, 80 के दशक से लेकर आज तक हर निर्देशक यह चाहता है कि उसके नाटक में प्रदीप भी बतौर अभिनेता शामिल हों। उनकी उपस्थिति नाटक की सफलता की गारंटी थी। भिन्न भिन्न पात्रों को अभिनीत करने का गुर इस कमाल के अभिनेता के पास था। निर्देशकों व दर्शकों का समान रूप से कोई कलाकार चहेता हो, यह कम ही होता है। क्योंकि हर शहर में प्रदीप भटनागर नहीं होता। जिसको घर, परिवार, समाज, बुद्धिजीवी, लोग एक कलाकार के रूप में जानते हों और सम्मान करते हों।

प्रदीप जी के उस्ताद प्रदीप जी:

अक्सर हम देखते हैं कि हर कलाकार का कोई न कोई उस्ताद होता ही है, जो उसको आगे बढ़ाने का काम करता है। प्रदीप भटनागर वो बिरले कलाकार हैं जो अपने उस्ताद खुद है। बीकानेर में रंग सुविधाओं का उस समय भयानक अकाल था, सूखा पड़ा हुआ था, जब वे रंगकर्म की दुनिया में आये। न अच्छा हॉल। न नाट्य आलेख। ना नाट्य की सैद्धान्तिक पुस्तकें। न बाहर के लोग यहां नाटक मंचित करने आते थे। न कोई निर्देशक इस सुदूर के शहर में प्रशिक्षण देने के लिए आता था। सब तरफ ' ना ' ही था जब प्रदीप जी ने रंगकर्म की तरफ कदम बढ़ाये।

 

इस हालत में वे ही अपने उस्ताद बने। जिस समय नाटक की पुस्तकें व पत्रिकाएं लोग पढ़ते भी नहीं थे, उस समय प्रदीप जी ने उनको जुटाकर पढ़ना आरम्भ किया। क्योंकि मन में कलाकार बनने की धुन थी। जो भी निर्देशक मिला, जैसा भी बताया , उसे सीखा और उसको रिच किया अपने अध्ययन से। उस समय उनके अभिनय को देखकर निर्देशक भी विस्मित रह जाते थे। क्योंकि उन निर्देशकों के पास सैद्धान्तिक अनुभव नहीं था, बस नाटक करना चाहते थे।
 

प्रदीप जी एक मुक्कमिल कलाकार अपने उस्ताद प्रदीप जी के कारण ही बने। उनकी आज की लगन को देखकर कोई भी इस बात को आंक सकता है। वे सेल्फ मेड कलाकार हैं। नाटक पर पढ़ना उनकी नियमित दिनचर्या है। हर नए नाटक को पढ़ना चाहते हैं। हर उस पत्रिका को पढ़ते हैं जिसमें नाटक पर कुछ छपा होता है।
 

शुरुआत में वे खुद ही अपने उस्ताद बनकर सीखते रहे। बाद में अनेक रंग निर्देशक भी प्रशिक्षण देने बीकानेर आये, उसमें कोरे बनकर भाग लिया और बहुत कुछ सीखा। उनकी सीखने की ललक आज भी उतनी ही है, जितनी 50 साल पहले थी। यही तो उनको आज भी रंगकर्म में सक्रिय किये हुए हैं।

कम शब्द, बड़ी बात, बेबाक बोल:

प्रदीप जी बीकानेर के वो रंगकर्मी है जिनको कभी भी किसी ने अधिक बोलते हुए नहीं देखा है। बहुत कम बोलते हैं। उनको किसी आयोजन में बोलने के लिए खड़ा करें, उस समय भी वे कम शब्दों व कम समय में केवल विषय केंद्रित बात कहकर बैठ जाते हैं। मगर जो बोलते हैं वो किताबी नहीं होता, लफ्फाजी नहीं होती, काम की बात होती है। यह गुण उसी रंगकर्मी में संभव है जिसके पास गहरा अनुभव हो और पूरा अध्ययन हो।

 

नाट्य परिचर्चाओं, गोष्ठियों और अनोपचारिक नाट्य मंथन में वे सटीक टिप्पणी करते हैं। जो कोई नहीं बोलता, वह बात बोलते हैं, उनकी बात में पहले की सुनी किसी बात का रिपीटेशन नहीं होता। नई बात कहते हैं और पूरी नाट्य चर्चा को गम्भीर बना देते हैं। 
 

प्रदीप जी का सबसे बड़ा गुण है बेबाकी का। चाहे कितने ही बड़े रंग निर्देशक व लेखक से बात कर रहे हों, झिझकते नहीं। अपनी बात बेबाकी से कहते हैं। इसकी बड़ी वजह उनका विस्तृत नाट्य अध्ययन है। इसके अलावा अपडेट रहते हैं, इस वजह से सामयिक रंगकर्म के उदाहरण अपनी बात में देते हैं। ये तीन गुण उनके विशाल नाट्य व्यक्तित्त्व को अभिव्यक्त करते हैं।

अच्छे नाट्य समीक्षक हैं वो:

बीकानेर में नाट्य समीक्षा की कोई परम्परा नहीं थी। अखबार जो भी थे वे नाटक की खबर प्रमुखता से सह्रदय होकर छापते थे। मगर संपादक साफ कहते थे कि लिखकर आपको देनी होगी, हमारे पास इस विषय का कोई जानकर नहीं है। 

उस दौर में अखबारों में समीक्षा लिखने, आलेख लिखने का काम भी प्रदीप जी ने किया। जब कालांतर में कुछ अन्य लोगों ने नाट्य समीक्षा लिखनी आरम्भ कर दी तो उन्होंने लिखना बन्द कर दिया। उनका कहना था, मेरा ध्येय अखबार के पाठकों को नाटक की खबर पढ़ने का अभ्यस्त बनाना था ताकि दर्शक मिले, जब यह काम अन्य साथियों ने शुरू कर दिया तो मैंने रोक दिया। मैं तो कलाकार हूं, मेरा काम अभिनय करना है। समीक्षा तो दर्शक बनाने के लिए की थी। मतलब उनको खुद को प्रोजेक्ट करने का कोई मोह नहीं है।

दूसरों के श्रेष्ठ की रक्षा करने का गुण:

प्रदीप जी ने वरिष्ठ रंग निर्देशक स्व मंगल सक्सेना के साथ काफी काम किया। वे रोज रिहर्सल या नाट्य वाचन से पहले वंदना कराते थे। स्पीच की एक्सरसाइज कराते थे और कुछ कलाकारों से नीति वाक्य बुलवाते थे। ताकि हर रंगकर्मी पहले एक बेहतर इंसान बने, फिर बेहतर कलाकार। बेहतर कलाकार वही बन सकता है जो बेहतर इंसान हो, यह पहली अनिवार्यता है। इसे प्रदीप जी ने जीवन में पूरी तरह उतारा हुआ है।

 

उस समय मंगल जी बुलवाते थे, मैं अपना श्रेष्ठ अपनी पहल से दूंगा और दूसरों के श्रेष्ठ की रक्षा करूंगा। इस वाक्य को कई कलाकार बोलते थे, मगर उसको पूरी तरह आत्मसात प्रदीप जी ने किया हुआ है। कुछ समय पहले एक संस्था ने उनको सम्मानित करने का निर्णय राष्ट्रीय आयोजन में किया।

नकद राशि भी दी जानी थी। मगर प्रदीप जी ने इंकार कर दिया। केवल इंकार नहीं किया, यह भी आयोजकों को बताया कि मुझसे पहले मेरे एक वरिष्ठ रंगकर्मी है, आपको उनका सम्मान करना चाहिए। संस्था ने भी अपनी गलती को सुधारा। आज के समय में कौन करता है ऐसा ? प्रदीप जी ने किया, क्योंकि उन्होंने सैकड़ों बार बोला था कि दूसरे के श्रेष्ठ की रक्षा करूंगा। जो बोला था, उसे चरितार्थ भी करके दिखाया। इस दौर में ऐसा रंगकर्मी ढूंढने पर भी नहीं मिलता।

अभिनेता नहीं, पूरे रंगकर्मी हैं वो:

अक्सर यह देखा जाता है कि जो अच्छा व बड़ा अभिनेता होता है और जिसके पास नाटक का लीड रोल होता है, वह फिर एक्टिंग के अलावा कोई काम नहीं करता। मगर प्रदीप जी इसके विपरीत थे।

 

वे पहले लीड रोल की तैयारी करते हुए पूरी रिहर्सल करते। रिहर्सल के बाद बाकी टीम के साथ पोस्टर लिखते। फिर आधी रात के बाद शहर में पोस्टर लगाने निकलते। क्योंकि उस समय नाटक के प्रचार का काम भी कलाकारों ही करना पड़ता था। प्रचार के साधन, मोबाइल, वॉट्सऐप या होर्डिंग आदि तो थे नहीं। पूरी रात पोस्टर कलाकार ही लगाते थे, जिनमें प्रदीप जी भी हुआ करते थे। दिन में दफ्तर की नोकरी, शाम के बाद रंगमंच। बीच में घर का काम।
 

इसके अलावा टिकट बेचना, वेशभूषा जुटाना, नाट्य सामग्री मांगकर एकत्रित करना आदि काम भी प्रदीप जी मनोयोग से करते थे। वे केवल अभिनेता नहीं, मुक्कमिल रंगकर्मी थे ।

बड़ों का सम्मान, छोटों से स्नेह:

प्रदीप जी बीकानेर के वो रंगकर्मी हैं जिनको बड़े भी बहुत ही स्नेह करते हैं और छोटे तो उनसे बेहद खुश रहते हैं। उन्होंने रंगकर्म के संस्कारों को आज भी अंगेजा हुआ है। इस कारण ही प्रदीप जी के मन के खजाने में सम्मान व स्नेह, दोनों ही भरे हुए हैं। वे इसे दिल खोलकर खर्च भी करते हैं, तभी तो यह खजाना जीवन के 70 वसंत पार कर लेने के बाद भी खाली नहीं हुआ। लबालब भरा हुआ है। शहर के नाट्य दर्शक व साहित्यकार उनको बीकानेर रंगमंच का देवानन्द कहते हैं। सदाबहार कलाकार। 

पहली व आखिरी पसंद ' नाटक ':

प्रदीप भटनागर वो रंगकर्मी है जिनकी पहली और आखिरी पसंद " नाटक ' है। नाटक मंचन के लिए कोई भी उनसे सहयोग मांगने आता है तो वे हां कहने में जरा सी भी देरी नहीं करते। बीकानेर के अनेक नाटक इस बात की साख भरते हैं कि यदि वे साथ खड़े नहीं होते तो वे नाटक मंच तक पहुंचते ही नहीं। रिहर्सल में उनकी केवल उपस्थिति ही उन नाटकों के मंचन की वजह बन गयी। वे कलाकारों व निर्देशक की हौसला अफजाई में कोई कोर कसर नहीं छोड़ते, तब इनको मजबूरन नाटक को मंच तक ले जाना पड़ता। भले ही उन्होंने कुछ धारावाहिकों व फिल्मों में अभिनय किया, मगर उनकी पहली व आखिरी पसंद केवल नाटक ही है।

युवा भी उनकी सक्रियता से शर्मिंदा:

प्रदीप जी रिहर्सल व मंचन के समय जिस तरह की सक्रियता व सजकता रखते हैं, उसे देखकर युवा भी शर्मिंदा हो जाते हैं। नाटक उनमें 20 साल के युवा जितना जोश भर देता है। वे कोई भी काम उस समय छोटा नहीं समझते, कोई दूसरा कर ले इसकी प्रतीक्षा भी नहीं करते, खुद ही तुरन्त वो काम कर लेते हैं। यह भावना यदि हर शहर के हर रंगकर्मी में हो तो भारतीय रंगमंच की प्रतिस्थापना को कोई रोक ही नहीं सकता। रंगमंच के पास दर्शकों की भी कमी नहीं रहेगी। तभी तो कहा जाता है, बीकानेर रंगमंच का विशाल दरख़्त जिन लोगों के पसीने पर टिका हुआ है उनमें एक मजबूत स्तम्भ प्रदीप भटनागर भी है।

हिंदी रंगमंच परिचित है इस आलीजा रंगकर्मी से:

केवल बीकानेर रंगमंच ही नहीं, अपितु उत्तर भारत का पूरा हिंदी रंगमंच इस आलीजा रंगकर्मी से परिचित है। सबको इस कलाकार के बीकानेर रंगमंच को दिए योगदान की जानकारी है। तभी तो दूसरी जगहों के रंगकर्मी बातचीत में कहते हैं कि हर शहर के पास प्रदीप भटनागर जैसा एक रंगकर्मी होना चाहिए। रंगमंच व मंचन की अनवरता के लिए यह बेहद जरूरी है। बीकानेर भाग्यशाली हैं कि उनके पास एक ऐसा रंगकर्मी है।

 

बीकानेर से बाहर हिंदी रंगमंच में प्रदीप जी ने केवल अपनी पहचान नहीं बनाई है, अपितु बीकानेर रंगमंच की पहचान बनाई है। यह बीकानेर के लिए बड़ी उपलब्धि मानी जानी चाहिए। बीकानेर का  रंग इतिहास प्रदीप जी के बिना अधूरा है। अब भी उनकी सक्रियता पहले की तरह ही है, ये बड़ी बात है। अव्यावसायिक रंगमंच करते हुए कोई रंगकर्मी इतनी बड़ी रंगयात्रा कर ले, ऐसा कोई दूसरा उदाहरण अब तक तो हिंदी रंगमंच में नहीं मिला।

रंगमंच उनके लिए ग्लैमर नहीं:

प्रदीप भटनागर ने इस तरह की इतनी लंबी यात्रा की है और अब भी गतिमान है। इसके पीछे भी उनका एक गहरा सोच, विचार और दृष्टिकोण है। प्रदीप जी प्रायः कहते हैं, रंगमंच मेरे लिए ग्लैमर या फैशन नहीं। तालियां बटोरने का साधन नहीं। प्रसिद्धि पाने का जरिया नहीं। खुद को स्थापित करने का साधन नहीं। पैसा कमाने का जरिया नहीं। प्रशंषा की भूख मिटाने की चीज नहीं। 

 

प्रदीप भटनागर मानते हैं , रंगमंच मेरे लिए जीने का सलीका है। जीने की वजह है। सामाजिक दायित्त्व है। समाज का कर्ज चुकाने का प्रयास है। इंसान बनने की कोशिश है। इंसानियत को जिंदा रखने का उपक्रम है। मानव के प्रति प्रतिबद्धता है। तभी तो वे अव्यावसायिक रंगमंच की कठिन, पथरीली पगडंडी पर अब भी चल रहे हैं, चलते जा रहे हैं। एक अजात शत्रु की तरह।