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चेहरे पर मुस्कुराहट रखने को अदबी होना मानते हैं बुनियाद, अदब में बेअदबी जरा सी भी स्वीकार्य नहीं

देश के मुशायरों के चहेते शायर है बुनियाद हुसैन उर्फ बुनियाद जहीन
 
 

मधु आचार्य ' आशावादी '

RNE Special.
 

( बीकानेर के साहित्य को पूरे देश में सम्मान दिया जाता है। इस बड़े शहर के रचनाकारों की बड़ी प्रोफ़ाइल है। इन्होंने न केवल पश्चिमी सीमा पर स्थित बीकानेर से चलकर पूरे देश में डग भरे, अपितु इस शहर की थरपणा भी देश मे की। इन रचनाकारों ने सीमाओं व वर्जनाओं को तोड़ा। बीकानेर व देश के हर प्रान्त के मध्य पुल बनाया। इस कारण ही आज बीकानेर के साहित्य जगत को पूरे देश में पहचान मिली। आज जो बीकानेर के रचनाकार अपने को राष्ट्रीय फलक पर चर्चित पाते हैं, उसमें कई रचनाकारों की मेहनत लगी है। उन्होंने पसीने से बीकानेर के साहित्य दरख़्त को सींचा है।  बीकानेर की पूरे देश में हिंदी, उर्दू और राजस्थानी साहित्य को लेकर बड़ी पहचान है। उन लोगों के प्रति कृतज्ञता प्रकट करते हुए रुद्रा न्यूज एक्सप्रेस ( RNE) यह कॉलम आरम्भ कर रहा है। इस कड़ी में हम अपने पाठकों से अब तक कवि, कथाकार मालचंद तिवाड़ी, ज्योतिषाचार्य राजेन्द्र व्यास ' मम्मू महाराज ' व युवा आइकॉन, सीए सुधीश शर्मा से परिचित करा चुके हैं। आज हम रु ब रु करा रहे हैं उर्दू के देश में चर्चित शायर बुनियाद हुसैन से, जिनको उर्दू साहित्य में बुनियाद जहीन के नाम से जाना जाता है। आप इस कॉलम पर अपनी प्रतिक्रिया से जरूर परिचित करायें। - संपादक )
 

बीकानेर को पूरे भारत में साहित्य की दुनिया में ' त्रिवेणी ' नाम से भी संबोधित किया जाता है। त्रिवेणी के कारण ही यह शहर छोटी काशी के रूप में भी परिभाषित होता है। त्रिवेणी को अधिक स्पष्ट करें तो वो है हिंदी, उर्दू और राजस्थानी भाषा की त्रिवेणी। इस शहर में इन तीनों भाषाओं का साहित्य समान रूप से पल्लवित होता है और पूरे देश में अपनी महक को फैलाता है। 

हिंदी साहित्य को इस शहर ने छगन मोहता, यादवेंद्र शर्मा ' चन्द्र ', योगेंद्र किसलय, रामदेव आचार्य, हरीश भादानी, डॉ नंदकिशोर आचार्य से लेकर वर्तमान तक अनेक रचनाकार दिए हैं। जिनसे हिंदी साहित्य पहचाना जाता है। वहीं राजस्थानी साहित्य में भी इस शहर के श्रीलाल नथमल जोशी, अन्नाराम सुदामा, मुरलीधर व्यास ' राजस्थानी ', निर्मोही व्यास, ए वी कमल, मोहम्मद सदीक आदि से लेकर अनेक लेखकों की बड़ी पहचान पूरे देश में है। 
 

हिंदी और राजस्थानी के साथ साथ यहां का उर्दू अदब भी खास मायने रखने के कारण पूरे देश में पहचाना जाता है। यहां के उर्दू साहित्य  को दिल्ली, भोपाल, आजमगढ़, मेरठ, लखनऊ, मुम्बई आदि शहरों की तरह ही पूरा देश सम्मान देता है। मोहम्मद उस्मान आरिफ, खुर्शीद अहमद, गाजी साहब, वफ़ा साहब, शाद साहब, दीन मोहम्मद मस्तान, शमीम बीकानेर आदि उर्दू अदब के लोगों की एक लंबी श्रृंखला है, जिन्होंने उर्दू साहित्य में बीकानेर को खास पहचान दिलाई। दिल्ली में जब भी उर्दू साहित्य की बात होती है तो वो बीकानेर के जिक्र के बिना अधूरी रहती है। 

बीकानेर का उर्दू साहित्य यहां के कमलकारों की भाषा व इंसानियत के प्रति प्रतिबद्धता का जीता जागता नमूना है। उर्दू शायरी में वक्त के साथ जितने भी बदलाव आए, उनमें बीकानेर के उर्दू साहित्य की भी महत्ती भूमिका रही है। बदलाव को अंगेजते हुए यहां के उर्दू साहित्य ने नए नए सफल प्रयोग शायरी में किये। बीकानेर के इसी उर्दू अदब की परंपरा में मजबूती से खड़े हैं शायर बुनियाद हुसैन ' जहीन '। इस शायर को इस बात का इल्म है कि मेरे शहर की उर्दू साहित्य की परंपरा क्या है, किसी भी सूरते हाल में मुझे उससे नीचे साबित नहीं होना है। इस परम्परा के भान के कारण ही बुनियाद ने अपने अब तक के अदबी सफर में अपने अग्रजों को सम्मान दिया है। आज भी उनके सीख को वे बोलते हैं और उनके योगदान को उल्लेखित करते हैं। इस नजरिए से देखा जाए तो बुनियाद एक मुक्कमिल शायर है, जिसे परम्परा का भी बखूबी ज्ञान है। इस शायर को पता है कि उर्दू साहित्य की क्या परम्परा है। बीकानेर के उर्दू साहित्य की क्या गोयरवमयी परम्परा है। बुनियाद को इस बात का भान है कि मुझे उर्दू अदब ही नहीं, खुद की ही नहीं, पूरे बीकानेर के आब की रक्षा अपनी कलम से करनी है। जब इतना भान हो तो कलम कभी टेढ़ी मेढ़ी नहीं  चल सकती। राह नहीं भटक सकती। वह सदैव सही मार्ग पर चलेगी और आदमी उसकी मंजिल है, उस तक पहुंचेगीं। बुनियाद की पूरी शायरी इस बात की साख भरती है कि इस शायर को वर्तमान में जीने की अच्छी आदत है, मगर वो अपनी परम्परा को कभी नहीं बिसराता है।

चेहरे की मुस्कुराहट है पहचान:

कवियों और शायरों का झुंड प्रायः नागरी भंडार, नरेंद्र सिंह ऑडिटोरियम या किसी साहित्यिक आयोजन से पहले व बाद में लगता है। कवि - शायर मिलकर हंसी मजाक की, अदब की बातें करते हैं, इन कवियों व शायरों की भीड़ में जो शख्स सबसे ज्यादा यानी हर समय चेहरे पर मुस्कुराहट रखे दिखाई दे, शहर के लोग समझ जाते हैं कि वहां बुनियाद जहीन खड़े हैं।

 

छोटा कद, मगर चेहरे पर बड़ी मुस्कुराहट, हंसी में एक ठसक मगर साथ में आवाज ठोस, बेबाकी के बोल और शब्दों के अनुरूप भाव, यही तो पहचान है शायर बुनियाद हुसैन की। जब किसी बात पर तकरार हो और जो ठोस बात के साथ साफगोई से अपना तर्क पुख्तगी के साथ रख रहा हो, समझ लेना चाहिए कि वह बुनियाद है। इसी कारण तो कहते हैं कि भीड़ में भी बुनियाद अपने कद से अपनी अलग पहचान बनाने में सफल रहते हैं। 

अपनी साफगोई के कारण इस शायर को अनेक बार सच बोलने के लिए बेवजह विरोध का भी सामना करना पड़ता है, मगर बुनियाद ने इस बात की कभी परवाह नहीं की। बुरे को बुरा, कमतर लिखे को कमतर कहने में यह फक्कड़ तबीयत का शायर गुरेज ही नहीं करता है। नफा - नुकसान सोचे बिना बेधड़क बोलता है, जो सच है और जो इसे सही लगता है। इस कारण ही लोग इसके जल्दी दुश्मन बन जाते हैं, मगर जब वे अकेले में अपने भीतर झांकते है तो उनको भी लगता है कि बात तो उसने सही कही थी। वे ही लोग कुछ समय बाद उसके साथ बतियाते नजर आते हैं।
 

बुनियाद के इस शेर से उसकी फ़ितरत को बखूबी समझा जा सकता है कि वो फक्कड़ तबीयत का है और मन में जो है, उसे कह ही देता है। नफा - नुकसान उसके दिमाग की ताकड़ी में कभी रहा है नहीं। 
 

शेर देखें :
 

बदलती फ़ितरत ने ज़िंदगी के, तकाज़े सारे बदल दिए हैं,
जिन्हें नज़र में चढ़ा रखा था, वो लोग दिल से उतर गए हैं ।


ध्यान व्यक्ति का नहीं, पढ़े शेर का:

आज के इस दौर में हम देखते हैं कि लोग बड़ा लेखक या शायर देखते हैं तो उसके लिखे घटिया शेर या कविता की तारीफ से सीमा से परबार जाकर करते हैं। उसके पीछे ध्येय केवल इतना सा होता है कि बड़ा शायर या लेखक वक़्त आने पर मदद कर दे। कहीं बड़े आयोजन में बुला ले या फिर पुरस्कार, सम्मान दिला दे। इस लोभ व लालच में उलझकर बुरी रचना की भी तारीफ कर देता है। मगर बुनियाद हुसैन इस वृत्ति के बिल्कुल विपरीत है।

 

बड़े से बड़ा शायर यदि कोई गलत शेर पढ़ता है या रदीब व काफ़िये में चूक करता है तो बुनियाद धड़ल्ले से उसकी कमी को उसे ही कह देता है। यह बात भले ही उसे नागवार हो, मगर बुनियाद कहने से परहेज नहीं करता। इसकी अपनी खास वजह है, बुनियाद ने उर्दू शायरी की पुख्ता तालीम ली है, उस्तादों से सीखा है और उसके बाद लिखा है। इतनी हिम्मत से वही शायर किसी के शेर की आलोचना कर सकता है जो शायरी का सैद्धान्तिक पक्ष पूरी तरह से जानता हो। उस मायने में देखें तो बुनियाद एक मुक्कमिल शायर है।

बुनियाद की गज़ल का एक शेर इस बात की साख भरता है --
 

मौत होती गयी हक़ीकत की
और जिंदा रही है अफवाहें
हर नफ़स को यकीन की सूरत
रास आने लगी है अफवाहें।

 

यह असरार बुनियाद की उसी जिंदादिली को अभिव्यक्त करते हैं। वो जिंदादिल शायर है और हर शेर को जीवन के गहरे अनुभव के बाद ही अपनी कलम से कागज पर उतारता है। इस कारण उसका हर शेर सुनने और पढ़ने वाले के दिल ही नहीं अहसास को भी छूता है। 

सूफ़ियाना अंदाज है इस शायर का:

 

यूं तो बीकानेर के उर्दू अदब में बहुत बड़े बड़े शायर हुए हैं जिनका अंदाज सूफी था। जिनकी धाक पूरे भारत के उर्दू साहित्य में थी। उस परंपरा को अब चुनिंदा शायरों ने ही जिंदा रखा हुआ है, बुनियाद उनमें से एक है। उसका हर शेर केवल शब्दों को सुनकर या पढ़कर नहीं समझा जा सकता, शब्दों के अहसास तक पहुंचना पड़ता है। जो सुनने वाला या पढ़ने वाला अहसास तक पहुंचता है, उसके मुंह से स्वतः एक ही शब्द निकलता है ' वाह ' ।
 

बुनियाद ने अपनी शायरी को फौरी नहीं रखा, जीवन का एक गहरा दर्शन उसकी हर गज़ल में होता है। यही तो साहित्यकार या शायर का मूल काम होता है।
 

पाश्चात्य सभ्यता के प्रभाव ने व्यक्ति को बहुत स्वार्थी व तंग दिमाग का बना दिया, यह पीड़ा शायर बुनियाद को भी है। तभी तो वह मिट्टी के जरिये जिंदगी और उसके मोल का फलसफ़ा अपनी गजलों में सामने रखता है।
 

उसकी एक गज़ल इस बात की गवाही के लिए प्रयाप्त है:
 

बाद फिर ज़िंदगी के क्या कहिये
सिर्फ़ बचता है प्यार मिट्टी का
है मुक्कमल हमारे जिस्मों पर 
दायमी इख्तियार मिट्टी का
आदमी की बिसात कितनी सी
आदमी है गुबार मिट्टी का ।

 

यह गज़ल उसके तत्त्व चिंतन का जीता जागता नमूना है। एक बार जब शिमला में दुनिया भर के लेखकों व शायरों का मेला लगा था, तब गज़ल के बदलते रूप पर बात चली। उस समय कश्मीर के शायर अजरुहदा ने कहा था , अब तो शायर को दुनिया की शायरी के समकक्ष अपने को खड़ा करने के लिए अन्य भाषाओं की कविताओं की तरह उर्दू में भी अपने विषय को दर्शन और उससे चिंतन तक ले जाना पड़ेगा। बुनियाद की शायरी देखकर लगता है कि वो इसी राह पर अपने को दौड़ाये हुए है और यही मंज़िल अपनी शायरी में पाने की कोशिश कर रहा है।
 

यहां  राजस्थानी के कवि, नाटककार, आलोचक डॉ अर्जुन देव चारण की भी बात याद आती है। वे कहते हैं, हर कवि - शायर को इस बात का इल्म होना चाहिए कि वो ऋषि परंपरा में खड़ा है। जीवन के गहरे अर्थ इसी परंपरा में होने पर समझ आते हैं और उसकी कविता - गजल समय का प्रतिबिंब बनती है। क्योंकि आधुनिकता की दौड़ में ज़िंदगी जटिल हो गयी है तो उसका सीधा असर व्यक्ति व समाज के साथ साहित्य पर भी हुआ है। इस कारण ही अब विषय बदले हैं और कवि - शायर का यह दायित्त्व बना हुआ है कि वो व्यक्ति की संवेदना को न मरने दे। संवेदना को जिंदा करना या जिंदा रखना ही कवि - शायर का धर्म है। डॉ चारण की बात के पैमाने पर तोलें तो बुनियाद इसी धर्म का पालन अपनी शायरी में करते हुए नजर आते हैं। उर्दू शायरी में बुनियाद हुसैन एक ऋषि की तरह ही काम कर रहे हैं, यह कहना कोई अतिश्योक्ति नहीं होगा। एक ऋषि ही एक जीवन में बारबार मरता है, बारबार जीता है। बुनियाद भी अपनी शायरी में इंसानियत की रक्षा के लिए बारबार जीते हैं, बारबार मरते हैं। वो बीकानेर उर्दू साहित्य के ऋषि हैं, यह कहना भी गलत नहीं होगा।

देश में बनाई है खास पहचान:

बीकानेर में वर्तमान में कुछ ही शायर हैं जिनकी राष्ट्रीय स्तर पर पहचान है, उनमें से एक बुनियाद हुसैन जहीन है। देश में कोई बड़ा मुशायरा होता है तो सबसे पहले बुनियाद को याद किया जाता है। मुशायरे में वही शायर दाद लुटता है जिसकी कलम में तो दम होता ही है मगर साथ में प्रस्तुति भी दमदार होती है। यह दोनों गुण बुनियाद में है। इस कारण ही उसकी गिनती व उनका गज़ल पाठ  देश के बड़े शायरों के बीच होता है।

 

बीकानेर की सीमाओं से पार जाकर इस बुनियादी शायर बुनियाद ने बीकानेर का नाम रोशन किया है। यह बात जब इस शायर को कहतें है तो बहुत ही विनम्र भाव के साथ सकुचाता रहता है। 
 

एक कहावत भी है, जो फलदार वृक्ष होता है वहीं विनम्रता के कारण झुका रहता है। जो ठूंठ होता है और जिसके पास केवल अकड़ ही होती है वो विनम्रता ला ही नहीं सकता। ऐसे भी शायर है बीकानेर में। इसी कारण बुनियाद ऐसे शायरों की भीड़ में बिल्कुल अलग नजर आता है। पहचान भी रखता है।
 

बुनियाद को पहचानना हो तो उससे एक बार मिलना जरूरी है। तब पता चलता है कि उसकी रग रग में अदब है। अदब की बुराइयों पर वो बेहद गुस्से में आ जाता है, यह उसके अदबी होने की पहचान है। बुनियाद की आठ से अधिक पुस्तकें भी आ चुकी है। इनाम इकराम भी खूब मिले हैं मगर उसका कहना है कि मेरा असली इनाम तो मेरे पाठक व श्रोता हैं। वे ही किसी भी रचनाकार की सही कसौटी होते हैं। इतने सम्मान, इतना लिखने के बाद कौन ऐसी बात करता है, केवल बुनियाद ही कर सकता है। बाकी लोग तो खुद ही अपने आगे राष्ट्रीय, अंतरराष्ट्रीय शायर के तगमे लगा लेते हैं। यह बीमारी बुनियाद को नहीं है। 

अदब का सम्मान उसका स्वभाव:

अक्सर दूसरे शहरों में देखा जाता है कि भाषाओं के बीच आपस में दूरियां रहती है। बीकानेर अदब की दुनिया का वो शहर है जिसमें हिंदी, उर्दू और राजस्थानी के बीच कोई विभेद नहीं करता। एक ही मंच पर प्रायः इन तीनों भाषाओं के रचनाकार रहते हैं और इन लोगों में परस्पर जबरदस्त लगाव होता है। इसकी वजह तीनों भाषाओं के रचनाकारों की सहजता, सदासयता व सद्भाव है, इस भावभूमि को जिन रचनाकारों ने निर्मित किया, उनमें बुनियाद हुसैन भी शामिल है। 

 

अभी तो बुनियाद ने उर्दू अदब में कुछ डग ही भरे हैं, उनसे इस बात का आभाष होता है कि उनकी यात्रा लंबी होगी और बहुत ऊंचाईयों को छुएगी। 
 

( रुद्रा न्यूज एक्सप्रेस RNE के इस नए कॉलम पर आप अपनी प्रतिक्रिया 9672994671 पर दे सकते हैं। -- संपादक )