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टाउन हॉल के किराए में 1000 गुना बढ़ोतरी, रवींद्र रंगमंच कलाकारों की पहुंच से बाहर

रवींद्र रंगमंच कलाकारों की पहुंच से बाहर
कैसे होंगे नाटक, संगीत, गीत, नृत्य, लोक कलाओं के आयोजन ?
पहले संस्कृति को पर्यटन बनाया, अब इसे व्यवसाय बना रहे
रंगकर्मी, कलाधर्मी, शब्दकर्मी गुस्से में, तीखे तेवर
 

अभिषेक आचार्य

RNE Network.


हे माननीयों ! भारत लोकतांत्रिक देश है। जहां शासन लोक कल्याणकारी राज्य की अवधारणा से चलता है। जिज़में शिक्षा, स्वास्थ्य और संस्कृति राज के दायित्त्व है। यह दायित्त्व निभाने वाला देश ही तो लोकतंत्र का देश होता है, माना जाता है, समझा जाता है। दुनिया भी ऐसे देश की कद्र करती है और नजीर देती है। 

भारतीय सनातन परंपरा में भी उस मनुष्य को पशु के समान माना गया है जो संस्कृति से नहीं जुड़ा हो। व्यक्ति में संस्कारों का निरूपण संस्कृति से होता है और संस्कृति की स्थापना पंचम वेद में उल्लेखित 7 कलाओं से ही सम्भव है। भारत की पूरी दुनिया में आज कद्र इस वजह से ही है क्योंकि यहां संस्कृति, भाषा, साहित्य को विशेष दर्जा मिलता है।
 

दुनिया में बढ़ती व्यावसायिकता ने अब भारत को भी ग्रहण लगा दिया है। ये देश लोकतांत्रिक है, लोक कल्याण की अवधारणा भी है मगर उसको अब धीरे धीरे कमजोर किया जा रहा है। जो समाज व लोकतंत्र, दोनों के लिए चिंताजनक है। पहले स्वास्थ्य का निजीकरण हुआ और उसके बाद शिक्षा का। अब दोनों ही क्षेत्रों का अधिकतर हिस्सा निजी हाथों में ही है।
 

फिर एक सरकार ने अजीब निर्णय किया और संस्कृति को पर्यटन से जोड़ दिया। यह निर्णय होते ही संस्कृति का भी व्यावसायीकरण हो गया। इस तरह के निर्णय ने संस्कृति का बड़ा नुकसान किया। अब संस्कृति भी एक व्यवसाय बन गयी।

टाउन हॉल के किराये में बढ़ोतरी:

संस्कृति के व्यावसायीकरण का बड़ा नमूना हाल ही में बढ़ाया गया टाउन हॉल का किराया है। सांस्कृतिक गतिविधियों के इस केंद्र के किराये को बीकानेर विकास प्राधिकरण ने 1000 गुना बढ़ा दिया है। अचानक से 12000 किराया करना कला जगत पर बड़ा वज्रपात है। पहले रजिस्टर्ड संस्थाओं को यह सस्ता मिलता था, मगर अब सबके लिए एक समान किराया कर दिया गया है। 

एक जमाना था, जब नगर विकास न्यास के अध्यक्ष भवानी शंकर शर्मा थे। टाउन हॉल उनके अधीन था। तब नाट्यकर्मियों के लिए इसका किराया मात्र 100 रुपये लिया जाता था। एक वो भी समय था। स्व भवानी शंकर शर्मा ने कहा था कि टाउन हॉल न्यास की कमाई का साधन नहीं है। उस समय को विकास प्राधिकरण भूल रहा है। बेशुमार किराए की वृद्धि तो सांस्कृतिक गतिविधियों पर सेंसरशिप जैसी ही है।

अब आयोजन कैसे होंगे ?

इतना टाउन हॉल का चुकाने की क्षमता नाट्य संस्थाओं व सांस्कृतिक संस्थाओं में तो है नहीं। क्योंकि बीकानेर में इन आयोजनों के टिकटों की बिक्री तो होती नहीं। इस सूरत में नाटक, संगीत, नृत्य, गीत, लोक कलाओं के आयोजन बंद ही हो जाएंगे।

यह स्थिति शहर के लिए शर्मनाक होगी। बीकानेर की एक गलत तस्वीर बाहर जायेगी। क्या बीकानेर के जन प्रतिनिधियों के लिए यह शर्मनाक बात नहीं है ?

कला जगत गुस्से में, प्रतिकार करेगा:

बीकानेर के नाट्यकर्मी और गायक, संगीतकार बीकानेर विकास प्राधिकरण के इस निर्णय से गुस्से में है। विरोध की रणनीति बना रहे है। जबकि यह काम तो जन प्रतिनिधियों को करना चाहिए। 

अर्जुनजी, कल्ला जी, जेठानन्द जी, सिद्धि कुमारी जी, बिहारी विश्नोई जी, भंवर सिंह भाटी जी, अंशुमान सिंह जी आदि सभी जन प्रतिनिधियों से अपील की है कलाकारों ने की वे इस मसले में हस्तक्षेप करें। बताएं कि संस्कृति कमाई का जरिया नहीं है। देखते है, किस जन प्रतिनिधि का सांस्कृतिक जमीर जागता है और वो हस्तक्षेप करता है।

रंगकर्मी तैश में:

वरिष्ठ रंगकर्मी प्रदीप भटनागर ने किराया वृद्धि की आलोचना करते हुए कहा कि यह कला जगत पर कुठाराघात है। इससे तो अभिव्यक्ति की आजादी ही खत्म हो जाएगी। बीकानेर विकास प्राधिकरण कला को व्यवसाय के तराजू से तौलना चाहता है, जो मंजूर नहीं। उन्होंने इस निर्णय के विरोध में सभी कलाकारों को एक होने व संघर्ष करने का आव्हान किया है।

 

रंगकर्मी मधु आचार्य ' आशावादी ', दयानंद शर्मा, रमेश शर्मा, सुरेश आचार्य, संगीता शर्मा, सुनील जोशी, उत्तम सिंह, दीपांशु पांडे, रामदयाल राजपुरोहित, प्रह्लाद सिंह राजपुरोहित, मो वसीम राजा, दीपंकर चौधरी, राहुल चावला, प्रियांशु सोनी, जय खत्री, नावेद भाटी, भरत सिंह राजपुरोहित, आमिर हुसैन, प्रियंका आर्य, महिका महर्षि, आकांक्षा जावा, गीतिका, रवि माथुर, मयंक सोनी, विजय सिंह राठौड़, रामसहाय हर्ष आदि ने भी इस निर्णय की आलोचना की है।
 

साहित्यकार ब्रजरतन जोशी, मधु आचार्य, नगेन्द्र किराड़ू, कमल रंगा, बुलाकी शर्मा, सीमा पारीक, धीरेंद्र आचार्य, नदीम अहमद, विजय कुमार शर्मा आदि ने भी इस निर्णय को अविवेकी बताया है।