रंगमंच : अवार्ड की यात्रा आशीष चारण से कामेश्वर सहल तक, इस बार का अवार्ड वरिष्ठ रंगकर्मी कामेश्वर सहल को
6 दशक के रंगकर्म के साक्षी है कामेश्वर सहल
मधु आचार्य ' आशावादी '
RNE Special.
बीकानेर को 70 के दशक के बाद देश की नाट्य राजधानी कहा जाने लगा था। यहां की नाट्य संस्थाओं ने अपनी मेहनत से यहां के रंगमंच की भव्य इमारत को खड़ा किया। नेमिचन्द्र जैन, श्यामानंदन जालान, ब व कारन्त, बंशी कौल, त्रिपुरारी शर्मा, रोबिन दास, रणवीर सिंह आदि ने बीकानेर रंगमंच को श्रम साध्य रंगमंच कहा था। यह भी सही है कि यहां के रंगमंच की इमारत यहां के रंगकर्मियों के पसीने पर टिकी है।
बीकानेर रंगमंच का यह स्वर्णिम दौर काफी साल चला। देश के हर रंगकर्मी की जुबान पर बीकानेर का नाम था। उस मकाम को हासिल करने में एक तरफ जहां मंगल सक्सेना, निर्मोही व्यास, विष्णुकांत, मनोहर कलांश, जगदीश शर्मा, प्रदीप भटनागर, एस डी चौहान, आनंद वी आचार्य, हनुमान पारीक, ओम सोनी, कैलाश भारद्वाज, डॉ राजानन्द, इकबाल हुसैन, कैलाश भारद्वाज सहित अनेकों रंगकर्मियों का योगदान था। संस्थागत बात की जाये तो संकल्प नाट्य समिति, रंगन, अनुराग कला केंद्र, आयाम, क्षितिज आदि संस्थाओं की बड़ी भूमिका थी।
उस दौर में दर्शक कम थे और थे उनसे नाटक की जरूरतें पूरी नहीं होती थी। अकादमियों का बीकानेर को सहयोग न्यून था। जबकि यहां का रंगकर्म नम्बर वन था। उस दौर में यहां के रंगकर्म को पोषित करने व पल्लवित करने वालों में अनेक लोग शामिल थे। उनमें से एक थे कामेश्वर सहल।
ये थे सबके चहेते कामेश जी:
कामेश्वर सहल संगीत, नाटक और साहित्य, इन तीनों क्षेत्रों में गहन रुचि रखते थे। अपनी क्षमता के अनुसार काम भी करते थे। उनका केईएम रोड पर मिलन रेस्टोरेंट था। मौके की दुकान। मगर उसका एक हिस्सा रंगकर्मियों व साहित्यकारों के लिए स्थायी रूप से आरक्षित। वहां बैठने वालों को सहज में चाय सर्व। कभी उसके बदले में भुगतान की मांग नहीं। उलटे, जब नाटक मंचित हो तो दर्शक के रूप में उपस्थिति की चाह और नाटक के लिए आर्थिक मदद की अपेक्षा भी, हंसते हुए इन दोनों जरूरतों को पूरा करने में तनिक भी नहीं झिझकते थे कामेश्वर सहल। एक तरह से वे रंगकर्म के बड़े भामाशाह, अच्छे दर्शक और सच्चे नाट्य समीक्षक थे।
समय की आदत है बदलना:
उसके बाद एक दौर ऐसा भी आया जब ये अव्यावसायिक रंगमंच कमजोर पड़ गया। सभी अपनी पारिवारिक व्यस्तताओं व रोजगार में उलझ गये। एक लंबे समय तक बीकानेर रंगमंच को किसी की नजर लग गई। नाटक भी कम होने लगे। सरकारी योजनाओं के सहारे रंगमंच रेंगने लगा। ये दुर्दिन थे।
इसी बीच फिर से यहां के रंगमंच ने एक करवट ली। बीकानेर में ' बीकानेर थियेटर फेस्टिवल ' शुरू हुआ और उससे बीकानेर को फिर राष्ट्रीय पहचान मिली। अब यहां का रंगकर्म गति पकड़ने लगा। उस गति को तेज करने का काम किया ' रंग आनंद ' नाट्य समारोह में। जहां बीकानेर थियेटर फेस्टिवल में अन्य राज्यों के नाटकों के मंचन शुरू हुए, वहीं रंग आनंद नाट्य समारोह में प्रदेश व स्थानीय नाटकों को तरजीह दी गयी। ये समारोह भी अब पहचान बना गया। इसके साथ अमर नाट्य समारोह भी शुरू हुआ।
रंग सम्मान की परंपरा:
साहित्य में तो अनेक पुरस्कार व सम्मान है मगर रंगकर्म में बहुत कम है। इस कमी को बीकानेर थियेटर फेस्टिवल के सुधेश व्यास व रंग आनंद नाट्य समारोह के अभिषेक आचार्य ने महसूस किया। इन दोनों ने निर्मोही नाट्य सम्मान व रंग आनंद सम्मान शुरू किया। रंगकर्मी का सम्मान व सम्मान राशि दी जाने लगी।
रंग आनंद सम्मान ने अब एक खास पहचान राज्य के रंगकर्मियों में बना ली है। 2021 से रंग आनंद अवार्ड की शुरुआत हुई। पहला अवार्ड जोधपुर के समर्पित रंगकर्मी, निर्देशक आशीष देव चारण को दिया गया। अब तक यह अवार्ड आशीष देव चारण, एस डी चौहान, प्रदीप भटनागर, पुष्पा जैन व बुलाकी भोजक को दिया जा चुका है। इस बार यह अवार्ड सबके चहेते कामेश्वर सहल जैसे मौन रंग साधक को दिया जा रहा है। जिनके बिना बीकानेर रंगमंच की कहानी अधूरी है।
कामेश जी और उन पर राय:
कामेश जी बीकानेर रंगमंच के भामाशाह है। भामाशाह अपने नाम के लिए धन खर्च करते है, मगर कामेश जी ने रंगमंच के लिए पर्दे के पीछे रहकर भामाशाह की भूमिका निभाई। वे अच्छे रंग दर्शक व समीक्षक भी है। बीकानेर रंगमंच के 6 दशक के वे साक्षी और सहयोगी है। रंग आनंद अवार्ड उनको देना, बीकानेर रंगमंच का सम्मान करना है। -- प्रदीप भटनागर
कामेश जी ने हर रंगकर्मी को सहयोग दिया। कभी भी खेमों में बंधकर अपने को सीमित नहीं किया। वे बीकानेर रंगमंच के भीष्म पितामह है। -- विजय सिंह राठौड़
कामेश जी के बिना बीकानेर रंगमंच की कहानी अधूरी है। वे यहां के रंगकर्म की रीढ़ है, उनके बिना इतना बड़ा रंग आंदोलन कभी सफल ही नहीं होता। -- सुकान्त किराड़ू
बीकानेर की उज्ज्वल सांस्कृतिक परंपरा और विरासत के स्तम्भ है कामेश्वर प्रसाद सहल। कामेश जी के रंग और साहित्य प्रेम को पूरा बीकानेर जानता है और उसको सेल्यूट करता है। -- कमल रंगा