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जो पहले विरोध कर चुके उनको विरोध की सीधी धमकी, 4.50 साल साथ साथ, अब राह अलग - अलग

कुछ तो स्थायी विरोधी भी है, वे भी तैयार
उम्मीदवारों का इन सबसे बुरा हाल
 

मधु आचार्य ' आशावादी '

RNE Special.
 

देश में जब राम मंदिर निर्माण के लिए आंदोलन चल रहा था और देश भर के लोग जब अयोध्या जाने के लिए जत्थों के रूप में तैयार हुए, तब इन को शब्द दिया गया ' कार सेवक '। इनका कहना था कि वे ' कार सेवा ' के लिए अयोध्या जा रहे हैं ताकि राम जन्मभूमि पर मंदिर निर्माण कर सकें। उस समय ' कार सेवा ' और ' कार सेवक ' शब्दों का अत्यधिक उपयोग हुआ। उस आंदोलन से ही यह दोनों शब्द जन्मे थे। हालांकि उस समय की उत्तर प्रदेश सरकार ने इन कार सेवकों को रोका और डिटेन कर जेलों में डाला। तब वहां की सरकार ने भी इनको ' कार सेवक ' नाम ही दिया।

बाद में माननीय न्यायालय के हस्तक्षेप के बाद राम मंदिर का निर्माण तो अयोध्या धाम में हो गया, मगर कार सेवा शब्द अलग अलग अर्थों में प्रयुक्त होना शुरू हो गया। क्योंकि इस शब्द को शालीनता व पवित्रता की परिधि में रखा गया।
 

राजनीति में बाद में यह शब्द प्रयोग होना शुरू हुआ, जो आज तक भी काम में लिया जा रहा है। राजनीति में पहले पार्टी के अधिकृत उम्मीदवार का कोई विरोध करता तो उसे बागी कहते थे, इन शब्दों के प्रचलन में आने के बाद उनको कार सेवक कहा जाने लगा। ठीक इसी तरह जो बगावत करता और पार्टी के अधिकृत उम्मीदवार का अंदरखाने, पर्दे के पीछे जो विरोध करता उसे कार सेवा कहा जाने लगा। ताकि शब्दों से उसका विरोध शालीन दिखता रहे। 

फर्क सिर्फ इतना था कि राम मंदिर के आंदोलन के समय कार सेवा खुलकर की जाती थी और करने वाला यह कहता भी था। मगर राजनीति में कार सेवा वह बनी जो पर्दे के पीछे की जाती थी और उसे हर कोई सार्वजनिक रूप से स्वीकार भी नहीं करता था। अब तो राजनीति में कार सेवा एक अद्भुत गुण व सफल होने का जरिया माना जा रहा है।
 

इन दिनों बीकानेर स्थानीय निकाय चुनाव के जुनून में जुटा हुआ है और उसमें कार सेवा शब्द का जमकर उपयोग हो रहा है। कुछ लोग तो स्थायी कार सेवक बने हुए हैं, उनको अपने लिए कुछ नहीं चाहिए, वे तो दूसरे की कार सेवा करने में ही मजा लेते हैं और अपनी राजनीतिक सफलता मानते हैं। कार सेवा के लिए कार सेवक हर वार्ड में मैदान में उतर गए हैं। उनको टिकट नहीं लेना है, किसी दूसरे का टिकट कटवाना है। बाद में वे अपनी पसंद के उम्मीदवार को जिताने के लिए नहीं, नापसंद के उम्मीदवार को हराने के लिए कार सेवा करेंगे। बाकी लोग इन कार सेवकों को आइडेंटिफाई करने में लगे हुए हैं ताकि उनकी कार सेवा को रोका जा सके।

उत्तर - पातर करने को कई तैयार:

राजस्थानी भाषा में प्रचलित शब्द है ' उत्तर - पातर '। इसका भी निकाय चुनाव में खास रोल रहेगा। कईयों के पुरानी पीड़ जाग गयी है। क्योंकि जब वे लड़े थे तब उनका इन लोगों ने विरोध किया था, अब ये लड़ने की तैयारी में तो वे उत्तर - पातर करने को तैयार है। पुराना किसी भी तरह का विवाद हो उसका बदला पार्षद चुनाव में ये कार सेवक निकालते हैं।

 

यदि कभी किसी ने पहले गाली निकाली हो, थप्पड़ मारी हो, झगड़े में साथ न दिया हो तो उसका बदला वे इस पार्षद के चुनाव में निकालने की तैयारी कर चुके हैं। यहां तक कि चुनाव लड़ने वाले ने या उसके परिवार के रिश्तेदार ने या मित्र ने भी कभी गाली निकाली हो तो पार्षद चुनाव में उत्तर - पातर किया जाना निश्चित है। उत्तर - पातर इस वार्ड चुनाव में खूब देखने को मिलेगा।

4.50 साल साथ थे, अब विरोध में !

कहतें है एमपी, एमएलए से ज्यादा कठिन होता है पार्षद का चुनाव। चुनाव जीतना छोटा होता है, खींचतान उतनी ही अधिक होती है। हमें पाली के सांसद का वाकिया नहीं भूलना चाहिए। वे लोकसभा का चुनाव तो आसानी से जीत गए। मगर सांसद रहते हुए उन्होंने पार्षद का चुनाव लड़ा, वो हार गए। उससे ही अंदाजा लग सकता है कि पार्षद का चुनाव कितना कठिन होता है।

 

यही स्थिति बीकानेर में इस बार पार्षद के चुनाव में बनती दिख रही है। यहां कोई सांसद या विधायक तो चुनाव नहीं लड़ेगा, मगर पार्षद का जो प्रभावी लोग चुनाव लड़ेंगे, जो महापौर के दावेदार हैं, उनकी राह आसान नहीं है। 
अनेक वार्डों में देखा है कि 4.50 साल जो साथ बैठते थे, चाय - नाश्ता करते थे, ताश के पत्ते खेलते थे, कहीं भी साथ जाते थे, वे चुनाव की घोषणा होते ही सामने आकर खड़े हो गए हैं। विरोध में उतर आए हैं। इस कारण ही पार्षद का चुनाव ज्यादा कठिन है।

बिगड़ेगा कईयों का खेल:

वार्डों के सर्वे के बाद एक बात तो साफ हो गयी कि इस बार कई तकडे उम्मीदवारों का खेल बिगड़ने वाला है। कार सेवकों ने इसकी पूरी तैयारी कर ली है और अभी से उनके  विरोध में मोबलाइजेशन आरम्भ कर दिया है। इनकी पहली कोशिश टिकट कटवाने की हो, वो नहीं कटेगा तो पूरा दम लगाकर ये उनको हरायेंगे। इस कारण इस बार के बीकानेर नगर निगम के चुनावों में अंत तक अनिश्चितता छाई रहेगी, यही प्रतीत होता है।