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स्कूलों की बदहाली को छिपाने की कोशिश, सुधारने की कोशिश हो, नियम तोड़ा तो पॉक्सो में होगा केस, स्कूलों पर चस्पा हुआ आदेश

अब इस फरमान पर भी शुरू हुई सियासत
 
 

मधु आचार्य 'आशावादी '

RNE Special.

पिछले साल से सरकारी स्कूलों की बदहाली और उससे होने वाली दुर्घटनाओं की खूब खबरें सामने आ रही है। कुछ घटनाओं में तो बच्चे की जान जाने और बुरी तरह से घायल होने के समाचार आये। इन समाचारों ने हर घर और उसके अभिभावक को हिलाकर रख दिया। हर अभिभावक अपने बच्चे को जब स्कूल में भेजता है तो कई सपने देखने के बाद भेजता है। भले ही वह खुद न पढा हो मगर बच्चे को पढ़ाना चाहता है ताकि उसका भविष्य सुधर सके।

वही बच्चा जब स्कूल जाकर बदहाल स्कूल की इमारत से घायल होता है तो उसका सपना टूट जाता है। वह कैसे उस बच्चे को अब स्कूल भेजे, यह साहस भी वो नहीं जुटा पाता। बच्चे को स्कूल भेजना जब एक रिस्क बन जाये तो अभिभावक का चिंतित होना स्वाभाविक है। समाज चिंतित होता है और वो विरोध में बोलता भी है। राजनीतिक रूप से भी विपक्ष स्कूलों की बदहाली की बात विधानसभा में उठाता है। सत्ता उसे नकारती है। सरकार भले ही किसी की भी हो , सत्ता और विपक्ष की यही स्थिति रहती है। यह ज्यादा चिंता की बात है।
 

पिछले शिक्षा सत्र में झालावाड़ की एक स्कूल की छत गिरी और बड़ी दुर्घटना हुई। बच्चों की इस क्षति पर समाज भी विरोध के लिए खड़ा हुआ। कुछ लोग माननीय न्यायालय की शरण में भी पहुंचे। कुछ और स्कूलों के कमरों की छत गिरने की घटनाएं भी राज्य में अलग अलग जगहों पर हुई। कोर्ट सख्त हुआ और सरकार को आदेश दिया कि जर्जर भवनों के स्कूल अन्यत्र शिफ्ट किये जायें और जर्जर भवनों को सरकार तुरन्त दुरस्त कराये। सरकार ने उसकी कितनी पालना की, यह सबके सामने है।

विधानसभा में भी यह मुद्धा प्रमुखता से छाया। विपक्ष हमलावर हुआ तो सरकार ने ताबड़तोड़ घोषणाएं की। जर्जर स्कूलों की रिपोर्ट तैयार हुई और उनको ठीक करने के लिए बजट स्वीकृत हुआ। मगर इतनी अधिक संख्या में स्कूलें जर्जर है कि नया सत्र शुरू होने से पहले उनको ठीक किया ही नहीं जा सकता। सरकार है, घोषणा कर दी। मगर हालत नहीं सुधरे। फिर स्कूलों की छत गिरने, कमरा ढहने, पट्टियां टूटने की खबरें आनी शुरू हो गयी। समाज गुस्से में आता गया। अब तो बच्चे भी विरोध में सड़कों पर उतरने लग गए। सरकार की स्कूलों व शिक्षा विभाग के कारण किरकिरी होनी शुरू हो गयी।

फिर आई चिंतित करने वाली तस्वीरें

 

उसके बाद लोग सजग हुए। स्कूलों के भीतर की बदहाली की तस्वीरें सोशल मीडिया पर पोस्ट करने लगे। कुछ अखबारों और पोर्टल ने भी अपने अपने क्षेत्र के स्कूलों की जर्जर हालत को अपने माध्यम से उठाना शुरू कर दिया। सोशल मीडिया पर लोग अपना गुस्सा भी जाहिर करने लगे। पोस्ट के नीचे आंदोलन करने के आव्हान तक के कमेंट आने शुरू हो गए। 

पहले शिक्षा विभाग और फिर सरकार के शिक्षा मंत्री के सामने परेशानी खड़ी होनी शुरू हो गयी। लोग भी उनसे सवाल करने लगे। विपक्ष भी सरकार के खिलाफ इस मुद्दे पर माहौल बनाने में लग गया। यह माहौल अभी भी बना हुआ है।

बच्चे भी सड़कों पर आ गए:

जेन - जी के आंदोलन के बाद अब तो हर किशोर और युवा विरोध के लिए तैयार दिखता है। सबका निशाना शिक्षा व्यवस्था ही है। कॉकरोच जनता पार्टी ने शिक्षा व्यवस्था को दुरस्त कराने के लिए ही आंदोलन किया था। फिर कहां पीछे रहने वाले थे।

सीकर, लक्ष्मणगढ़ सहित अनेक स्थानों में स्कूल के बाहर जंतर मंतर की तरह ही बच्चे सुधार की मांग पर धरना लगा बैठना शुरू हो गए। इन बच्चों को अपने अभिभावकों व समाज के लोगों का भी साथ मिला। स्कूल के प्रशासकों के सामने बड़ी परेशानी खड़ी हो गयी। 

फिर आई कुछ और अजब तस्वीरें:

इन सबके बाद मीडिया और सोशल मीडिया पर कुछ और अलग तरह की तस्वीरें लोगों के सामने आई। जिनको देखकर हर कोई गुस्से में था। आजादी के 80 वें स्वाधीनता दिवस पर भी स्कूलों की इस तरह की बुरी स्थिति देखकर लोग नाराज थे। इस तरह की स्कूलों की कल्पना 21 वीं शताब्दी में तो की ही नहीं जा सकती। 

 

कहीं स्कूल किसी पेड़ के नीचे चल रहा है तो कहीं किसी सार्वजनिक स्थल की चौकी पर। कहीं तो स्कूल गांव के मंदिर में भी चलता हुआ सामने आया। पेड़ के नीचे के तो कई स्कूल दिख गए। अखबारों ने इस समस्या पर रिपोर्ट बनाकर छापी। सचमुच बदतर स्थिति थी। यह हर कोई मानने लग गया।

इसी बीच 15 अगस्त की एक तस्वीर व वीडियो सामने आया जिसमें शिव विधायक रवींद्र सिंह भाटी एक झोंपड़े में चल रहे स्कूल में स्वतंत्रता दिवस मनाने पहुंच गए। इस तस्वीर ने विभाग को हिला के रख दिया। विधायक भाटी ने इस समस्या पर तल्ख बयान दिया और इस मुद्दे को उठाने की बात कही। सरकार व शिक्षा विभाग भीतर पर विचलित हो गये।

बदहाली सुधारने के बजाय यह आदेश सामने आया:

लोकतंत्रीय व्यवस्था में होना तो यह चाहिए था कि इन कमियों को सुधारने और बदहाल सरकारी स्कूलों की दशा को सुधारने के लिए कारगर योजना बना काम आरम्भ होना चाहिए था। मगर हुआ दूसरा काम ही। सरकार की तरफ से एक फरमान जारी हुआ कि अब कोई भी स्कूल के भीतर प्रवेश नहीं कर सकता, न वीडियो बना सकता है और न ही फोटो खींच सकता है। एक तरह से जिस तरह थोक के भाव में स्कूलों के भीतर की तस्वीरें और वीडियो सामने आ रहे थे, उनको रोकने के लिए यह आदेश था।

आदेश में साफ चेतावनी दी गयी है कि यदि बिना अनुमति किसी ने वीडियो बनाया या फोटो खींचे या स्कूल के भीतर प्रवेश किया तो उसके खिलाफ कड़ी धाराओं में मुकदमा दर्ज किया जायेगा। पॉक्सो एक्ट तक में मामला दर्ज करने का नियम बनाया गया है। इस आदेश को स्कूलों के बाहर अनेक जगह चस्पा भी किया गया है।
 

यह स्कूलों की बदहाली को सुधारने का नहीं छिपाने का ही आदेश लगता है। विभाग और सरकार ने अपनी कमियों को सामने न आने देने के लिए इस आदेश को निकाला है, जिसे लोकतंत्रीय व्यवस्था में सही ठहराया ही नहीं जा सकता है।

आदेश पर वार - प्रतिवार:

इस आदेश के बारे में जब शिक्षा मंत्री मदन दिलावर से पूछा तो उन्होंने इस आदेश की पैरवी करते हुए कहा कि बच्चों से बिना उनके अभिभावकों की अनुमति के बात करना, सवाल पूछना गैरकानूनी है। उस वृत्ति को रोकने की कोशिश है। सरकार स्कूलों की मरम्मत का काम तेजी से कर रही है, बजट प्रावधान हो चुका है और काम भी शुरू हो गया है। 

वहीं पूर्व शिक्षा मंत्री व पीसीसी चीफ गोविंद डोटासरा ने इस नए आदेश को अवैधानिक बताया है। उन्होंने कहा है कि स्कूल के भीतर की दशा जानने का हक हरेक को हैं। ये सरकारी स्कूल है और सार्वजनिक है। किसी की प्राइवेट प्रोपर्टी नहीं। स्कूलों में हम स्थिति देखने जायेंगे, हमें कोई नहीं रोक सकता।

एक्सपर्ट यह कहते हैं:

दूसरी तरफ एक्सपर्ट लोगों का कहना है कि सरकारी स्कूलों के निरीक्षण का मौलिक अधिकार है, यह व्यक्तिगत संपत्ति नहीं है। इस पर पाबंदी को तो कमियां छुपाने के ही प्रयास कहा जा सकता है। लगता है अब यह मुद्दा गरमाएगा और 20 अगस्त से आरंभ हो रहे विधानसभा सत्र में जोर शोर से उठेगा।