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MGSU में क्या पक रही है खिचड़ी? कुलगुरु के आखिरी दिनों में फैसलों पर उठे सवाल, मानद डॉक्टरेट और दीक्षांत की जल्दबाजी चर्चा में

 

 

 

 

Rudra News Express Bikaner.

राजस्थान के विश्वविद्यालयों में अपनी मायड़ भाषा राजस्थानी पढ़ाने की अनिवार्यता तो नहीं है लेकिन महाराष्ट्र से आए राज्यपाल हरिभाऊ बागड़े के आदेश पर मराठी पढ़ाने की तैयारी हो रही है। विश्वविद्यालयों के कुलगुरुओं को महामहिम का मराठी प्रेम ज्योंहि पता चला वे उन्हें खुश करने के लिए अब आदेश से भी एक कदम आगे बढ़ते नजर आ रहे हैं। कुछ ऐसा ही बीकानेर के महाराजा गंगासिंह यूनिवर्सिटी यानी एमजीएसयू में होने की भनक मिली है।

अंदरखाने से आई जानकारी के मुताबिक मराठी महामहिम को राजी करने के लिए इस भाषा का विभाग खोलने में जहां काफी फुर्ती दिखाई जा रही है वहीं लगे हाथ एक महिला नेत्री को मानद डॉक्टरेट की उपाधि देने की तैयारी भी हो रही है। बताया जाता है कि यह महिला नेत्री मराठी की लेखिका भी हैं और भाजपा में बड़े और प्रभावशाली पद के साथ ही राजस्थान और देश की राजनीति में खासा दखल रखती है। 

दरअसल महाराजा गंगासिंह विश्वविद्यालय (MGSU) में कुलगुरु प्रो. मनोज दीक्षित के कार्यकाल के अंतिम दिनों में लिए जा रहे निर्णयों को लेकर विश्वविद्यालय के भीतर और बाहर सवाल उठने लगे हैं। 7 अगस्त को कुलगुरु का कार्यकाल समाप्त होना है, लेकिन उससे पहले 28 जुलाई को दीक्षांत समारोह कराने की तैयारी, विशेष बैठकें बुलाने और मानद डॉक्टरेट देने की चर्चाओं ने पूरे घटनाक्रम को विवादों के घेरे में ला दिया है।

जानकारी के अनुसार विश्वविद्यालय प्रशासन ने राज्यपाल एवं कुलाधिपति से 28 जुलाई को दीक्षांत समारोह आयोजित करने की अनुमति मांगी है। इसी बीच विश्वविद्यालय की विद्या परिषद (एकेडमिक काउंसिल) और प्रबंध बोर्ड (बीओएम) की विशेष बैठकें भी बुलाई गई हैं। इन बैठकों के एजेंडे को लेकर भी चर्चाओं का बाजार गर्म है।

मराठी विभाग और मानद डॉक्टरेट की चर्चा : 

विश्वविद्यालय के अंदरखाने से मिल रही जानकारी के अनुसार, राज्यपाल हरिभाऊ बागड़े द्वारा विश्वविद्यालयों में मराठी अध्ययन को बढ़ावा देने की पहल के बाद एमजीएसयू में मराठी विभाग स्थापित करने की कवायद तेज हुई है। इसके साथ ही भाजपा से जुड़ी एक महिला मराठी साहित्यकार एवं नेत्री को मानद डॉक्टरेट (Honorary Doctorate) देने की भी चर्चाएं हैं। हालांकि विश्वविद्यालय प्रशासन की ओर से इस संबंध में अभी तक कोई आधिकारिक पुष्टि नहीं की गई है।

जल्दबाजी पर उठ रहे सवाल : 

  •  नियमानुसार दीक्षांत समारोह से 45 दिन पूर्व अधिसूचना जारी करनी पड़ती है आज तक जारी नहीं हुई। 
  •  विद्यार्थियों को 15 दिन पहले सूचना देनी पड़ती है, वह भी नहीं दी गई। 
  • डिग्रियां अभी तक पूरी तरह तैयार नहीं हुई हैं।
  •  डिग्रियों एवं पदकों को विद्या परिषद और प्रबंध बोर्ड से अनुमोदन दिलाने के लिए आनन-फानन में विशेष बैठकें बुलाई गई हैं।

डिग्री छपाई पर भी सवाल : 

बताया जाता है कि डिग्रियों की छपाई सामान्य निविदा (ओपन टेंडर) प्रक्रिया के बजाय गोपनीय तरीके से कराई गई। यह भी दावा किया जा रहा है कि पहले जहां एक डिग्री की छपाई पर लगभग 10 से 15 रुपये खर्च होते थे, वहीं अब यह लागत करीब 40  रुपये प्रति डिग्री तक पहुंच गई है। इन आरोपों की भी स्वतंत्र पुष्टि नहीं हो सकी है।

कार्यकाल के अंतिम चरण में नीतिगत निर्णय पर बहस : 

कुल मिलाकर यह बहस छिड़ गई है कि क्या इस अवधि में मानद उपाधि जैसे महत्वपूर्ण निर्णय लेना उचित और नियमसम्मत होगा। हालांकि इस संबंध में विश्वविद्यालय अथवा राजभवन की ओर से कोई आधिकारिक स्पष्टीकरण सामने नहीं आया है। चर्चा यह है कि कहीं यह कवायद कार्यकाल बढ़वाने या अन्य राजनीतिक फायदों के लिये तो नहीं की जा रही। अलबत्ता, आज यानी 18 जुलाई को बोम और एकेडमिक काउंसिल की मीटिंग है। देखना यह है इन मीटिंगों में क्या होता है।