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परिवर्तिनी एकादशी आज: भगवान विष्णु ने बदली करवट, आज के दिन ये काम करने से सोये भाग्य जागेंगे! 

वामन अवतार और राजा बलि की कथा से जुड़ी है एकादशी, जानिए-महत्व, पूजा विधि,  क्या करें और क्या न करें

 

Rudra News Express Bikaner. 

Parivartini Ekadashi-भाद्रपद शुक्ल पक्ष की एकादशी को परिवर्तिनी एकादशी कहा जाता है। धार्मिक मान्यता के अनुसार चातुर्मास के दौरान क्षीरसागर में शेषनाग पर योगनिद्रा में विराजमान भगवान विष्णु इस दिन करवट बदलते हैं। इसी कारण इसे परिवर्तिनी एकादशी, पार्श्व एकादशी और जयन्ती एकादशी के नाम से भी जाना जाता है।

22 सितंबर 2026, मंगलवार को परिवर्तिनी एकादशी का व्रत रखा जा रहा है। बीकानेर के पंचांग के अनुसार एकादशी तिथि 21 सितंबर की रात 08:00 PM से शुरू होकर 22 सितंबर की रात 09:43 PM तक रहेगी। उदया तिथि के अनुसार व्रत 22 सितंबर को रखा जा रहा है।

विष्णु-लक्ष्मी की पूजा से सुख-समृद्धि : 

धार्मिक मान्यताओं के अनुसार परिवर्तिनी एकादशी पर भगवान विष्णु और माता लक्ष्मी की पूजा करने से सुख, शांति और समृद्धि की प्राप्ति होती है। इस दिन भगवान विष्णु के वामन स्वरूप की पूजा का भी विशेष महत्व बताया गया है।

क्या करें : 

* सुबह जल्दी उठकर स्नान कर स्वच्छ वस्त्र धारण करें।
* भगवान विष्णु के सामने एकादशी व्रत का संकल्प लें।
* पूजा स्थल को शुद्ध कर भगवान विष्णु की प्रतिमा या तस्वीर स्थापित करें।
* दीपक जलाकर भगवान को जल, फूल और तुलसी अर्पित करें।
* विष्णु मंत्र या विष्णु सहस्रनाम का जाप करें।
* भगवान विष्णु के वामन स्वरूप की पूजा करें।
* सामर्थ्य के अनुसार दान-पुण्य करें।
* रात्रि में जागरण और भगवान विष्णु का स्मरण करें। 

क्या न करें : 

* एकादशी के दिन अन्न ग्रहण करने से बचने की धार्मिक मान्यता है।
* क्रोध, अहंकार और विवाद से दूर रहें।
* अनावश्यक भोग-विलास से बचते हुए भगवान विष्णु के स्मरण और पूजा में समय लगाएं।
* द्वादशी के दिन निर्धारित समय के भीतर ही व्रत का पारण करें।

व्रत पारण कब होगा : 

पारित स्रोत के अनुसार परिवर्तिनी एकादशी के व्रत का पारण 23 सितंबर 2026 को सूर्योदय के बाद किया जाएगा। बीकानेर के लिए दिए गए पंचांग विवरण में पारण का समय 06:25 AM से 08:51 AM बताया गया है। एकादशी व्रत समाप्त करने को पारण कहा जाता है। धार्मिक मान्यता के अनुसार द्वादशी तिथि समाप्त होने से पहले पारण करना चाहिए। हरि वासर के दौरान पारण नहीं करने की परंपरा बताई गई है। प्रातःकाल पारण को सबसे उपयुक्त माना गया है।

वामन अवतार और राजा बलि की कथा से जुड़ा है व्रत : 

परिवर्तिनी एकादशी की कथा भगवान वामन और दैत्यराज बलि से जुड़ी है। कथा के अनुसार राजा बलि अत्यंत दानी, सत्यवादी और भगवान के भक्त थे। अपनी शक्ति और तप के प्रभाव से उन्होंने तीनों लोकों पर अधिकार कर लिया था।

देवताओं की प्रार्थना पर भगवान विष्णु ने वामन रूप धारण किया और राजा बलि से तीन पग भूमि मांगी। बलि ने दान स्वीकार कर लिया। इसके बाद भगवान वामन ने विराट स्वरूप धारण कर दो पग में पृथ्वी और स्वर्ग सहित समस्त लोकों को नाप लिया। तीसरे पग के लिए स्थान पूछने पर राजा बलि ने अपना सिर आगे कर दिया।

भगवान ने तीसरा पग उनके सिर पर रखा और उन्हें पाताल लोक भेज दिया। कथा के अनुसार भगवान विष्णु ने राजा बलि को आश्वासन दिया कि वे सदैव उनके साथ रहेंगे। परिवर्तिनी एकादशी के दिन भगवान विष्णु की एक प्रतिमा राजा बलि के समीप और दूसरी क्षीरसागर में शेषनाग पर विराजमान मानी जाती है।

दान के साथ अहंकार से बचने का संदेश : 

परिवर्तिनी एकादशी की कथा में राजा बलि के प्रसंग के माध्यम से दान के बाद अहंकार नहीं करने का संदेश दिया गया है। कथा-सार के अनुसार किसी भी कार्य में अति उचित नहीं मानी गई है। इस दिन दान-पुण्य और भगवान विष्णु की आराधना का विशेष महत्व बताया गया है।