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दीवानचंद ‘दीवाँ’- बीकानेर की अदबी दुनिया में ‘दीवाँ’ साहब की अमर पहचान और विरासत

 

इमरोज़ नदीम

RNE Special.
 

बीकानेर की अदबी सरज़मीं पर मरहूम दीवानचंद ‘दीवाँ’ साहब का नाम एक ऐसी शख़्सियत के तौर पर दर्ज है, जिनकी ज़िन्दगी खुद एक मुकम्मल दास्तान है। 13 नवम्बर 1933 को डेरा इस्माइल ख़ान में पैदा होने वाले दीवाँ साहब पैदाइश के एतबार से रईस घराने से ताल्लुक़ रखते थे, मगर हालात ने बचपन ही में उन्हें ग़रीबी का एहसास करा दिया। तालीम मुकम्मल न हो सकी, लेकिन उर्दू और फ़ारसी से उनकी दिलचस्पी ने उनके अदबी शऊर की बुनियाद रख दी।

कमसिनी में ही रोज़गार की तलाश शुरू हो गई। तक़सीम-ए-मुल्क के बाद उनका सफ़र बीकानेर तक पहुँचा, मगर शुरुआत यहाँ भी आसान न थी। जयपुर के चांदपोल बाज़ार में मज़दूरी से लेकर छोटे-मोटे काम तक हर दौर गर्दिश का रहा। रोज़ाना की मामूली आमदनी से गुज़ारा मुश्किल था, इसलिए जल्द ही वह जयपुर छोड़कर फिर बीकानेर लौट आए।
 

यहीं से उनकी ज़िन्दगी ने करवट ली। उन्होंने यह ठान लिया कि छोटा ही सही, मगर अपना कारोबार करना है। बीकानेर के साहूकार सेठ बिट्ठल दास कोठारी के तिजारती इदारे से उनका ताल्लुक़ जुड़ा और वह मुलाज़िम हो गए। रहने के लिए रामगोपाल मोहता के एक छोटे से मकान में जगह मिली। हालात इतने सख़्त थे कि कई बार सर्द रातों में बिना बिस्तर और रज़ाई के गुज़ारा करना पड़ता।
 

इसी दौर का एक वाक़िआ उनकी ज़िन्दगी में अहम मोड़ साबित हुआ। एक रात रामगोपाल मोहता ज़रूरतमंदों में रज़ाइयाँ बाँटते हुए वहाँ पहुँचे जहाँ दीवाँ साहब सो रहे थे और उन्होंने एक रज़ाई उनके ऊपर डाल दी। दीवाँ साहब ने नींद खुलने पर रज़ाई लौटानी चाही और साफ़ कहा कि वह ख़ैरात लेने के आदी नहीं, बल्कि क़र्ज़ लेकर अपना काम शुरू करना चाहते हैं।
 

इस जज़्बे ने रास्ता बनाया। सेठ बिट्ठल दास कोठारी ने उन्हें सेठ  सोमनाथ जी के यहाँ 20 रुपये माहवार पर मुलाज़िम लगवा दिया और छह माह की तनख़्वाह पेशगी दिलवा दी। इस रकम में से 27 रुपये उन्होंने पुराने क़र्ज़ में अदा किए और बाक़ी से पीतल के स्क्रैप का छोटा कारोबार शुरू किया। यही छोटा कारोबार धीरे-धीरे उन्हें एक कामयाब ताजिर बना गया।
 

उर्दू और फ़ारसी से वाक़िफ़ होने के बावजूद शायरी की तरफ़ उनका रुझान देर से परवान चढ़ा, क्योंकि ज़िन्दगी की परेशानियाँ रास्ते में हावी रहीं। लगभग पाँच साल तक वह अपने हालात और कारोबार में उलझे रहे।
 

फिर एक दर्दनाक रेल हादसा उनके सामने आया सिंगल लाइन ट्रैक पर आमने-सामने आती दो गाड़ियों की टक्कर, जिसमें जानो-माल का भारी नुक़सान हुआ। एक तरफ़ मालगाड़ी थी और दूसरी तरफ़ सवारी गाड़ी, जिसमें बारातें भी सवार थीं। यह मंजर बेहद दिल दहला देने वाला था।

बीकानेर के मशहूर शायर ‘मस्तान बीकानेरी’ साहब ने इस हादसे पर एक असरअंगेज़ नज़्म लिखी, जिसने दीवाँ साहब को अंदर तक हिला दिया। यही वह लम्हा था जब उनके अंदर का शायर पूरी तरह जाग उठा।
 

इसके बाद उन्होंने बाक़ायदा शायरी की तरफ़ रुख़ किया। उनके पास ही जनाब शम्सुद्दीन साहब, जो खुद भी शायर थे, उनकी इस्लाह करने लगे। दीवाँ साहब का कलाम धीरे-धीरे अख़बारों और रिसालों में शाया होने लगा। ‘मसनून’, ‘रोजनामा अवाम’ दिल्ली, ‘रोजनामा युगपक्ष’ बीकानेर, ‘हफ़्तरोज़ा मेरठ मेला’, ‘पन्द्रह रोज़ा मुशीर’ दिल्ली, ‘सनद’ दिल्ली और ‘माहनामा जेब-ए-ज़ीनत’ जैसे इदारों में उनकी शायरी ने जगह पाई। 1971 से उन्होंने मुशायरों में शिरकत शुरू की और नात, सलाम व मनक़बत में ख़ास दिलचस्पी ली।
 

उनकी शायरी का जायज़ा लेते हुए वरिष्ठ शायर और तन्क़ीद-निगार जनाब ज़ाकिर अदीब साहब लिखते हैं कि दीवाँ साहब ने अपने इज़हार-ए-ख़याल के लिए उर्दू ज़बान को बुनियाद बनाया और उन्होंने नात, सलाम, मनक़बत, क़तआत, नज़्में और ग़ज़लें कही हैं, मगर बुनियादी तौर पर वह ग़ज़ल के शायर थे। ज़ाकिर अदीब साहब के मुताबिक़ ग़ज़ल शायरी की रूह है और दीवाँ साहब की ग़ज़लों में जो सादगी, असर और जज़्बाती सच्चाई है, वही उन्हें ख़ास बनाती है।
उनकी नातिया शायरी में भी सच्ची अकीदत और मोहब्बत-ए-रसूल (स.अ.व.) का असर मिलता है।

“कश्ती भँवर में थी, मेरा-लाज़िम था डूबना,
अल्लाह के रसूल मेरे काम आ गये।”

और एक जगह वह अपने दौर पर तंज़ करते हैं

“दुश्मन को दुआ दे कोई ऐसा भी हुआ है?
हाँ हाँ, मेरे सरकार ने ऐसा ही किया है।”

सन 1955 में उनकी शादी हुई। उनके चार बेटे और एक बेटी हुई। उन्होंने कोशिश की कि उनकी औलाद उर्दू सीखे, मगर हालात हमेशा साथ नहीं देते। उनके पास अच्छा-ख़ासा कलाम होने के बावजूद बहुत कुछ शाया न हो सका।
 

हाजी खुर्शीद अहमद साहब की प्रेरणा से वरिष्ठ शायर और राजस्थान उर्दू अकादमी, जयपुर के सदस्य रहे जनाब ज़ाकिर अदीब साहब ने उनका बिखरा हुआ कलाम यकजा करके मुरत्तब किया। सोशल प्रोग्रेसिव सोसायटी, बीकानेर ने उनकी दो किताबें प्रकाशित कीं—
 

“हुस्न-ए-अदब” और “परवाज़-ए-शाहीन”—जो उनकी अदबी पहचान को स्थायित्व देने वाली साबित हुईं।
अब आख़िर में उनके कलाम की ग़ज़लें मुलाहिज़ा हों—

 

ग़ज़ल

जब तेरा लुत्फ़-ए-करम, तेरी इनायत होगी,
चश्म-ए-खूँ बरसा की उस रोज़ मस्रत होगी।।

तुमको अपनी ही कसम जलवा-नुमाई न करो,
रुख़ से गर पर्दा हटा दो तो क़यामत होगी।।

आपकी चश्म-ए-करम रूह को तड़पाती है,
अब इनायत न करोगे तो इनायत होगी।।

दिल तो हम दे ही चुके, जान बचा रखी है,
ये भी दे देंगे अगर तुमको ज़रूरत होगी।।

मेरे अश्कों को मयस्सर नहीं दामन तेरा,
मर भी जायेंगे तो दिल में यही हसरत होगी।।

अपना अफ़साना ज़माने को सुना दे ‘दीवाँ’,
इससे इस दौर के लोगों को नसीहत होगी।।

ग़ज़ल

वो बदले हैं यूँ अब कहाँ देखते हैं,
नज़र फेरते हैं जहाँ देखते हैं।।

वफ़ाओं के बदले जफ़ा कर रहा है,
ये क्या आज रंग-ए-जहाँ देखते हैं।।

किया उसने बरबाद जिस पर यक़ीं था,
उसे आज हम बदगुमाँ देखते हैं।।

चमन में बहार आते ही कह उठे वो,
बहारों में पिन्हाँ ख़िज़ाँ देखते हैं।।

निगाह लाख पर्दों में हो जाए लेकिन,
उन्हें हर तरफ़ हम अयाँ देखते हैं।।

हमें जाम और उनको सागर पे सागर,
ये तफ़रीक़-ए-पीर-ओ-मुगाँ देखते हैं।।

जो ख़ुद को समझता था अहल-ए-ज़बाँ, अब
रुसवा है उसी की ज़बाँ देखते हैं।।

कभी अपनी जानिब भी आयेगा “दीवाँ”,
गुलों का जो हम कारवाँ देखते हैं।।

करें दुश्मनों से गिला क्या वो “दीवाँ”,
जो तक़दीर की ख़ामियाँ देखते है ।