डॉ. प्रेमकुमार : लफ़्ज़ों में नक्काशी का फ़न, मंजरकशी की रवायत और शऊर की तामीर
इमरोज़ नदीम
RNE Special.
उर्दू अदब की रवायत में गुफ़्तगू महज़ सवाल-जवाब का नाम नहीं, बल्कि एक ऐसे फन की तशकील है जिसमें लफ़्ज़ों की तहज़ीब, एहसास की नर्मी और बयान की रवानगी मिलकर एक मुकम्मल तजुर्बा बन जाती है। यही वजह है कि जब हम डॉ. प्रेमकुमार की किताब “शऊर की दहलीज़” का मुताला करते हैं, तो हमें सिर्फ इंटरव्यू नहीं पढ़ने को मिलते, बल्कि एक जीता-जागता माहौल, एक मुकम्मल फिज़ा और एक मुतहर्रिक मंज़र अपनी तमाम बारीकियों के साथ आँखों के सामने तामीर होता चला जाता है। डॉ. प्रेमकुमार की सबसे बड़ी ख़ूबी यही है कि वह बातचीत की शुरुआत किसी सादा तआरुफ़ से नहीं करते, बल्कि पहले उस फिज़ा को अपने क़लम से तराशते हैं जिसमें वह गुफ़्तगू होने जा रही होती है। वह कमरे की खामोशी, किताबों की महक, रोशनी के उतार-चढ़ाव, कुर्सी की जगह, दीवारों की सादगी तमाम अनासिर को इस अंदाज़ में बयान करते हैं कि लगता है जैसे कोई माहिर नक़्क़ाश पत्थर पर बारीक काम कर रहा हो। उनके यहाँ मंजर-कशी महज़ बयान नहीं, बल्कि एक जिंदा तजुर्बा है, जो कारी को उस माहौल का हिस्सा बना देता है। असल में “शऊर की दहलीज़” सिर्फ एक किताब नहीं, बल्कि एक अदबी मंसूबा है, जिसमें हर इंटरव्यू अपने आप में एक मुकम्मल दास्तान बन जाता है। डॉ. प्रेमकुमार के यहाँ “लेखन में नक्काशी” सिर्फ एक इस्तिआरा नहीं, बल्कि उनका तख्लीकी उस्लूब है। वह लफ़्ज़ों को इस एहतियात और हुनरमंदी से बरतते हैं कि हर जुमला अपनी जगह मुकम्मल और पुर-असर मालूम होता है। उनकी तहरीर में न तो बेवजह की लफ़्फ़ाज़ी है और न ही किसी किस्म की जल्दबाज़ी; बल्कि एक ठहराव, एक सलीका और एक गहराई है, जो कारी को मुतास्सिर किए बग़ैर नहीं रहती।
इस किताब में शामिल इंटरव्यूज़ खासतौर पर आले अहमद ‘सुरूर’ जैसे अदीब के साथ गुफ़्तगू यह साबित करते हैं कि डॉ. प्रेमकुमार महज़ सवाल करने वाले नहीं, बल्कि एक ऐसे मुहावरा-शिनास अदबी शख्स हैं जो सामने वाले के जहन और जज़्बात तक रसाई रखते हैं। वह अपने सवालात को इस तरह तरतीब देते हैं कि जवाब देने वाला शख्स खुद-ब-खुद अपनी बात की तह तक उतरता चला जाता है। उनके सवालात में जिज्ञासा भी है, तहकीक़ भी और एक अदबी शऊर भी, जो हर गुफ़्तगू को एक नई सिम्त अता करता है।
मंजर-कशी के बाद जब वह असल बातचीत की जानिब बढ़ते हैं, तो उनका लहजा निहायत मुलायम और पुर-एहतराम होता है। वह सामने वाले पर अपने इल्म या शख्सियत का बोझ नहीं डालते, बल्कि एक दोस्ताना और बराबरी का रिश्ता कायम करते हैं। यही वजह है कि उनके इंटरव्यूज़ में बनावट नहीं, बल्कि एक फितरी रवानी और सच्चाई महसूस होती है।
डॉ. प्रेमकुमार की शख्सियत का एक और अहम पहलू उनके फिक्री मयार और तनकीदी शऊर से वाज़ेह होता है। हालांकि यहाँ यह बात वाज़ेह रहनी चाहिए कि यूनान की अदबी रवायत, तख्लीक़ और तनकीद के तअल्लुक़ से जो गुफ़्तगू सामने आती है, वह दरअसल आले अहमद ‘सुरूर’ के जवाबात का हिस्सा है—और डॉ. प्रेमकुमार का कमाल यह है कि उन्होंने अपने सवाल के ज़रिये इस बहस को उस मुकाम तक पहुँचा दिया, जहाँ से इतनी गहरी और वसीअ फिक्र सामने आती है।
यही दरअसल एक कामयाब इंटरव्यूअर की असली पहचान है कि वह खुद कम बोलकर सामने वाले के इल्म और तजुर्बे के दरवाज़े इस तरह खोल दे कि बात महज़ जवाब तक महदूद न रहे, बल्कि एक मुकम्मल फिक्री बहस में तब्दील हो जाए। डॉ. प्रेमकुमार के सवालात में यह सलीका बखूबी दिखाई देता है कि वह किसी भी मुद्दे को सीधे-सीधे बयान नहीं करते, बल्कि उसे इस अंदाज़ में पेश करते हैं कि सामने वाला शख्स खुद अपने तजुर्बे, मुताला और शऊर की रोशनी में बात को वसीअ करता चला जाए। यूनान की मिसाल, तख्लीक़ और तनकीद की बहस, और अदब में ‘डेमोक्रेसी’ का तसव्वुर ये तमाम पहलू दरअसल उसी एक सवाल की ताबीर हैं, जो डॉ. प्रेमकुमार ने निहायत सलीके से सामने रखा।
डॉ. प्रेमकुमार की इंटरव्यू-निगारी का एक और दिलचस्प पहलू यह है कि वह हर शख्सियत के साथ गुफ़्तगू करते हुए उसके फिक्री दायरे और तख्लीकी मिज़ाज को पूरी तरह उभार देते हैं। डॉ. शहरयार के साथ उनकी बातचीत इसका ज़िंदा नमूना है, जहाँ सवाल महज़ सवाल नहीं रहते, बल्कि एक पूरे अदबी मबाहिस का दरवाज़ा खोल देते हैं।
शहरयार जैसे नफ़ीस और गहरे शायर से गुफ़्तगू करते हुए डॉ. प्रेमकुमार ने जिस सलीके से “शायरी”, “फिक्शन” और “सोसायटी” के तअल्लुक़ को सामने रखा है, वह उनके गहरे अदबी शऊर की दलील है। शहरयार के जवाबात से यह बात उभरकर आती है कि शायरी महज़ अल्फ़ाज़ का खेल नहीं, बल्कि एहसास की तमीज़ और ज़ौक़ की तर्बियत का नाम है। और यह कि जो शख्स महसूस करने की सलाहियत से महरूम हो जाए, वह न अच्छा शायर बन सकता है, न अच्छा इंसान।
डॉ. प्रेमकुमार का कमाल यह है कि वह इस तरह के नाज़ुक और बारीक मवाज़ूआत को भी बड़े सादे लेकिन असरदार अंदाज़ में सामने लाते हैं। वह यह समझते हैं कि अदब का रिश्ता ज़िंदगी से है, और ज़िंदगी की सबसे बड़ी सच्चाई “एहसास” है। इसलिए वह ऐसे सवालात करते हैं, जो महज़ इल्मी बहस तक महदूद नहीं रहते, बल्कि इंसानी तजुर्बे और जज़्बात की तह तक उतर जाते हैं।
शहरयार के साथ गुफ़्तगू में “ग़ज़ल” और “नज़्म” के फर्क़ पर जो बहस सामने आती है, वह भी डॉ. प्रेमकुमार के सवाल की गहराई को वाज़ेह करती है। शहरयार यह बताते हैं कि ग़ज़ल अपनी आमियत और इज्माल की वजह से ज़्यादा असरअंदाज़ होती है, जबकि नज़्म में तफसील और एक मुकम्मल बयान का रंग होता है। यहाँ भी डॉ. प्रेमकुमार का सवाल महज़ एक अदबी फर्क़ पूछने तक महदूद नहीं रहता, बल्कि वह शायरी की बुनियादी साख़्त और उसके असर की कैफियत तक पहुँच जाता है।
इसी तरह, जब गुफ़्तगू “मौलिकता”, “रिवायत” और “नक़ल” के मसले तक पहुँचती है, तो डॉ. प्रेमकुमार उसे एक बेहद अहम समकालीन बहस में तब्दील कर देते हैं। शहरयार के जवाबात से यह बात सामने आती है कि हर बड़ा शायर अपनी इन्फ़िरादियत से पहचाना जाता है, और यह इन्फ़िरादियत ही उसे भीड़ से अलग करती है। डॉ. प्रेमकुमार का सवाल इस बहस को जिस मुकाम तक ले जाता है, वह इस बात की दलील है कि वह अदब को महज़ पढ़ते नहीं, बल्कि उसे समझते और जीते भी हैं।
उनकी इंटरव्यू-निगारी का एक और अहम पहलू यह है कि वह अदब को सिर्फ हिंदुस्तान तक महदूद नहीं रखते, बल्कि उसे एक बड़े तहज़ीबी दायरे में देखते हैं। पाकिस्तान और हिंदुस्तान की शायरी के मुक़ाबले पर किया गया सवाल इसी वुसअत-ए-नज़र की मिसाल है। इस सवाल के ज़रिये वह न सिर्फ दो मुल्कों की अदबी रवायतों को सामने लाते हैं, बल्कि यह भी दिखाते हैं कि ज़बान, तहज़ीब और सियासत के असरात अदब पर किस तरह पड़ते हैं।
डॉ. प्रेमकुमार की शख्सियत को अगर महज़ इंटरव्यू-निगारी तक महदूद कर दिया जाए, तो यह उनके फ़न के साथ नाइंसाफ़ी होगी। वह एक कामयाब अफ़साना-निगार भी हैं, और उनके अफ़सानों में जो मंजरकशी मिलती है, वही दरअसल उनके इंटरव्यूज़ की बुनियादी ताक़त भी है।
उनके अफ़सानों को पढ़ते हुए यह एहसास होता है कि वह सिर्फ़ वाक़िआत बयान नहीं करते, बल्कि एक मुकम्मल फिज़ा तख्लीक़ करते हैं ऐसी फिज़ा जिसमें किरदार सांस लेते हैं, माहौल बोलता है और खामोशियाँ भी अपनी जुबान रखती हैं। यही वजह है कि उनकी मंजरकशी बनावटी या जबरन महसूस नहीं होती, बल्कि एक फितरी बहाव के साथ सामने आती है।
असल में डॉ. प्रेमकुमार के यहाँ अफ़साना और इंटरव्यू दो अलग-अलग विधाएँ नहीं, बल्कि एक ही तख्लीकी शऊर के दो रुख़ हैं। जिस तरह वह इंटरव्यू में माहौल को पहले तराशते हैं, उसी तरह अफ़साने में भी वह पहले एक ज़मीन तैयार करते हैं, जिस पर किरदार और वाक़िआत अपनी पूरी शिद्दत के साथ उभरते हैं।
उनकी मंजरकशी की खासियत यह है कि वह सिर्फ़ बाहरी तस्वीर नहीं बनाते, बल्कि उसके पीछे छुपे जज़्बात और अहसासात को भी उजागर करते हैं। एक मामूली सा कमरा, एक सादा सी कुर्सी, या खिड़की से आती हुई हल्की रोशनी इन सबको वह इस अंदाज़ में बयान करते हैं कि वह महज़ चीज़ें नहीं रहतीं, बल्कि कहानी का हिस्सा बन जाती हैं।
यही फ़न, यही बारीकी उनके इंटरव्यूज़ में भी दिखाई देती है, जहाँ हर गुफ़्तगू एक अफ़साने की तरह खुलती है आहिस्ता-आहिस्ता, तह-दर-तह। और शायद यही वजह है कि डॉ. प्रेमकुमार की तहरीर को पढ़ते हुए कारी सिर्फ़ “जानता” नहीं, बल्कि “देखता” और “महसूस” भी करता है।
अगर यह कहा जाए कि डॉ. प्रेमकुमार ने अफ़साना-निगारी की मंजरकशी को इंटरव्यू-निगारी में ढाल दिया है, तो यह कोई मुबालग़ा नहीं होगा बल्कि उनके फ़न की सबसे सटीक ताबीर होगी।
डॉ. प्रेमकुमार का फ़न दरअसल उस खामोश दस्तकार का फ़न है, जो पत्थर को तराशते-तराशते उसमें जान डाल देता है। उनके यहाँ लफ़्ज़ महज़ अल्फ़ाज़ नहीं रहते, बल्कि एक मुकम्मल तजुर्बा बन जाते हैं ऐसा तजुर्बा, जिसमें माहौल की ख़ुशबू, गुफ़्तगू की गर्मी और फिक्र की रोशनी एक साथ महसूस होती है।
“शऊर की दहलीज़” को पढ़ते हुए यह एहसास बार-बार होता है कि हम किसी किताब के सफ़्हात नहीं पलट रहे, बल्कि एक ऐसे ज़हन में दाख़िल हो रहे हैं, जहाँ हर बात तहज़ीब के साथ कही जाती है और हर सवाल अपने अंदर कई जवाबों की आहट लिए होता है। यही वह मुकाम है, जहाँ इंटरव्यू एक अदबी दस्तावेज़ से आगे बढ़कर एक तख्लीकी अमल बन जाता है।
डॉ. प्रेमकुमार ने इंटरव्यू को जिस शाइस्तगी, गहराई और फिक्री वुसअत के साथ बरता है, वह उन्हें इस फन का महज़ माहिर नहीं, बल्कि एक बेमिसाल फ़नकार बनाता है। उन्होंने यह साबित किया है कि सही सवाल करना भी एक कला है और जब सवाल में शऊर हो, तो जवाब खुद अपनी बुलंदी तक पहुँच जाता है।
आज जब गुफ़्तगू अक्सर सतहीपन का शिकार हो जाती है, डॉ. प्रेमकुमार की तहरीर हमें यह याद दिलाती है कि अदब की असल रूह गहराई, तमीज़ और एहसास में बसती है। उनका काम हमें यह सिखाता है कि लफ़्ज़ों से सिर्फ बात नहीं की जाती, बल्कि एक दुनिया तामीर की जाती है ऐसी दुनिया, जहाँ हर आवाज़ की अपनी अहमियत हो और हर खामोशी भी कुछ कहती हो। यही वजह है कि डॉ. प्रेमकुमार का नाम उर्दू-हिंदी अदब में सिर्फ एक इंटरव्यूअर के तौर पर नहीं, बल्कि उस फ़नकार के तौर पर याद रखा जाएगा, जिसने गुफ़्तगू को एक नया मआनी, एक नया शऊर और एक नई दहलीज़ अता की।