{"vars":{"id": "127470:4976"}}

लोककला मर्मज्ञ-समर्पित साहित्य पुरोधा  थे डॉ. श्रीलाल मोहता, लोक कलाओं के मर्मज्ञ ने राष्ट्रीय फलक पर दी बीकानेर को पहचान

शिक्षा, साहित्य व संस्कृति के थे वे जीती जागती त्रिवेणी
 

कमल रंगा

RNE Special.
 

( बीकानेर के इस लाडले साहित्यकार, लोक कला मर्मज्ञ, आलोचक, शिक्षाविद की पुण्यतिथि पर ' रुद्रा न्यूज एक्सप्रेस ( RNE ) ' के पाठकों के लिए यह आलेख राजस्थानी रचनाकार, कवि, कथाकार, आलोचक व साहित्य अकादमी, नई दिल्ली के सर्वोच्च पुरस्कार से सम्मानित कमल रंगा ने लिखा है। डॉ श्रीलाल मोहता को विनम्र श्रद्धांजलि -- संपादक )

 मौन एक सन्नाटा है। मौन वाचाल भी है। पर जब कोई साधक मौन-साधना करता है, तो वो मौन अपने कलात्मक-सृजनात्मक विराट का रूप लेकर प्रगट होता है। यहाँ साधक मौन है और उसकी साधना-कला-सृजन वाचाल हो समाज में नये आयाम स्थापित करती है। ऐसे ही साधक मरुधरा बीकाणै के लाडेसर सपूत कीर्तिशेष डॉ. श्रीलाल मोहता रहे हैं।
 

उनके जीवन के अनेक पड़ाव एवं उतार-चढ़ाव के रंग हमेशा एक नए रंग का कॉलाज बनाते रहे हैं। क्षेत्र चाहे शिक्षा का हो, साक्षरता-प्रौढ़ शिक्षा का हो, कला का हो, लोककला का हो, परम्परा का हो या चाहे साहित्य सृजन और अनुसृजन का हो, डॉ. मोहता ने हमेशा एक समर्पित भाव से हर क्षेत्र में अपनी सकारात्मक एवं संवेदनशील भाव भरी भूमिका का निर्वहन किया है।
 

  रामपुरिया महाविद्यालय में बतौर प्रोफेसर आपकी सेवाएं एवं छात्रों के बीच आपकी लोकप्रियता का कोई शानी नहीं। महाविद्यालय की साहित्यिक पत्रिका ‘संविद्‘ के आप सम्पादक रहे। आपकी बतौर सम्पादक भूमिका को भी कभी भुलाया नहीं जा सकता। मेरा तो सौभाग्य रहा कि मेरे जीवन की पहली हिन्दी कविता आपके सम्पादन में 1973 में ‘संविद्‘ में प्रकाशित हुई, वो उनका मुझे सृजन-आशीर्वाद ही रहा।
   

आपने साक्षरता एवं प्रौढ़ शिक्षा के क्षेत्र में अपनी रचनात्मक भूमिका निभाते हुए बीकानेर जिले में ही नहीं वरन् प्रदेश में इस अभियान को सही अर्थों में एक गति, एक ऊँचाई प्रदान करवाई। इसी तरह जन शिक्षण संस्थान के माध्यम से समाज को आपने एक नई दिशा प्रदान करने का उपक्रम किया।
   

डॉ. मोहता प्रात: स्मरणीय आदरणीय छगनजी मोहता के पुत्र थे। उनके पुत्र होने के साथ उनकी विरासत को अपनी क्षमता से नई पौध तक ले जाने के लिए आप हमेशा सतत् प्रयासरत रहे। यह मेरे जैसे और मेरे से पहले वाली और बाद वाली पीढ़ी का सौभाग्य रहा है कि हमें इस धरा के महान् सपूतों की समृद्ध परम्परा एवं विरासत मिली है। सवाल सिर्फ इतना है कि हम उसे कितना अंवेर सकते हैं, अंगेज सकते हैं?
   

डॉ. श्रीलाल मोहता एक मौखिक संदर्भकोश थे। मेरा यहाँ अर्थ इस प्रकार है कि आपके पास बीकानेर के विभिन्न क्षेत्रों से जुड़े प्रसंग, उदाहरण, किस्से, कहानियां आदि का एक मौखिक संदर्भकोश था। डॉ. मोहता जब-जब अपने उद्बोधन में बीकानेर के रोचक संदर्भ सुनाते तो समाज को नई जानकारियां खासतौर से नई पीढ़ी को मिलती रहती थीं। आपकी बातपोशी काबिले-तारीफ रही है। आप शतरंज के उच्च स्तर के खिलाड़ी रहे। बीकानेर के शतरंज खेल के विकास में भी आपकी अग्रणीय भूमिका रही है।
   

सौम्य चेहरा, गौरा रंग, सफेद बाल उनके आभामंडल में कुछ और इजाफा करते। आप द्वारा तैयार किया गया मरु संस्कृति कोश अपने आप में अनूठा सृजन उपक्रम है। आप कलाओं-लोककलाओं को संरक्षण-संरक्षित एवं पोषित करने में जीवन-पर्यन्त संलग्न रहे। आपने लुप्त हो रही या लुप्त-प्राय: कलाओं-लोककलाओं को पुन: संवर्धन कर आगे लाने के सकारात्मक एवं रचनात्मक कार्य हमेशा किए जो अपने आप में एक उदाहरण है और अनुपम एवं अनूठी पहल है।
   

आपके जीवन का एक पक्ष उच्च स्तरीय प्रबंधन भी रहा है। आपके कुशल नेतृत्व में मरु परम्परा, परम्परा आदि संस्थाओं ने अपनी राष्ट्रीय स्तरीय पहचान बनाई। डॉ. मोहता जीवन के अन्तिम क्षणों तक साहित्य के प्रति समर्पित रहते हुए सृजनरतन थे। उसी का एक उदाहरण ‘साहित्य अकादेमी‘, नई दिल्ली के लिए 21वीं सदी की ‘आधुनिक राजस्थानी कविता‘ की पुस्तक का सम्पादन कार्य भी बड़ी लगन एवं निष्ठा से कर रहे थे। इस बाबत उन्होंने प्रदेश भर के राजस्थानी कवि बंधुओं से रचनाएं एकत्रित कर ली थी, मेरा भी सौभाग्य रहा कि मेरी रचना भी उन्होंने ली।
   

यहाँ यह भी उल्लेख करना चाहूंगा कि आपका ‘5 अप्रैल, 2021‘ को सार्वजनिक कार्यक्रम में बतौर मुख्य वक्ता नगर के साहित्यकारों, संस्कृतिकर्मियों एवं गणमान्य लोगों को उद्बोधन सुनने का महत्त्वपूर्ण एवं सौभाग्य का अवसर मिला था। यह उनके जीवन का अंतिम सार्वजनिक कार्यक्रम था, जो लोक जागृति संस्थान का आयोजन था। इस आयोजन में आपने अपनी विद्वतापूर्ण विवेचन के आधार पर कई संदर्भ एवं नई जानकारियों से उपस्थित गणमान्यों को लाभान्वित किया।
    

डॉ. मोहता के विराट व्यक्तित्व एवं महत्त्वपूर्ण कृतित्त्व को समग्र में साझा करना एक ग्रंथ रचने जैसा है। मैं तो सिर्फ और सिर्फ कुछ बिन्दुओं की ओर आपका ध्यान ले गया हूँ। उन्हें और उनके महान् कार्यों को नमन है। यहाँ मैं आपश्री से यह भी साझा करना चाहूंगा कि आपकी अंतिम रचना ‘बालपणै रा संस्मरण‘ (राजस्थानी) जो मेरे विनम्र आग्रह पर आपने मुझे आशीर्वाद स्वरूप रचकर दिया। उनकी यह अंतिम रचना संस्मरण विधा की है, जो प्रकाशित हो गई और यह पुस्तक डॉ मोहता एवं उनकी धर्मपत्नी श्रीमती उषा मोहता को समर्पित है।
   

डॉ. मोहता देह रूप में हमारे बीच में न हो परन्तु उनके कृतित्त्व एवं व्यक्तित्त्व के अनछूए पहलू, महत्त्वपूर्ण प्रसंग, उनके द्वारा रचा गया सृजन एवं किए गए रचनात्मक कार्य आदि हमेशा आपके-हमारे साथ हैं और साथ रहेेंगे। और यह उनका साथ रहना ही डॉ. मोहता का आपके-हमारे बीच होना है। आज उन्हें स्मरण करते हुए हमें यह भी संकल्प लेना चाहिए कि उनका अप्रकाशित सृजन प्रकाश में आए। उनके नाम की एक सृजनपीठ स्थापित हो जिसके माध्यम से नई पीढ़ी उनसे प्रेरणा लेती रहे। यही उन्हें और उनके सृजनात्मक अवदान के प्रति सच्ची भावना-श्रद्धा अर्पण है। हमें उनकी विरासत के लिए अपने-अपने स्तर पर कार्य करना चाहिए। एक कलामर्मज्ञ, कुशल सम्पादक, बेजोड़ प्रबंधक, उच्च शिक्षाविद्, मौन साहित्य सृजक, अनुसृजक को उनकी पाँचवी पुण्यतिथि पर  पावन-आत्मिक भावांजलि-शब्दांजलि देते हुए महान् आत्मा और उनके उच्च स्तर के व्यक्तित्त्व-कृतित्त्व को पुन: नमन-स्मरण।
-- कमल रंगा
मोबाईल --9928629444