स्वायत्त शासन मंत्री के अटपटे बयान से हर कोई हतप्रभ, अटपटे बयान के लोग ले रहे चटखारे
वाह जी वाह माननीय !
मधु आचार्य ' आशावादी '
RNE Special.
राजनीति में अटपटे बयानों का इतिहास तो भरा पड़ा है। नेता और अटपटा न बोके, यह तो संभव ही नहीं। अटपटा व बिगड़ा हुआ बोलना तो जैसे पिछले 3 दशक से नेताओं का जन्मसिद्ध अधिकार ही बन गया है।
नेताओं के इस तरह के अटपटे बयानों से केवल जनता ही नहीं, कोर्ट भी चिंतित हैं । अनेक मामलों में माननीय न्यायालय ने तल्खी से नेताओं को जुबान पर ताला लगाने की सीख भी दी है। न्यायालयों में नेताओं के बिगड़े बोल के कई मामले लम्बित है।
इतना कुछ होने के बाद भी नेता रुकते नहीं। मनमर्जी से विषयों पर बोलते ही जा रहे हैं। इससे गंभीर स्थिति तो क्या होगी। जनता के यह माननीय बोलते हैं, जनता पकड़ती है शब्द तो कह देते हैं अर्थ गलत निकाला। तोड़ मरोड़कर पेस किया। ऐसा कहा ही नहीं। जो चाहे सफाई में कह देते हैं। इस स्थिति से अब तो हर नागरिक चिंतित हैं।
बीकानेर की सड़कों पर गजब जवाब:
राज्य के स्वायत्त शासन मंत्री झाबर सिंह खर्रा बीकानेर आये। विभागीय काम निपटाए। कहने को जन सुनवाई की। नेता जुटे। पत्रकारों को भी आना ही था। वे जब आएंग्गे तो सवाल भी पूछेंगे।
एक पत्रकार ने सहज रूप में बीकानेर की खस्ताहाल सड़कों के बारे में मंत्री जी से सवाल कर लिया। पहले तो वे अपने अंदाज में उस पत्रकार को टरकाते रहे। फिर भी पार नहीं पड़ी तो उच्च स्तरीय ज्ञान का बयान दे दिया।
उन्होंने बताया कि बीकानेर की खराब सड़कें उस दिन ठीक हो जाएगी जिस दिन खादी देशों का युद्ध समाप्त हो जाएगा। वाह, बेहद अटपटा तर्क। जब ज्यादा पूछा तो मंत्री जी ने कैमरे पर स्पष्ट किया कि खाड़ी युद्ध के कारण काम अटका हुआ है। युद्ध बन्द होते ही बीकानेर की सड़कें भी ठीक हो जाएगी। सच माना जाए इसे या बड़ी गप, कुछ भी समझ नहीं आ रहा। पर वाह तो बनता है, बीकानेर की सड़कें सीधे खाड़ी युद्ध से तो जुड़ गई।
अब लोग ले रहे बयान के चटखारे:
मंत्रीजी तो बयान देकर चल दिये मगर उनके इस बयान के लोग खूब चटखारे ले रहे हैं। सोशल मीडिया पर यह बयान खूब वायरल हो रहा है। वीडियो के साथ फनी कमेंट लिखे जा रहे हैं।
कुछ ने एआई से कुछ नया बना लिया है और खूब प्रचारित कर रहे हैं। कार्टून की भी सोशल मीडिया पर बहार आयी हुई है। लोगों को सुझाव दिया जा रहा है कि बीकानेर की सड़कों के लिए ट्रंप को ज्ञापन दिया जाना जरूरी हो गया अब तो।
इस तरह के फनी प्रयोगों से तो यही लगता है कि मंत्रीजी का बयान कितना अटपटा है। इस बोल पर संज्ञान लिया जाना चाहिए। जनता के प्रति उनकी जवाबदेही है, वे इस तरह का बयान नहीं दे सकते।
एक युवा फरियादी की नहीं सुनी:
एक युवक मंत्री जी से मिला और शिकायत की उनके विभाग की। पहले तो उसकी बात को ही नहीं सुना गया। उसे कहा गया कि समय पर आना चाहिए था। युवक जैसे तैसे उनके विभाग के भ्र्ष्टाचार पर बोल रहा था, उस पर गौर नहीं किया गया। उसने अपना परिवारीक मामला बताया तो कहा कि समय पर फरियाद लेकर आना था। कुल मिलाकर युवक की लाख कोशिश के बाद भी उसकी फरियाद को नहीं सुना गया।