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मुफ़लिसी से अदबी शिखर तक : फ़ौक़ जामी की रूहानी और रिंदाना शायरी की दास्तान

 

इमरोज़ नदीम 

RNE Special.


उर्दू अदब की दुनिया में कुछ नाम ऐसे होते हैं जो सिर्फ़ अपने अशआर की वजह से नहीं बल्कि अपने किरदार, अपनी सादगी और अपनी पूरी ज़िंदगी के सबक़ की वजह से याद रखे जाते हैं। फ़ौक़ जामी भी ऐसी ही शख्सियत थे जिनकी जिंदगी संघर्ष, इल्म, अदब और इंसानियत की एक मुकम्मल दास्तान है। उनका असली नाम हसनुद्दीन था और “फ़ौक़” उनका तख़ल्लुस। सन 1922 में एक गरीब घराने में पैदा हुए फ़ौक़ साहब ने बचपन ही में यतीमी और मुफ़लिसी का दर्द देख लिया था। चार साल की छोटी उम्र में माता पिता का साया सिर से उठ जाना किसी भी बच्चे के लिए बहुत बड़ा सदमा होता है, मगर यही तकलीफ़ आगे चलकर उनकी शख्सियत की मजबूती का सबब बनी।
 

उनकी परवरिश बड़े भाई और मामूं ने की। मामूं टोंक की एक थिएटर कंपनी से जुड़े हुए थे, इसलिए फ़ौक़ साहब भी उसी माहौल में आ गए। उस दौर में थिएटर महज़ तमाशा नहीं बल्कि अदब, मौसीकी और तहज़ीब का एक बड़ा मरकज़ हुआ करता था। वहां उस्ताद मुहम्मद उमर साहब “जाम टोंकी” की सरपरस्ती उन्हें हासिल हुई। जाम साहब सिर्फ़ थिएटर के उस्ताद नहीं बल्कि एक कदरदान शायर और बेहद धार्मिक इंसान भी थे। वह कलाकारों को गीत, ग़ज़लें और ठुमरियां लिखकर देते और साथ ही उन्हें हुनर भी सिखाते थे ताकि जिंदगी में कभी मुफ़लिसी का सामना हो तो हाथ का हुनर उनका सहारा बन सके।
 

यही माहौल फ़ौक़ साहब की तालीमगाह बना। जाम साहब के यहां शेरो शायरी की महफ़िलें सजा करती थीं जिनका असर फ़ौक़ साहब पर भी पड़ा। उन्होंने कम उम्र में ही शेर कहना शुरू कर दिया। जब उस्ताद को उनकी सलाहियत का अंदाज़ा हुआ तो उन्होंने न सिर्फ़ हौसला बढ़ाया बल्कि बाकायदा शायरी की इजाज़त भी दे दी। चौदह साल की उम्र से उनका अदबी सफर शुरू हो गया। दुनियावी तालीम छोड़कर उन्होंने दारुल उलूम खलीलिया टोंक में दाख़िला लिया जहां मौलाना यूसुफ अली ख़ां, अज़ीज़ जयपुरी और मौलाना मुहम्मद उमर साहब जैसे अहले इल्म से अरबी और फ़ारसी सीखी। यह इल्मी माहौल आगे चलकर उनकी शायरी की गहराई और ज़बान की नफ़ासत में साफ दिखाई देता है।

सन 1943 में उनकी शादी बीकानेर  में हुई। इसके बाद उन्होंने टोंक से मुंशी फ़ाज़िल का इम्तिहान पास किया और 1944 में रतनगढ़ में उर्दू टीचर लग गए। मगर बेचैनी और सफरपसंदी उनके मिज़ाज का हिस्सा थी, इसलिए एक जगह टिककर रहना उनके लिए आसान नहीं रहा। हिंदुस्तान के अलग अलग शहरों में घूमते रहे और जिंदगी के नए नए तजुर्बे हासिल करते रहे।
 

विभाजन के दौर में उन्हें बीकानेर आना पड़ा। यह शहर उनके अदबी सफर का एक अहम मोड़ साबित हुआ। यहां उन्हें उस्ताद बेदिल बीकानेरी की सरपरस्ती हासिल हुई। बेदिल साहब का घर उस वक्त शेरो शायरी का मरकज़   माना जाता था जहां आरिफ़ साहब, मुज़्तर साहब,  खलीक़ साहब, वफ़ा साहब, असीर साहब,  जैसे शायरों की महफ़िलें सजती थीं। फ़ौक़ साहब भी इसी अदबी कारवां का हिस्सा बन गए। उन्होंने बेदिल साहब की महफ़िल में ख़ुद को संवारा और अपने फन को नई ऊंचाइयां दीं।
 

फ़ौक़ साहब अपने उस्ताद जाम साहब का बेहद अदब करते थे। उसी मोहब्बत और एहतराम में उन्होंने शीतला गेट इलाके में “जाम” के नाम से एक  मदरसा भी कायम किया।  उन्होंने “जाम” नाम की एक उर्दू पत्रिका भी निकाली, मगर कुछ अंकों के बाद वह बंद हो गई। इसके बावजूद फ़ौक़ साहब ने अदबी सरगर्मियों का सिलसिला कभी नहीं छोड़ा। अपने उस्ताद की याद में सालाना मुशायरे करवाते रहे जो बीकानेर की अदबी यादों का एक अहम हिस्सा बन गए।
 

फ़ौक़ जामी साहब की जिंदगी सिर्फ़ अदबी कामयाबियों की कहानी नहीं बल्कि संघर्ष, उम्मीद और इश्क़ की ऐसी दास्तान है जिसमें एक शायर अपने हालात से लड़ते हुए भी अपने फन की लौ बुझने नहीं देता। बीकानेर और टोंक के अदबी माहौल में पले बढ़े फ़ौक़ साहब ने जिंदगी के उतार चढ़ाव को बहुत करीब से देखा। उनके भीतर का शायर हर हाल में जिंदा रहा। यही वजह है कि उनकी शायरी में दर्द भी है, मोहब्बत भी, खुद्दारी भी और जिंदगी की तल्ख़ सच्चाइयों का एहसास भी।
 

जिंदगी के एक दौर में उन्होंने सब कुछ छोड़कर मुंबई का रुख किया। यह वह समय था जब फिल्मी दुनिया बहुत से शायरों और अदब से जुड़े लोगों के लिए उम्मीद का नया दरवाज़ा बन रही थी। मगर मुंबई का सफर आसान नहीं था। वहां उन्हें जमाने के नशेबो फ़राज़ से कई बार गुजरना पड़ा। मुश्किलें आईं, कारोबार डगमगाया, हालात बिगड़े, मगर उन्होंने हिम्मत नहीं हारी। पहले फिल्मों के लिए गीत लिखे, फिर कपड़ों का कारोबार शुरू किया। जिंदगी बार बार उन्हें आजमाती रही लेकिन वह हर बार नए हौसले के साथ खड़े हुए।
 

किस्मत ने जब साथ दिया तो फिल्म लाइन में भी कुछ सिलसिला शुरू हुआ। फिल्म “सावन को आने दो” में उनके लिखे तीन गीत शामिल हुए। “नेक परवीन” नामक फिल्म की कहानी भी उन्होंने ही लिखी जो मुस्लिम संस्कृति पर आधारित थी। कुछ समय तक मुंबई हज कमेटी में भी मुलाजिम रहे। मगर अफसोस यह रहा कि उनकी जिंदगी में उनका पूरा कलाम किताब की शक्ल में सामने नहीं आ सका। हालांकि उनके मशहूर शेर और ग़ज़लें अदबी हलकों में बराबर पढ़ी और सराही जाती रहीं।
 

असल में शायरी किसी किताब से ज्यादा जिंदगी के तजुर्बों की देन होती है। फ़ौक़ साहब की शायरी में यही जिंदगी बोलती नजर आती है। टोंक और बीकानेर के अदबी माहौल ने उनके फन को तराशा। वह ग़ज़ल, नज़्म, नात, रुबाई और क़िता हर रंग में शायरी कहते थे। “मोहसिने कौनेन” उनकी वह यादगार अदबी कोशिश है जिसमें हुज़ूरे अकरम, सरवरे कायनात हज़रत मुहम्मद ﷺ की मुकद्दस हयात को महाकाव्य की तर्ज़ पर बड़े अदब, अक़ीदत और एहतराम के साथ तहरीर करने की कोशिश की गई है। यह महज़ एक नज़्मी तख़्लीक़ नहीं बल्कि इश्क़े रसूल, इल्मी बसारत और अदबी शऊर का खूबसूरत इज़हार है। फ़ौक़ साहब ने इस तस्नीफ़ में सीरत के रूहानी, अख़लाक़ी और इंसानी पहलुओं को शायरी की नफ़ासत और क्लासिकी उर्दू अदब की रवायत के साथ पेश करने का प्रयास किया है।

फ़ौक़ जामी की शायरी का सबसे बड़ा हुस्न उसका सच्चा एहसास है। उनकी ग़ज़लों और अशआर में बनावट या दिखावे की चमक नहीं बल्कि दिल की गहराइयों से निकले हुए जज़्बात की गर्मी महसूस होती है। वह उन शायरों में थे जिनके यहां इश्क़ सिर्फ़ महबूब तक सीमित नहीं रहता बल्कि जिंदगी, इंसान और पूरे कायनात से जुड़ जाता है। उनकी शायरी में दर्द भी है, उम्मीद भी, तड़प भी और रूहानी अपनापन भी।

जला के शम्अे वफ़ा हम जहां जहां से चले
हमारे साथ चराग़ों के कारवां से चले।

मुझ से कायम है मोहब्बत में इबादत का नक्श
कौन पूछेगा तेरे नक्शे कदम मेरे बाद।

“फ़ौक़” याराने हुस्न आज न माने लेकिन
मुझ को रोयेंगे जमाने के सितम मेरे बाद।

कभी तुम पर कभी मुझ पर नजर है अहले दुनिया की
फसाना तुम हो मेरा या तुम्हारी दास्तां में हूं।

कभी आहें शरर अफ़्शां कभी अश्के रवां में हूं
ज़मीं पर बर्क़ो शबनम की मुकम्मल दास्तां में हूं।

तुम बन के बहारो गुलशन में जो आ जाओ
हर शाख लचक जाये हर फूल महक जाये।

इसकी फ़ितरत में है अख़्लास, मोहब्बत, ईसार
खार चुनने पे भी रहता है गुलिस्तां हो कर।

इसकी रंगीन मिज़ाजी का ठिकाना है कोई
मौत भी आती है शायर को ग़ज़लख्वां हो कर

क्या कहिये गमे दिल को क्या चीज़ गमे दिल है
बढ़ जाये तो रहबर है रुक जाये तो मंज़िल है।

तुम छुप के रहे जब तक हर चीज़ थी पर्दे में
तुम सामने क्या आये कौनैन मुकाबिल है।

ऐ “फ़ौक़” मोहब्बत में ये हाल हुआ दिल का
ठहरा हुआ इक दरिया है डूबा हुआ साहिल है।

फ़ौक़ जामी की शायरी का मुताअला करते हुए यह साफ महसूस होता है कि वह सिर्फ़ एक शायर नहीं बल्कि उर्दू ग़ज़ल की क्लासिकी रवायत के सच्चे वारिस थे। उनकी ग़ज़लों में इश्क़, रूहानियत, दर्द, इंसानी एहसास और जिंदगी की तल्ख़ सच्चाइयों का ऐसा संगम दिखाई देता है जो पुराने उस्ताद शायरों की याद ताज़ा कर देता है। उनकी ज़बान में सादगी है मगर उस सादगी के भीतर गहरी फिक्र और जज़्बे की गर्मी मौजूद है।

शोरे दीवानगी ज़िन्दां से चमन तक पहुंचे
लुत्फ़ जब है के जुनूं दारो रसन तक पहुंचे।

बाग़बां फूंक दे ख़ारों को मगर ध्यान रहे
असर इसका न कहीं दारो रसन तक पहुंचे।

जिस क़द्र मेरे गुफ़्तार में हुस्न है ऐ काश
ले के पाबंदी गुलों के दहन तक पहुंचे।

तुम बन के बहारें तो गुलशन में जो आ जाओ
हर शाख लचक जाये हर फूल महक जाये।

फ़ौक़ जामी की शायरी का एक अहम पहलू उनका गहरा तखय्युल और जिंदगी की सच्चाइयों को शायरी में ढालने का हुनर है। उनकी ग़ज़लों में सिर्फ़ रुमानियत ही नहीं बल्कि फिक्र, तजुर्बा और इंसानी फितरत का सूक्ष्म अवलोकन भी दिखाई देता है। वह अपने दौर के उन शायरों में थे जिनके यहां अल्फाज़ महज़ सजावट नहीं बल्कि एहसास की रूह बनकर सामने आते हैं।

आगाज़ भी देखा था अंजाम भी देखेंगे
तस्वीरे नशेमन है बिजली भी चमक जाये।

वो बात हक़ीकत में इक झूठ है धोखा है
जिस बात के कहने से इंसां भड़क जाये।

रिंद उस को समझ पीकर जो होश में आता हो
वो रिंद नहीं साक़ी पीकर जो बहक जाये।

चरचे साक़ी कहां और हलकाए जंजीर कहां
गर्दिशे जाम कहां गर्दिशे तक़दीर कहां।

तू कहां तेरा तसव्वुर कहां तस्वीर कहां
कहके दीवाना मोहब्बत का मुझे महफ़िल में

आप खुद हो गये जाहिर मेरी तक़रीर कहां।
“फ़ौक़” मैं बन्दए उल्फ़त वो गरज का बन्दा

फ़ौक़ जामी की शायरी का एक ख़ास पहलू उसका रिंदाना और सूफियाना रंग है। उनकी ग़ज़लों में जहां इश्क़ की नरमी और रुमानियत मौजूद है वहीं जिंदगी की सच्चाइयों, इंसानी कमजोरी, खुद्दारी और तजुर्बे की कड़वाहट भी दिखाई देती है। वह पुराने उर्दू शायरों की रवायत से जुड़े हुए नजर आते हैं ।
उनकी शायरी में “साक़ी”, “जाम”, “रिंद”, “बिजली”, “तस्वीर”, “तसव्वुर” और “गर्दिशे तक़दीर” जैसे क्लासिकी अल्फाज़ बार बार आते हैं। मगर यह सिर्फ़ प्रतीक नहीं बल्कि इंसानी जिंदगी की गहरी कैफियतों के बयान बन जाते हैं।

आगाज़ भी देखा था अंजाम भी देखेंगे
तक़दीरे नशेमन है बिजली भी चमक जाये।

वो बात हक़ीकत में एक झूठ है धोखा है
जिस बात के कहने से इंसान झिझक जाये।

रिंद उस को समझ पीकर जो होश में आता हो
वो रिंद नहीं साक़ी पीकर जो बहक जाये।

चश्मे साक़ी कहां और हल्काए ज़ंजीर कहां
गर्दिशे जाम कहां गर्दिशे तक़दीर कहां।

तू कहां तेरा तसव्वुर कहां तस्वीर कहां।
कहके दीवाना मोहब्बत का मुझे महफ़िल में
आप खुद हो गये जाहिर मेरी तस्वीर कहां।

“फ़ौक़” मैं बंदाए उल्फ़त वो गुरेज़ का बंदा
मेरे अशआर कहां शेख़ की तहरीर कहां।

फ़ौक़ जामी की शायरी का सबसे बड़ा कमाल यही है कि उसमें क्लासिकी उर्दू ग़ज़ल की रवायत भी मौजूद है और इंसानी एहसास की ताजगी भी। उनका कलाम सिर्फ़ पढ़ा नहीं जाता बल्कि महसूस किया जाता है। मुफ़लिसी, यतीमी, सफर, इल्म, उस्तादों की सोहबत, इश्क़, रूहानियत और जिंदगी के लंबे तजुर्बों ने मिलकर उनकी शख्सियत और फन को वह गहराई दी जिसने उन्हें बीकानेर और टोंक की अदबी दुनिया में एक अलग मुकाम अता किया। वह सिर्फ़ एक शायर नहीं बल्कि उर्दू तहज़ीब की उन रोशन कड़ियों में से एक थे जिन्होंने अपने फन और अपने किरदार से आने वाली नस्लों के लिए रास्ते छोड़े। उनकी याद आज भी अदबी फिज़ा में एक नरम रोशनी की तरह महकती महसूस होती है।

भवानी भाई के नाम से मशहूर भवानी शंकर शर्मा साहब, जो नगर निगम के पहले निर्वाचित महापौर थे, स्वयं भी पत्रकारिता और अदब से गहरा लगाव रखते थे। यही वजह थी कि उन्होंने नगर निगम की ओर से पत्रकारों और साहित्यकारों को सम्मान देने की एक नई परंपरा का सूत्रपात किया। उनके कार्यकाल में अनेक सड़कों और मार्गों का नामकरण साहित्यकारों, पत्रकारों और सांस्कृतिक हस्तियों के नाम पर किया गया ताकि शहर अपनी तहज़ीबी और अदबी विरासत को याद रख सके।
 

इसी कड़ी में शीतला गेट क्षेत्र में फ़ौक़ जामी साहब के नाम पर भी एक मार्ग का नाम रखा गया। यह सिर्फ़ एक औपचारिक नामकरण नहीं था बल्कि बीकानेर की अदबी दुनिया में फ़ौक़ साहब की खिदमत, उनकी शायरी और उनकी तहज़ीबी पहचान को दिया गया सम्मान था। मगर अफसोस की बात यह रही कि बोर्ड लगने के कुछ ही रोज़ बाद वह गायब हो गया। यह घटना सिर्फ़ एक बोर्ड के गायब होने की नहीं बल्कि हमारी सामूहिक बेपरवाही और अपनी अदबी विरासत से दूर होते जाने की भी निशानी है।
 

जिस मोहल्ले में फ़ौक़ जामी जैसे शायर ने अपनी जिंदगी का बड़ा हिस्सा गुज़ारा, जहां उनकी अदबी महफ़िलों की गूंज रही, उसी भरे पूरे मोहल्ले में आज उनकी याद का कोई स्पष्ट निशान दिखाई नहीं देता। शायद अहले मोहल्ला को भी अपनी ही मिट्टी से उठने वाली उस अदबी रोशनी का पूरा एहसास नहीं हो सका जिसने बीकानेर के नाम को अदबी हलकों में पहचान दी। यह विडंबना ही है कि जिन शख्सियात ने शहर की तहज़ीब और अदब को रौनक दी, वक्त के साथ वही नाम हमारी सामूहिक याददाश्त से धुंधले पड़ते चले गए।
 

फ़ौक़ जामी जैसे शायर सिर्फ़ अपने दौर के नहीं होते, वह शहर की सांस्कृतिक रूह का हिस्सा बन जाते हैं। उनकी यादों, उनके नाम और उनकी अदबी विरासत को संभाल कर रखना दरअसल अपनी तहज़ीब और अपनी पहचान को बचाए रखना है।