महाराष्ट्र में मराठी आना अनिवार्य तो अब छत्तीसगढ़ में छत्तीसगढ़ी भी पढ़ना होगा, राजस्थान की सरकार व लोग भाषा को लेकर कब जागेंगे
राजा बोहरा
RNE Special.
कल छत्तीसगढ़ से आई एक खबर ने एक तरफ जहां वहां के लोगों को सेल्यूट कराया वहीं दूसरी तरफ हर राजस्थानी की आंखें भी शर्म से झुकाई। कहते हैं, किसी भी व्यक्ति की पहचान उसकी भाषा से होती है, यही उसकी अस्मिता को अभिव्यक्त करती है। भाषा से ही संस्कृति, विकास, ज्ञान जुड़ा होता है। तभी तो देश में रियासतों का जब गठन हुआ तो हर प्रदेश की अपनी जो भाषा थी, उसे ध्यान रखा गया।
राजस्थान की अपनी राजस्थानी भाषा थी, जो थोड़ी नहीं हजारों साल पुरानी थी। जिसमें यहां राजकाज होता था। इस भाषा का उल्लेख प्राचीन ग्रन्थों में भी मिलता है। इस भाषा का विपुल साहित्य भंडार भी था। आजादी की लड़ाई के समय केवल राजस्थानी एक ऐसी भाषा थी जिसमें अनेक कविताएं, गीत लिखे गए। मध्यकालीन युग मे राजस्थानी काव्य का बड़ा भंडार था। डिंगल ओज की भाषा थी।
आजादी के बाद भी राजस्थानी भाषा में प्रचुर साहित्य लिखा जा रहा है। बड़े शब्द कोष हैं। निरन्तर नए लेखकों की एक श्रृंखला है। साहित्य अकादेमी, नई दिल्ली ने भी राजस्थानी भाषा को मान्यता देकर इस भाषा के राष्ट्रीय पुरस्कार आरम्भ किये हुए हैं। राजस्थानी लोग लगातार 6 दशक यानी 60 साल से भी अधिक समय से राजस्थानी भाषा को मान्यता देने की मांग कर रहे हैं।
मगर यह एक रोचक, दुखद व चिंता की बात है कि अब भी राजस्थानी को राजस्थान की राज भाषा नहीं बनाया गया। इस भाषा को 12 करोड़ से अधिक लोग बोलते हैं, पर संवैधानिक मान्यता नहीं मिली। यह बात दुनिया में बसने वाले हर राजस्थानी को दुखी करती है। क्योंकि राजस्थानी को संवैधानिक मान्यता न होने व दूसरी राजभाषा न होने के कारण यहां की संस्कृति पर भी प्रतिकूल प्रभाव पड़ रहा है। विकास की गति तेज नहीं है।
छत्तीसगढ़ में अब छत्तीसगढ़ी पढ़ायेंगे:
छत्तीसगढ़ प्रदेश के सभी स्कूलों में अब छत्तीसगढ़ी भाषा बोलचाल तक सीमित नहीं रहेगी। अपितु स्वतंत्र रूप से पढ़ाई जाएगी। एससीईआरटी ने अकादमिक समिति गठित कर कक्षा 1 से 12 वीं तक के लिए अलग पाठ्यक्रम और अध्ययन सामग्री तैयार करने की प्रक्रिया शुरू कर दी है।
इसका अर्थ यह हुआ कि अब छत्तीसगढ़ में प्राथमिक शिक्षा से ही छत्तीसगढ़ी को पढ़ाया जाएगा। इस भाषा को जीवित रखा जाएगा। संस्कृति की रक्षा की जाएगी। बच्चों का विकास भी तेजी से होगा।
पहले महाराष्ट्र में निकला था आदेश:
पिछले दिनों महाराष्ट्र सरकार ने एक आदेश जारी कर सभी तिपहिया या अन्य टैक्सियां चलाने वालों के लिए मराठी भाषा सीखना अनिवार्य किया था। जो ड्राइवर भाषा नहीं सीखेगा, उसका लाइसेंस रद्द करने की बात आदेश में थी। फिर महाराष्ट्र सरकार ने अपनी मराठी भाषा की स्थापना के लिए इन ड्राइवरों को मराठी सीखाने की व्यवस्था की। जब नियत अवधि के बाद भी सभी भाषा सीख नहीं सके तो बचे हुए ड्राइवरों को सीखने का और अवसर दिया है। कुल मिलाकर उनको मराठी भाषा सिखानी है। अपनी भाषा को विकसित करना है।
राजस्थान में इस तरह कब होगा?
छत्तीसगढ़ राज्य में कक्षा 1 से 12 तक छत्तीसगढ़ी पढ़ाने का आदेश निकलने के बाद हर राजस्थानी एक ही सवाल कर रहा है कि ऐसा आदेश राजस्थान में कब निकलेगा। यहां तो इस भाषा के ग्रेजुएट, पोस्ट ग्रेजुएट छात्र शिक्षक के रूप में पढ़ाने को तैयार है। पाठ्यक्रम को तैयार करने की समस्या नहीं। बस, सरकार को प्राथमिक शिक्षा से इस भाषा को पढ़ाने के आदेश निकाल शिक्षक लगाने हैं।
इससे नई शिक्षा नीति का ध्येय भी लागू हो जाएगा। 12 करोड़ से अधिक राजस्थानियो की ईच्छा भी पूरी हो जाएगी। हजारों साल पुरानी भाषा को सम्मान भी मिल जाएगी। राजस्थानी संस्कृति की रक्षा हो जाएगी। सबसे बड़ी बात, हर राजस्थानी व राजस्थान की अस्मिता की रक्षा हो जाएगी। मायड़ भाषा के जरिये हर राजस्थानी अपनी मां बोली को सम्मान देकर कर्ज भी अदा कर देगा।