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विधानसभा का मानसून सत्र पहले दिन नहीं चला, विपक्ष ने सड़क पर शिक्षा के मुद्दे पर प्रदर्शन किया

भले ही राजनीतिक प्रदर्शन था, पर शिक्षा तो केंद्र में आई
जंतर मंतर आंदोलन का हो रहा असर
 

मधु आचार्य ' आशावादी '

RNE Special.
 

राज्य में होने वाले अब तक के चुनावों में हमने देखा है कि अधिकतर चुनाव जातिवाद, धर्म, महंगाई, भ्रष्टाचार, घोटाले आदि आदि विषयों पर ही लड़े गए हैं। जिनके जरिये ही प्रमुख दलों ने वोट जुटाकर अपनी सरकारें भी बनाई है। जबकि यह भी शाश्वत सत्य है कि ये मुद्दे इतनी बार चुनाव का आधार बन गए मगर अब जीवित है, मरे नहीं, जैसे अजर अमर है।

पिछले डेढ दशक से तो एक बार फिर धर्म, जाति, मंदिर, मस्जिद जैसे ही मुद्दों का बोलबाला रहा है। राजनीतिक दल इनके नैरेटिव को ही पैदा कर हारते - जीतते रहे हैं। जिसे देखकर हर कोई चिंतित भी नजर आ रहा था। खासकर राज्य का बुद्धिजीवी व मध्यम वर्ग इन मुद्दों से उकता गया था। वो दूसरे विषयों पर बात करना चाहता भी था, मगर वो इन प्रचलित व वोट काटने की फसल के मुद्दों के मध्य गूंगा ही साबित हो जाता था। 
 

किसान, मजदूर, स्वास्थ्य, शिक्षा जो आम आदमी, हर घर की जरूरत है, इनके विषय तो चुनाव व राजनीति के केंद्र में गंभीरता से आये ही नहीं। जबकि मानव जीवन के लिए ये बहुत ही महत्त्व के विषय है। लोकतंत्र की अवधारणा इन पर टिकी है। बाबा साहेब भीमराव अंबेडकर के संविधान की ये आत्मा है, मगर चुनाव के केंद्र में यह विषय कभी आये ही नहीं।

हर घर, हर व्यक्ति की बड़ी जरूरत शिक्षा और स्वास्थ्य है। लोककल्याणकारी राज्य तभी बनता है जब वह अपने नागरिकों को ये दो बड़ी सुविधाएं प्रदान कर दे। इनका हरेक का अधिकार है। मगर ये ही चीजें अब मुश्किल से लोगों को उपलब्ध हो रही है। क्योंकि निजीकरण ने इनको महंगा कर दिया और आम आदमी की पहुंच से यह दोनों सेवाएं बहुत दूर हो गयी। आजादी के 80 वें स्वाधीनता दिवस को हमने मना लिया। अब तो हरेक के लिए यह सुविधा निःशुल्क उपलब्ध हो जानी चाहिए थी।


आह ! शिक्षा भी मुद्धा बन गई:

राजस्थान विधानसभा का मानसून सत्र कल 20 अगस्त से आरम्भ हुआ। एक दिन पहले सर्वदलीय बैठक हुई। सभी दलों के प्रतिनिधि मौजूद। स्वस्थ वातावरण में बात हुई और मिलकर सत्र चलाने की बात कही गयी। उस बैठक के समय किसी को भी इस बात का जरा सा इल्म नहीं था कि कल 16 वीं विधानसभा के 6 ठे सत्र के पहले दिन कुछ खास होने वाला है।  विपक्ष ने सरकार को जरा भी भनक नहीं लगने दी।

20 को सुबह 11 बजे सत्र शुरू हुआ। अध्यक्ष वासुदेव देवनानी सदन में आये। मगर विपक्ष की सभी कुर्सियां खाली थी। सीएम भी आये। इन सबको विपक्ष की खाली कुर्सियां देखकर अचंभा हुआ। इसकी तो कल्पना तक नहीं की थी। पता किया तो जानकारी मिली कि विपक्ष शिक्षा, स्कूलों के मुद्दे पर सड़कों पर प्रदर्शन कर रहा है। यह बात सकते में डाल गयी। विपक्ष के सभी विधायक प्रदर्शन कर समीप के विद्यालय पहुंचे और अंदर गए।

कारण सरकार का 4 दिन पहले का एक आदेश बना। उस आदेश में सरकार ने सरकारी स्कूलों में बिना अनुमति प्रवेश, फोटो खींचने या वीडियो बनाने पर रोक लगाई गई थी। इस आदेश की अवहेलना करने वालों पर अनेक धाराओं के साथ पोक्सो तक में मुकदमा दर्ज करने की बात शामिल थी। मीडिया इसका विरोध कर रहा था और अब विपक्ष भी विरोध में उतर गया। शिक्षा और स्कूलों का मुद्धा देख लोग जरूर गदगद थे। आजादी के 80 वें साल में आखिर शिक्षा मुद्धा तो बनी। भले ही विपक्ष अपनी राजनीति कर रहा था। सरकार को स्पष्टीकरण देना पड़ा कि हमने विधायकों, जन प्रतिनिधियों के स्कूल में प्रवेश पर रोक नहीं लगाई है। मगर विपक्ष तो स्कूलों की बदहाली को मुद्धा बना चुका था।

यह है इस बात की पृष्ठभूमि:

दरअसल, पिछले शिक्षा सत्र में झालावाड़ की एक स्कूल की छत गिरी और 6 बच्चों की मृत्यु हो गयी। उसके बाद अनेक सरकारी स्कूलों की छतें गिरने, पट्टियां टूटने, बच्चों के चोटिल होने की खबर आई। कोर्ट तक मामला पहुंचा और माननीय न्यायालय ने सरकार से स्कूलों की बदहाली सुधारने का निर्देश दिया। सरकार की तरफ से घोषणाएं हुई, रिपोर्ट बनी, बजट स्वीकृत हुआ। लेकिन नया सत्र शुरू होने के बाद भी स्कूलों की बदहाली वैसी की वैसी सामने आई और मीडिया में सुर्खियां बनी।

स्थिति शिव विधायक रवींद्र सिंह भाटी की 15 अगस्त की एक तस्वीर से विकट बनी। भाटी एक सरकारी स्कूल में ध्वजारोहण के लिए गए, वह स्कूल एक झोंपड़े में चल रही थी। मीडिया व सोशल मीडिया में यह तस्वीर खूब वायरल हुई। शिक्षा विभाग व शिक्षा मंत्री को जवाब देते नहीं बना। तब सरकार ने आनन फानन में मीडिया के स्कूलों में प्रवेश पर प्रतिबंध का आदेश निकाला। यह उसी का विरोध स्कूलों की बदहाली को केंद्र में रखकर हुआ था और इसे राष्ट्रीय स्तर पर प्रचार मिला।

जंतर मंतर आंदोलन का असर:

कॉकरोच जनता पार्टी ने शिक्षा व्यवस्था की विसंगतियों और नीट पेपर लीक को लेकर बड़ा आंदोलन जंतर मंतर पर किया। फलस्वरूप छात्रों की मांग पर शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान को इस्तीफा देना पड़ा। फिर तो शिक्षा के मुद्दे पर झारखंड, बिहार, हिमाचल आदि राज्यों में भी छात्र सड़कों पर उतर आये।

 

राजस्थान में तो सरकारी स्कूलों की बदहाली के खिलाफ बच्चे ही सड़क पर उतर आए। जेन - जी के इस आंदोलन को जंतर मंतर आंदोलन का असर ही माना जाना चाहिए।

सरकारों के लिए अलर्ट:

शिक्षा को केंद्र में रखकर शुरू हुए आंदोलन केंद्र व राज्य सरकारों के लिए अलर्ट है। इन सरकारों को समझ लेना चाहिए कि अब शिक्षा को इग्नोर नहीं किया जा सकता। छात्र व युवा इसको लेकर गम्भीर हो गया है। भारत वैसे भी युवाओं का देश है। जेन - जी अब उकताकर बिना किसी राजनीतिक दलों के सहयोग के आंदोलन कर रहा है, जिससे मानना चाहिए कि वो गंभीर है और अब ज्यादा सहन नहीं करेगा। किसी के सहयोग या कृपा पर निर्भर नहीं रहेगा जेन - जी। राजनीतिक दल इनके पीछे रहते दिख रहे हैं, जिससे साफ जाहिर है कि अब ये जेन - जी अपने हक शिक्षा के लिए खुद मैदान में उतर आया है। सरकारों को अलर्ट मोड पर आ जाना चाहिए।