{"vars":{"id": "127470:4976"}}

उर्दू और हिंदुस्तानी ज्ञान परंपरा के अमर प्रहरी, किताब को आम इंसान तक पहुँचाने वाले मुंशी नवल किशोर

 

- इमरोज़ नदीम 

RNE Special.

( हमने साहित्य का ये नया कॉलम ' उर्दू अदब की बातें ' शुरु किया हुआ है। इस कॉलम को लिख रहे है युवा रचनाकार इमरोज नदीम। इस कॉलम में हम उर्दू अदब के अनछुए पहलुओं को पाठकों के सामने लाने की कोशिश करेंगे। ये कॉलम केवल उर्दू ही नहीं अपितु पूरी अदबी दुनिया के लिए नया और जानकारी परक होगा। इस साप्ताहिक कॉलम पर अपनी राय रुद्रा न्यूज एक्सप्रेस ( RNE ) को जरूर दें। अपनी राय व्हाट्सएप मैसेज कर 9672869385 पर दे सकते है। -- संपादक )

उर्दू अदब की तारीख़ जब भी तहरीर की जाएगी, मुंशी नवल किशोर का नाम ब-अदब और ब-एहतराम लिया जाएगा। वह महज़ एक मुद्रक या प्रकाशक नहीं थे, बल्कि इल्मो-अदब के ऐसे सच्चे सरपरस्त थे जिन्होंने किताब को शाही दीवानख़ानों और ख़ास तबक़ों से निकालकर आम इंसान के हाथों तक पहुँचाया। उन्होंने अपने दौर में वह कारनामा अंजाम दिया जो न इदारे कर सके, न हुकूमतें—यानी इल्म को सस्ता, सुलभ और हर दिल की ज़रूरत बना देना।
 

प्रिंटेड सामग्री से साफ़ ज़ाहिर होता है कि मुंशी नवल किशोर का किरदार सिर्फ़ उर्दू तक महदूद नहीं था, बल्कि वह हिंदुस्तानी तहज़ीब के ऐसे अमीन थे जिनकी निगाह में हर ज़बान और हर इल्म क़ाबिल-ए-एहतराम था।

 लखनऊ से इल्म की दुनिया तक मुंशी नवल किशोर का ताल्लुक़ लखनऊ से था—वही लखनऊ जो शायरी, संगीत, दस्तकारी, अदब और तहज़ीब का गहवारा रहा है। कमसिनी में ही उन्होंने अरबी, फ़ारसी और संस्कृत की बाक़ायदा तालीम हासिल की। प्रिंटेड लेखों के मुताबिक़, उनकी दिलचस्पी सिर्फ़ पढ़ने तक सीमित न थी, बल्कि वह इल्म को सुरक्षित करने, सँवारने और आगे पहुँचाने के फ़िक्र में रहते थे।

लखनऊ से प्रकाशित होने वाला “अवध अख़बार” उर्दू सहाफ़त का अहम संग-ए-मील साबित हुआ। यह अख़बार सिर्फ़ ख़बरों का मजमूआ नहीं था, बल्कि समाजी, तालीमी और अदबी शऊर की आवाज़ था। यहीं से मुंशी नवल किशोर को यह एहसास हुआ कि अगर क़लम और प्रेस एक हो जाएँ तो समाज की शक्ल बदली जा सकती है।
 

1858 और नवल किशोर प्रेस की तासीस सन 1858 में, जब हिंदुस्तान सियासी और समाजी उथल-पुथल से गुज़र रहा था, उसी दौर में लखनऊ के हज़रतगंज में “नवल किशोर प्रेस” की बुनियाद रखी गई। प्रिंटेड मजमून इस बात की गवाही देते हैं कि यह महज़ एक कारोबारी क़दम नहीं था, बल्कि एक तहज़ीबी मिशन की शुरुआत थी।
 

आज वही इलाक़ा मुंशी नवल किशोर रोड के नाम से जाना जाता है जो इस बात का सुबूत है कि उनकी शख़्सियत सिर्फ़ किताबों में नहीं, बल्कि शहर की रगों में बस गई। नवल किशोर प्रेस एशिया का इल्मी मरकज़ नवल किशोर प्रेस चंद ही बरसों में उर्दू, फ़ारसी, अरबी और संस्कृत किताबों का सबसे बड़ा मरकज़ बन गया। प्रिंटेड सामग्री में दर्ज है कि हज़ारों किताबें यहाँ से शाया हुईं
किताबें हिंदुस्तान से निकलकर मध्य एशिया, मिस्र और उस्मानी सल्तनत तक पहुँचीं यह प्रेस एशिया की सबसे बड़ी प्रेसों में शुमार की जाती थी

यहाँ दीवान, तज़किरा, तफ़सीर, फ़िक़्ह, तारीख़, सीरत, दर्शन, चिकित्सा और समाजशास्त्र तक की किताबें छपीं। यही वजह है कि नवल किशोर प्रेस को सिर्फ़ “उर्दू प्रेस” नहीं, बल्कि हिंदुस्तानी इल्म का ख़ज़ाना कहा जाता है। क़ुरआन शरीफ़ की छपाई और तहज़ीबी एहतराम प्रिंटेड लेखों में क़ुरआन शरीफ़ की छपाई का जो विवरण मिलता है, वह मुंशी नवल किशोर की दीनी और तहज़ीबी सोच को पूरी तरह उजागर करता है। क़ुरआन शरीफ़ की छपाई अलग कमरे में होती थी जूते-चप्पल या नापाकी की हालत में दाख़िला मना था काग़ज़ की कतरनों तक का एहतराम किया जाता उन्हीं कतरनों से दोबारा काग़ज़ तैयार किया जाता क़ुरआन शरीफ़ की छपाई लिथोग्राफ़ी के ज़रिये होती थी, ताकि ख़त की ख़ूबसूरती और रिवायती अंदाज़ बरक़रार रहे। यह सब इस बात का सुबूत है कि मुंशी नवल किशोर के यहाँ मज़हब भी तहज़ीब के साथ जुड़ा हुआ था।
 

उर्दू अदब की बेमिसाल ख़िदमत:
 

मीर, ग़ालिब, सौदा, दर्द, इंशा, हाली, शिब्ली और सर सय्यद—इन सबकी किताबें नवल किशोर प्रेस से शाया हुईं। दीवान-ए-ग़ालिब, फ़साना-ए-आज़ाद और सैकड़ों अहम तसानीफ़ ने उर्दू अदब को घर-घर पहुँचाया। प्रिंटेड सामग्री यह भी बताती है कि अगर ये किताबें नवल किशोर प्रेस से न छपतीं, तो शायद उर्दू का बहुत-सा इल्मी सरमाया या तो नापैद हो जाता या बहुत महँगा होने की वजह से आम लोगों तक न पहुँच पाता।

अवध अख़बार और उर्दू सहाफ़त:
 

“अवध अख़बार” सिर्फ़ एक अख़बार नहीं, बल्कि उर्दू सहाफ़त की तहरीक था। इसकी मक़बूलियत इतनी बढ़ी कि नवल किशोर प्रेस ने अलग-अलग शहरों में अपनी शाखाएँ खोलीं और अलग-अलग ज़बानों में अख़बार प्रकाशित किए। यहाँ से सहाफ़त ने समाजी ज़िम्मेदारी सीखी इल्म फैलाने की ज़िम्मेदारी।
 

मज़हबी और संस्कृतिक समन्वय प्रिंटेड सामग्री का एक अहम पहलू यह भी है कि नवल किशोर प्रेस से क़ुरआन, हदीस, तफ़सीर रामायण और महाभारत संस्कृत, फ़ारसी और अरबी के क्लासिकी ग्रंथ सब एक ही एहतराम और शफ़क़त के साथ शाया हुए। यह उस दौर में सांस्कृतिक समन्वय की सबसे बड़ी मिसाल थी। सर सय्यद और अलीगढ़ तहरीक अलीगढ़ तालीमी तहरीक के दौरान मुंशी नवल किशोर का तआवुन सर सय्यद अहमद ख़ाँ के साथ रहा। कई अहम तालीमी और सुधारवादी मजामीन इसी प्रेस से छपे। यह साझेदारी मुसलमानों में तालीमी बेदारी की बुनियाद बनी।फ़न और किताब की ख़ूबसूरती नवल किशोर प्रेस की छपाई अपने हुस्न-ए-ख़त नक़्शो-निगार आला काग़ज़ नफ़ीस जिल्दबंदी के लिए आज भी मिसाल मानी जाती है। किताब यहाँ सिर्फ़ पढ़ने की चीज़ नहीं, देखने और सँजोने की चीज़ बन जाती थी।

विरासत और सरकारी मान्यता:
 

1895 में मुंशी नवल किशोर का इंतिक़ाल हुआ, लेकिन उनकी इल्मी विरासत आज भी ज़िंदा है। लखनऊ के निशादगंज में क़ायम की गई पेपर मिल, उनकी दूरअंदेशी का सुबूत है।
 

भारत सरकार ने 1970 में उनके सम्मान में डाक टिकट जारी किया जो इस बात की तसदीक़ है कि उन्होंने भारतीय भाषाओं में ज्ञान के प्रसार और सांस्कृतिक प्रतिरोध में बेमिसाल योगदान दिया।
मुंशी नवल किशोर ने साबित कर दिया कि किताब सिर्फ़ काग़ज़ नहीं होती वह तहज़ीब की रूह होती है। अगर शायरों ने उर्दू को लफ़्ज़ों की ज़िंदगी दी, तो मुंशी नवल किशोर ने उसे छापकर, फैलाकर और सँवारकर हमेशा के लिए अमर कर दिया।