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बीकानेर जिन खास लोगों की वजह से देश में पहचाना जाता है उनमें एक है कवि, कथाकार, आलोचक मालचंद तिवाड़ी

 

मधु आचार्य ' आशावादी '

RNE Network.

( बीकानेर के साहित्य को पूरे देश में सम्मान दिया जाता है। इस बड़े शहर के रचनाकारों की बड़ी प्रोफ़ाइल है। इन्होंने न केवल पश्चिमी सीमा पर स्थित बीकानेर से चलकर पूरे देश में डग भरे, अपितु इस शहर की थरपणा भी देश मे की। इन रचनाकारों ने सीमाओं व वर्जनाओं को तोड़ा। बीकानेर व देश के हर प्रान्त के मध्य पुल बनाया। इस कारण ही आज बीकानेर के साहित्य जगत को पूरे देश में पहचान मिली। आज जो बीकानेर के रचनाकार अपने को राष्ट्रीय फलक पर चर्चित पाते हैं, उसमें कई रचनाकारों की मेहनत लगी है। उन्होंने पसीने से बीकानेर के साहित्य दरख़्त को सींचा है। उन लोगों के प्रति कृतज्ञता प्रकट करते हुए रुद्रा न्यूज एक्सप्रेस ( RNE) यह कॉलम आरम्भ कर रहा है। इसकी पहली कड़ी में हम कवि, कथाकार, आलोचक, अनुवादक मालचंद जी तिवाड़ी के बारे में पाठकों को परिचित करा रहे हैं। आप अपनी प्रतिक्रिया जरूर बताएं। -- संपादक )

एक युवा। जिसके पास विरासत में मिला साहित्य का कोई संस्कार नहीं था। शब्द की पूजा का विरासत में मंदिर नहीं मिला। आसपास के लोग कुछ शब्द के साधक थे तो बहुतायत में जिंदगी को मस्ती से जीने के हेबिछुअल।

इनके बीच से श्यामवर्णीय वह युवा शब्द के अथाह समुद्र के बीच खड़ा होने के लिए शब्द सरिता से टकराता दिखा। शब्द को पकड़ पकड़कर उसे समझने के लिए अपने को अपने से जदोजहद कर रहा था। खुद ही शब्द को पकड़ता, उसका आगा - पीछा सोधता और उसके अर्थ को खोजता। शब्द का अर्थ मिल जाता तो आर्किमिडीज की तरह खुद ही खुद से खुश होकर ' यूरेका ' कहता और उछल पड़ता।
 

इस श्यामवर्णीय छरहरे शरीर के युवा की प्रज्ञा का लोहा तो पूरी मित्र मंडली मानती थी, मगर उसे इस बात का जरा भी अहसास नहीं था कि यह युवा एक छटपटाहट के साथ हर दिन का सफर तय करता है। वो रोज किसी न किसी शब्द और उसके अर्थों से संघर्ष करता था। शब्द के एक अर्थ से उसे संतोष नहीं मिलता, अन्य दूसरे अर्थ तलाशता था। कुछ मित्र उसे खपती कहते तो कुछ कारण न जानने के बाद भी सराहना कर देते कि कोई ठीक काम ही कर रहा होगा।
 

खुद का गुरु जब खुद को ही बनना हो तो बिना विनम्रता कुछ भी अर्जित किया जाना संभव नहीं होता। इसी विनम्र भाव की उस युवा में बहुलता थी। जब वो अपनी मेहनत और प्रयासों के बाद भी शब्द का अर्थ, व्यंजना और विशेषण नहीं समझ पाता या यूं कहें कि उससे संतुष्ट नहीं हो पाता तो बिना किसी संकोच अपने अग्रज के पास जाना, अर्थ पूछना और संतुष्ट न होने तक उस शब्द के बारे में जानना, उसका स्थायी स्वभाव था। इस प्रक्रिया का ही जीवन में महत्त्व होता है और आदमी उससे सीखता है। जो इस विधि से अलग शॉर्ट कट का उपयोग कर प्रसिद्धि पाता है, उसका ज्ञान खोखला होता है। एक समय बाद चुक जाता है और फिर वह लिखने के नाम पर खुद को दोहराने के अलावा कुछ नहीं करता। सीधे शब्दों में कहें तो बेकार लेखक होकर रह जाता है।

किन्तु इस प्रक्रिया में उम्र के हर पड़ाव में अपने को समर्पित रखने वाला, लिखने से ज्यादा पढ़ने वाला और कुछ नए साहित्यिक मूल्यों की प्रतिस्थापना करने वाला ही मालचंद तिवाड़ी बनता है। बोलने में यह नाम बहुत आसान है -- मालचंद तिवाड़ी। मगर इस नाम को सार्थक बनाना कितना कठिन है, यह इस रचनाकार की साहित्यिक यात्रा को जानकर ही महसूस किया जा सकता है।

जिसने अचंभित कर दिया सबको:

मालचंद तिवाड़ी जी ने कथा साहित्य से अपनी यात्रा की गम्भीर शुरुआत की। उनके साथ उनके कई मित्र भी सक्रिय हुए थे, किन्तु वे एक तय रफ्तार में एक ही विधा की तरफ अग्रसर हो सफर तय करने लगे। उन्होंने अर्जित को सृजित करना आरम्भ कर दिया। मगर मालचंद तिवाड़ी का लक्ष्य तो दूसरा था। अर्जित पर राज करने, रचने या इतराने का उनका स्वभाव तो था नहीं, वे तो कुछ नया चाहते थे। नए की तलाश थी उनको।

 

इस तलाश ने ही उनको मीर, गालिब, फिराक के नजदीक ला दिया। एक अच्छे उर्दू दां से बेहतर उर्दू साहित्य का अध्ययन व ज्ञान मालचंद तिवाड़ी को है। उर्दू की तरफ से जब पूरी तरह संतुष्ट नहीं हुए तो जेन कथा साहित्य की तरफ वे मुद गए। वहां से भी बहुत कुछ पाया, मगर तिवाड़ी जी को संतोष कहाँ। अब भी नया पाने की उनकी भूख कम नहीं हुई, जितना जाना उससे भूख कम होने के बजाय बढ़ गयी। यही तो मालचंद तिवाड़ी की सर्जनात्मक क्षमता के पावर हाउस की वजह है।

पहला कदम, बड़ा डग:

हिंदी और राजस्थानी साहित्य की अनेक पत्र पत्रिकाओं में तब तक मालचंद तिवाड़ी नाम की बड़ी पैठ बन चुकी थी। अनेक कहानियां राष्ट्रीय स्तर पर दोनों भाषाओं में प्रकाशित हो गयी थी। लगातार हो रही थी। लोग उस समय सिफारिश के साथ किसी अच्छी साहित्यिक पत्रिका के संपादक को रचना भिजवाते थे, तब जाकर कभी कभार छपती थी। मगर दूसरी तरफ संपादक खुद अपनी तरफ से मालचंद तिवाड़ी को आग्रह कर रचना मांगते थे। न केवल मांगते थे, अपितु रचना की प्रतीक्षा करते थे। यह इज्जत बीकानेर के बहुत कम रचनाकारों को आज तक मिल पाई है, आगे भी मिलनी मुश्किल है। क्योंकि अब तो वैसे रचना के क़द्र दां संपादक ही नहीं रहे। अब तो थोड़ी से सेवा ( खाद्य पदार्थों की ) कर दो, संपादक जी की जय जयकार कर दो, उनको महान बता दो, इतने भर में किसी भी माध्यम में छप जाओ। अपनी कलम के बूते, बिना मिले, लिखे के तेवर से अखबार व पत्रिकाओं में स्थान पाने की जो इज्जत मालचंद तिवाड़ी ने पाई, वो कोई नहीं पा सकता। इस बड़ी उपलब्धि के कारण समकालीन बड़े ( कथित ), अन्य रचनाकार तिवाड़ी से रश्क भी रखते थे, ये भी बड़ी सच्चाई है। उनकी परवाह वे करते तो लम्बे डग नहीं भर सकते थे। कटु सत्य है कि मालचंद तिवाड़ी ने लोगों से असली सराहना कम पाई, लोगों ने उनसे ईर्ष्या अधिक पाली। शायद, इस कारण ही वे लंबे डग भरकर उनसे आगे निकल सके।

जब पहली बार देश के साहित्यिक दिग्गजों के बीच तिवाड़ी ने बोला तो सब विस्मित थे। वे लोग भी जो बीकानेर की पहचान बने हुए थे राजधानी में। तर्क के साथ उदाहरणों सहित व्याख्या और वो भी चुनिंदा शब्दों में, कम ही सुनने को मिलती है। इसमें मालचंद जी को महारथ हासिल है। पूरे देश का साहित्य जगत उनके इस वाक कौशल व तर्क कौशल की कद्र करता है और झुककर सलाम करता है। उन लोगों को इस बात का जरा सा भी इल्म नहीं कि इस उद्बोधन के पीछे उनका वर्षों का अध्ययन है। उनके खुद के द्वारा अर्जित ज्ञान है, इस कारण पक्का है। उधारी या दया में मिला ज्ञान नहीं है। शब्द की सत्ता की जिस स्थापना की बात डॉ अर्जुन देव चारण करते हैं, उसी के मजबूत सेनापति मालचंद तिवाड़ी है। उनकी ज्ञान मीमांसा के प्रति सी पी देवल को भी सम्मान करते देखा जाता है। युवाओं की एक लंबी फेहरिस्त है जो उनके इस वाक चातुर्य व तर्क क्षमता की कायल है। एक बार राजधानी में बोले तो आज तक उसकी धमक बरकरार है और हर गम्भीर ज्ञान गोठ में मालचंद तिवाड़ी को याद किया जाता है।

' मालजी ' संबोधन यूँ ही नहीं मिलता:

देश का बड़े से बड़ा साहित्यकार हो या बीकानेर का नवोदित, सब स्नेहवश उनको ' मालजी ' का सम्बोधन देते हैं। ये निक नेम कितनी बड़ी उपाधि है, यह कोई बड़े शहर बीकानेर का वासी ही जान सकता है। जिस शहर में लोग सत्ता पर काबिज लोगों को देखकर मुंह घुमा लेते हैं। उनको नमस्कार करना मजबूरी समझते हैं। उनके ओहदे को कोई इज्जत अतिरिक्त नहीं देते। उस शहर के लोग उनको देखते ही रुक जाते हैं और बहुत ही अदब, बीकानेर स्टाइल में हाथ जोड़कर कहते हैं -- नमस्कार मालजी
यह सम्मान पाना हरेक के बस की बात नहीं। इसको पाने के लिए विनम्र होना पड़ता है, सदाशयी होना होता है, सबके लिए खुद को अर्पित करना होता है, अपार ज्ञान को पाना होता है, तब जाकर ऑस्कर से बड़ी डिग्री ' मालजी ' इस अलीजा शहर में मिलती है। ये वो शहर है जिसने राजतन्त्र का भी विरोध किया और अपना वजूद स्थापित किया।

ये बीकानेर वो है जो सदा सत्ताओं को चुनोती देता नजर आया। ये वो शहर है जिसने आजादी के 75 साल बाद भी देश में कर्फ्यू नहीं देखा, उसकी वजह मालजी जैसे लोग हैं। यहां की सामाजिक समरसता यदि जिंदा है तो यहां के रचनाधर्मियों के कारण। जिन्होंने जातिगत विभेद कभी खड़े होने ही नहीं दिए। जिन लोगों की इस माहौल को बनाने में मेहनत है उनमें एक मालजी भी है। इस तरह के संवेदनशील व्यक्तित्त्व के कारण ही उनको डॉ अर्जुन देव चारण, सी पी देवल, मंगत बादल, वरिष्ठ रचनाकार भंवरसिंह सामौर, अजरुह दा, शीन काफ निजाम, के श्रीनिवास राव, शिवराज छंगाणी, यादवेंद्र शर्मा चन्द्र, कमल रंगा, संजय पुरोहित, अमित गोस्वामी, असित गोस्वामी, रवि शुक्ला, नदीम अहमद आदि उनको मालजी कहते हैं।

बड़ी है प्रोफ़ाइल:

कवि, कथाकार, आलोचक, अनुवादक मालचंद तिवाड़ी की प्रोफाइल बहुत बड़ी है। उनके पुरस्कारों, पुस्तकों आदि का उल्लेख कर प्रोफ़ाइल को छोटा नहीं करना चाहूंगा। क्योंकि लेखक पुरस्कारों से नहीं, अपनी शब्द साधना से पहचाना जाता है। उसको पुरस्कार उसके श्रोता है। उसके शहर के लोग उसका दिल से सम्मान करें और देश उनका हर चर्चा में उल्लेख करे, इससे बड़ा पुरस्कार कोई होता ही नहीं। माफ करें, जिनके नाम के आगे कई पुरस्कारों की तख्तियां टंगी है, उनको वे तो मिल गए, मगर मालजी जैसा पुरस्कार नहीं मिल पाया। न कभी मिल सकेगा। क्योंकि उन तख्तियों में आधा खेल तो तिकड़म का है, जो मालजी ने कभी नहीं की। उन तख्तियो वाले रचनाकारों के मन में मलाल तो है, मालजी जैसा पुरस्कार नहीं मिला ना। उनका ये मलाल कभी मिटने वाला भी नहीं, क्योंकि मालजी जैसा पुरस्कार लिया नहीं जाता, लोग देते हैं। ये इन तख़्तिवीरों का स्वभाव नहीं। 

अभी और डग भरने है:

मालचंद तिवाड़ी की पारी अभी नाबाद है। अभी तो शतक दर शतक लगाने है। किये हुए कामों की जुगाली मालजी का स्वभाव नहीं। भारतीय सनातन साहित्य परम्परा के ग्रंथों पर अभी उनका जो अध्ययन है, वह बेजोड़ है। उसमें डूबे मालजी स्वभाव अनुसार कुछ नया खोजने में लगे हैं। समुद्र में गोता लगाया हुआ है, वो भी मालजी ने, जाहिर है कुछ अनमोल मोती निकालकर समाज के लिए लाएंगे।

 

( इस आलेख पर अपनी प्रतिक्रिया देंगे, यह अपेक्षा है। प्रतिक्रिया 9672994671 पर दें। )