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राधाकृष्ण सहगल : दर्द, तहज़ीब और इंसानी एहसास के शायर

 

इमरोज़ नदीम 

RNE Special.

उर्दू अदब की तारीख़ में कुछ नाम ऐसे होते हैं जो केवल अपनी शायरी की वजह से नहीं, बल्कि अपने इल्मी ज़ौक़, तहज़ीबी शऊर और अदबी सरगर्मियों के कारण भी याद रखे जाते हैं। राधाकृष्ण सहगल साहब का नाम भी उन्हीं शख्सियात में शामिल हैं जिन्होंने अपनी शख्सियत और फ़िक्र से उर्दू अदब को नई रौनक़ अता की।
राधाकृष्ण सहगल साहब का जन्म सन 1909 में पंजाब के मशहूर शहर कोटकपूरा में एक सम्मानित परिवार में हुआ। उनके वालिद  चैलाराम सहगल साहब रेलवे विभाग में मुलाज़िम थे। वे उर्दू, फ़ारसी और अंग्रेज़ी तीनों ज़बानों पर बेहतरीन पकड़ रखते थे। इल्म और अदब से उनकी गहरी दिलचस्पी थी, जिसका असर राधाकृष्ण सहगल साहब की तर्बियत और मिज़ाज पर भी पड़ा। घर का माहौल अदबी था, इसलिए बचपन से ही उन्हें शेर-ओ-शायरी, ज़बान और तहज़ीब से एक ख़ास लगाव पैदा हो गया।
कहा जाता है कि सहगल साहब को शायरी का शुरुआती शौक़ अपने वालिद को उर्दू के अशआर नोटबुक में दर्ज करते हुए देखकर हुआ। उनके वालिद अल्लामा इक़बाल के कलाम के बड़े कद्रदान थे। यही वजह थी कि सहगल साहब के भीतर भी अदब की मोहब्बत धीरे-धीरे परवान चढ़ती गई।

 

प्रारंभिक शिक्षा उन्होंने फ़िरोज़पुर के रामसुख दास कॉलेज में प्राप्त की और बाद में दयानंद मथुरा दास कॉलेज से अपनी तालीम मुकम्मल की। तालीम पूरी करने के बाद सन 1929 में रेलवे विभाग से नौकरी का सफ़र शुरू हुआ। अपनी मेहनत, लगन और प्रशासनिक क्षमता के बल पर उन्होंने रेलवे सेवा में लगातार तरक़्क़ी हासिल की और इंडियन रेलवे ट्रैफिक सर्विस तक पहुंचे। उन्होंने रेलवे मंत्रालय और फ़ूड कॉरपोरेशन ऑफ़ इंडिया जैसे महत्वपूर्ण संस्थानों में भी वरिष्ठ पदों पर अपनी सेवाएं दीं।
बीकानेर से उनका संबंध केवल नौकरी तक सीमित नहीं रहा, बल्कि यहां के अदबी माहौल ने उन्हें गहरे तौर पर मुत्तासिर किया। बीकानेर की महफ़िलें, मुशायरे और साहित्यिक गोष्ठियां उन्हें बेहद पसंद थीं। वह यहां के शायरों और अदीबों के बीच बड़े एहतराम की निगाह से देखे जाते थे।

 

बीकानेर आने के बाद राधाकृष्ण सहगल साहब की अदबी ज़िंदगी ने एक नया मोड़ लिया। यहां की अदबी महफ़िलों, मुशायरों और शायरों की सोहबत ने उनके भीतर छिपे शायर को पूरी तरह जागृत कर दिया। धीरे-धीरे उनका राब्ता बीकानेर के प्रसिद्ध उस्ताद शायर अल्लामा बेदिल बीकानेरी साहब से हुआ। यही वह दौर था जब सहगल साहब ने बाकायदा शेर कहना शुरू किया।
 

जिया फतेहाबादी ने अपनी किताब “शेर और शायर” में राधाकृष्ण सहगल साहब के हवाले से लिखा है कि कॉलेज के दिनों में वह कभी-कभार शेर कह लिया करते थे, लेकिन शायरी का वास्तविक शौक़ सन 1956 में बीकानेर के एक मुशायरे से पैदा हुआ। उस मुशायरे में जब हज़रत बेहज़ाद देहलवी के अशआर का तरन्नुम से आगाज़ हुआ तो जनाब मोहम्मद अब्दुल्ला बेदिल बीकानेरी की नज़र सहगल साहब पर पड़ी और उन्होंने उन्हें शेर कहने के लिए उत्साहित किया। सहगल साहब ने इक़बाल के साथ-साथ ग़ालिब, मीर, मोमिन और बेदिल बीकानेरी के कलाम का गहरा अध्ययन किया, जिसने उनकी शायरी को एक मजबूत फ़िक्र और ज़बान अता की।
 

राधाकृष्ण सहगल साहब ने किसी उस्ताद की बाकायदा शागिर्दी तो इख़्तियार नहीं की, लेकिन बीकानेर और इलाहाबाद की अदबी महफ़िलों से उन्होंने बहुत कुछ सीखा। उन्होंने ख़ुद स्वीकार किया कि जनाब मोहम्मद उस्मान आरिफ नक्शबंदी और जनाब मजहर नसीब जैसे अहले-अदब की सोहबतों ने उनकी फ़िक्र को नई दिशा दी। यही वजह है कि उनके कलाम में बनावट या बनावटी एहसास नहीं, बल्कि ज़िंदगी की सच्चाइयों की सीधी और साफ़ अभिव्यक्ति दिखाई देती है।
 

सहगल साहब का कलाम सादा लेकिन असरदार है। उन्होंने ग़ज़ल, रुबाई, क़ता और नज़्म जैसी तमाम सिन्फों में अपनी तख़्लीक का परिचय दिया। उनकी शायरी में इंसानी जज़्बात, मोहब्बत, वफ़ा, जीवन-संघर्ष और सामाजिक अनुभवों की गहरी झलक मिलती है। उनकी भाषा में नफ़ासत है, मगर वह आम आदमी के एहसास से जुड़ी रहती है।
 

उनके यहां उम्मीद और जीवन के रंग भी मौजूद हैं। वह छोटी-छोटी खुशियों में ज़िंदगी की बड़ी सच्चाइयों को तलाश करते नज़र आते हैं। एक शेर में वह कहते हैं 

मसाइब में संवरता है, निखरता है रुख़-ए-हस्ती
हज़ारों ख़ार चुभते हैं तो फिर एक फूल खिलता है।

यह शेर दरअसल इंसानी ज़िंदगी के संघर्ष और सब्र का बयान है। सहगल साहब का मानना था कि तकलीफ़ें इंसान को मज़बूत बनाती हैं और कठिन रास्तों से गुज़रकर ही इंसान कामयाबी और राहत तक पहुंचता है।
सहगल साहब ने अपने दौर की सामाजिक और आर्थिक विडंबनाओं को भी बड़ी बेबाकी से बयान किया। आज की बाज़ारी मानसिकता और इंसान की मजबूरियों पर उनका यह शेर बहुत गहरी चोट करता है 

हाय वो भूख जो खा जाती है इंसानों को
हाय वो जिस्म जो बिक जाते हैं बाज़ारों में।

इसी सिलसिले का उनका एक और शेर इंसानी बेबसी और गरीबी का दर्द समेटे हुए है 

रोटी महंगी है, जिस्म सस्ते हैं
तेरी दुनिया में क्या नहीं होता।

इन अशआर में केवल शिकायत नहीं, बल्कि समाज के गिरते हुए नैतिक मूल्यों पर एक गंभीर टिप्पणी भी मौजूद है। सहगल साहब ने इंसानी तकलीफ़ को केवल महसूस ही नहीं किया बल्कि उसे अपने कलाम में पूरी सच्चाई के साथ दर्ज भी किया।
 

उनकी शायरी का एक  रूमानी एहसास का भी है। वह फूल, बहार, चमन और जवानी जैसी पारंपरिक उर्दू प्रतीकों को बड़ी सादगी और दिलकशी के साथ इस्तेमाल करते हैं। देखिए ये अशआर 

क्या बला है शराब की मस्ती
हर कली बदगुमान होती है।

चमन आराइये बहार न पूछ
टहनी-टहनी जवान होती है।

और यह शेर उनकी रूमानी कैफ़ियत और जज़्बाती लय का बेहद खूबसूरत नमूना है 
 

जब भी फूटी है कली कोई चमन में ‘सहगल’
दिल पे बन आई है, बन आई है, बन आई है।

 

राधाकृष्ण सहगल साहब की शायरी में ग़म और ज़िंदगी का रिश्ता बहुत गहरे एहसास के साथ सामने आता है। वह दर्द को केवल एक व्यक्तिगत अनुभूति नहीं मानते, बल्कि उसे इंसान की तामीर का जरिया समझते हैं। उनके यहां ग़म इंसान को तोड़ता नहीं, बल्कि उसे निखारता है। यही वजह है कि उनके अनेक अशआर में दर्द एक रूहानी और तजुर्बाती सच्चाई बनकर उभरता है।
 

वह मानते हैं कि ज़िंदगी की कठिन राहों से गुज़रे बिना इंसान की शख्सियत मुकम्मल नहीं होती। उनके यह अशआर इसी फ़िक्र की गवाही देते हैं 

दर्दमंदों की दर्दमंदी का
दर्द ही तर्जुमान होता है।

और एक दीगर शेर में वह ग़म को अपनी ज़िंदगी का सहारा बताते हुए कहते हैं 

मैं सांस लेता हूं अब तक इन्हीं ग़मों के तुफैल
इन्हीं ग़मों से बसाए हैं मैंने वीराने।

इन अशआर में दर्द की नुमाइश नहीं, बल्कि जीवन के तल्ख़ तजुर्बों की सच्ची अभिव्यक्ति है। सहगल साहब का मानना था कि इंसान ग़म की आग में तपकर ही असल मायनों में इंसान बनता है। यही कारण है कि उनकी शायरी में दर्द एक शिकायत नहीं बल्कि जीवन-दर्शन बनकर सामने आता है।
 

राधाकृष्ण सहगल साहब का एक महत्वपूर्ण शेअरी मजमूआ “ख़राशें” के नाम से सन 1976 में प्रकाशित हुआ, जिसे अदबी हलकों में अच्छी सराहना मिली। इस मजमूए में उनकी ग़ज़लों, जज़्बात और फ़िक्र का व्यापक रंग देखने को मिलता है। उनकी शायरी में मोहब्बत, तन्हाई, उम्मीद, दर्द और इंसानी रिश्तों की महीन परतें बड़ी सादगी और असर के साथ सामने आती हैं।
 

उनकी एक ग़ज़ल के कुछ अशआर मुलाहिज़ा हों 

दिल की दुनिया जवान होती है
जिंदगी इम्तिहान होती है।

जब गुजरती है ख़ामोशी हद से
प्यास की तर्जुमान होती है।

इब्तिदा और इंतेहा से बढ़कर
दर्द की दास्तान होती है।

लगज़िशें पा रहे हैं मोहब्बत में
मंजिलों का निशान होती है।

चमन आराइये बहार न पूछ
टहनी-टहनी जवान होती है।

राधाकृष्ण सहगल साहब की ग़ज़लों में जहां दर्द और सामाजिक यथार्थ की गूंज सुनाई देती है, वहीं रूमानी एहसास, इंसानी रिश्तों की नज़ाकत और जज़्बात की महीन परछाइयां भी पूरी खूबसूरती के साथ मौजूद हैं। उनकी शायरी में क्लासिकी उर्दू ग़ज़ल की रवायत भी दिखाई देती है और आधुनिक दौर की बेचैनी भी।
उनकी एक ग़ज़ल के अशआर मुलाहिज़ा हों 

हाय दुनिया को क्या नहीं मालूम
आंसुओं की ज़बान होती है।

कुछ समझकर ही चुप हूं ऐ ‘सहगल’
बेज़बानी ज़बान होती है।

इन अशआर में सहगल साहब ने इंसानी जज़्बात को बेहद सादा लेकिन असरदार अंदाज़ में बयान किया है। “आंसुओं की ज़बान” और “बेज़बानी ज़बान होती है” जैसे मिसरे उनकी फ़िक्र की गहराई और एहसास की नर्मी को उजागर करते हैं।
उनकी दूसरी ग़ज़ल में इश्क़, रुसवाई, जमाने की बेरुख़ी और इंसानी तन्हाई का दर्द साफ़ दिखाई देता है। देखिए 

ये हुस्नो-इश्क़ का दस्तूर, ये निज़ामे-जुनूं
हम उनको कहते हैं अपना, वो हम को बेगाना।

वो नूरे-शम्अ बढ़ाने को जल के ख़ाक हुआ
मगर किसी ने न जाना मक़ामे-परवाना।

दबा रहा हूं ज़माने के ग़म जहां ‘सहगल’
वहीं बरसता है अब खुल के अब्रे-मयख़ाना।

इन अशआर में सहगल साहब ने इश्क़ की रिवायती प्रतीकों  शम्अ, परवाना, मयख़ाना  को बड़ी खूबसूरती से इस्तेमाल किया है। मगर इन प्रतीकों के पीछे केवल रूमानी कैफ़ियत नहीं, बल्कि इंसानी दर्द और जमाने की तल्ख़ सच्चाइयां भी छिपी हुई हैं।
 

उनकी ग़ज़लों का एक और रंग फ़लसफ़ाना अंदाज़ का है। ज़िंदगी और मौत जैसे मौजू पर भी उन्होंने बेहद सोच-विचार के साथ शेर कहे हैं ।

हर कदम पर है आग का दरिया
क्या यही मौसमे-शबाब नहीं।

इन अशआर में जीवन की कठिनाइयों, संघर्ष और समय की तल्ख़ हक़ीक़तों को फ़लसफ़ियाना अंदाज़ में पेश किया गया है। सहगल साहब की यही विशेषता उन्हें केवल एक रूमानी शायर नहीं रहने देती, बल्कि उन्हें एक गंभीर विचारशील शायर के रूप में स्थापित करती है।
 

राधाकृष्ण सहगल साहब का कलाम पढ़ते हुए महसूस होता है कि उन्होंने जिंदगी को बहुत करीब से देखा, समझा और जिया था। उनके यहां दर्द बनावटी नहीं, बल्कि तजुर्बे की आंच से निकला हुआ एहसास है। यही वजह है कि उनका कलाम आज भी उर्दू अदब के कद्रदानों के दिलों में अपनी अलग पहचान बनाए हुए है।
 

राधाकृष्ण सहगल साहब उन शायरों में शुमार किए जा सकते हैं जिन्होंने उर्दू शायरी को केवल अल्फ़ाज़ का खेल नहीं बनने दिया, बल्कि उसे इंसानी एहसास, सामाजिक चेतना और ज़िंदगी की सच्चाइयों का आईना बनाया। उनकी शायरी में बीते दौर की तहज़ीब की खुशबू भी है और इंसानी दर्द की तपिश भी। यही कारण है कि उर्दू अदब की दुनिया में राधाकृष्ण सहगल साहब का नाम हमेशा एहतराम और मोहब्बत के साथ लिया जाता रहेगा।