सर्वपितृ अमावस्या : किसी भी तिथि को मृत्यु हुई, इस दिन कर सकते हैं श्राद्ध-तर्पण!
Rudra News Express Bikaner.
यदि आप श्राद्ध, तर्पण, पिंडदान में आस्था रखते हैं। इस माध्यम से पितरों या पूर्वजों के प्रति कृतज्ञता जताने या उनकी तृप्ति के लिए तर्पण-पिंडदान करना चाहते हैं लेकिन पूरे 15 दिन में ऐसा नहीं कर पाएं तो चिंता की बात नहीं। आज वह अवसर है जब किसी भी पूर्वज-दिवंगत के लिए तर्पण-पिंडदान किया जा सकता है। वजह, आज सर्वपितृ अमावस्या है।
दरअसल आज पूरे 15 दिन से चल रहे श्राद्ध पक्ष का समापन है। यह दिन सबसे महत्वपूर्ण है क्योंकि किसी कारणवश अपने दिवंगत परिजनों का श्राद्ध, तर्पण या पिंडदान निर्धारित तिथि पर नहीं कर पाए हैं, तो आज सर्वपितृ अमावस्या पर उनके निमित्त श्राद्ध कर्म कर सकते हैं। इस तिथि पर ज्ञात और अज्ञात, दोनों प्रकार के पितरों के लिए श्राद्ध का विधान है।
आज इन दिवंगतों का श्राद्ध :
अमावस्या तिथि पर उन दिवंगतों का श्राद्ध किया जाता है जिनकी मृत्यु अमावस्या तिथि, पूर्णिमा तिथि तथा चतुर्दशी तिथि को हुयी हो। यदि कोई सम्पूर्ण तिथियों पर श्राद्ध करने में सक्षम न हो, तो वो मात्र अमावस्या तिथि पर सभी के लिये श्राद्ध कर सकता है।
अमावस्या तिथि पर किया गया श्राद्ध, परिवार के सभी पूर्वजों की आत्माओं को प्रसन्न करने के लिये पर्याप्त है। जिन पूर्वजों की पुण्यतिथि ज्ञात नहीं है, उनका श्राद्ध भी अमावस्या तिथि पर किया जा सकता है। इसीलिये अमावस्या श्राद्ध को सर्वपितृ मोक्ष अमावस्या के नाम से भी जाना जाता है।
महालय श्राद्ध का विधान भी इसी दिन :
खास बात यह है कि पूर्णिमा तिथि पर मृत्यु प्राप्त करने वालों के लिये महालय श्राद्ध भी अमावस्या श्राद्ध तिथि पर किया जाता है, न कि भाद्रपद पूर्णिमा पर। भाद्रपद पूर्णिमा श्राद्ध पितृ पक्ष से एक दिन पहले पड़ता है, किन्तु यह पितृ पक्ष का भाग नहीं है। सामान्यतः पितृ पक्ष, भाद्रपद पूर्णिमा श्राद्ध के अगले दिन से आरम्भ होता है।
दान-पुण्य और पाठ :
सर्वपितृ अमावस्या पर ब्राह्मण भोज, वस्त्रदान, तिलदान, जलदान और दीपदान जैसे धार्मिक कार्य किए जाते हैं। गाय को हरा चारा अर्पित करना भी शुभ माना जाता है। इस दिन श्रीमद्भगवद्गीता, श्रीविष्णुसहस्रनाम या रुद्रपाठ का पाठ कर पितरों की शांति के लिए प्रार्थना करने की परंपरा है। श्रद्धापूर्वक किया गया श्राद्ध कर्म पितरों के प्रति कर्तव्य निभाने का माध्यम है। इसे पितृ ऋण से मुक्ति की कामना, पारिवारिक सुख-समृद्धि और मानसिक शांति से भी जोड़ा जाता है।
पंडित नवरतन व्यास कहते हैं, श्राद्ध-तर्पण केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि अपनी जड़ों, परिवार की परंपराओं और दिवंगत परिजनों को स्मरण करने का अवसर भी है। जिन लोगों से पितृ पक्ष में श्राद्ध छूट गया हो, वे अपनी पारिवारिक परंपरा और मान्यताओं के अनुसार अमावस्या के दिन दिन पूर्वजों का स्मरण कर सकते हैं।