शायर-ए-मज़दूर अहसान दानिश : संघर्ष, स्वाभिमान और संवेदना की आवाज़
इमरोज़ नदीम
RNE Special.
उर्दू शायरी की दुनिया में जब भी मेहनतकश इंसान, पसीने की महक, मुफ़लिसी की चुभन और ख़ुद्दारी की बुलन्द आवाज़ का ज़िक्र होगा, अहसान दानिश का नाम पूरे एहतराम के साथ लिया जाएगा। उर्दू अदब में अनेक शायर हुए जिन्होंने ग़रीबी, मज़दूरी और सामाजिक विषमता पर लिखा, मगर अहसान दानिश की विशेषता यह है कि उन्होंने इन विषयों को बाहर खड़े होकर नहीं देखा, बल्कि उन्हें अपनी ज़िन्दगी में जिया। यही कारण है कि उनके यहाँ दर्द बनावटी नहीं लगता, बल्कि जीवन की धूप-छाँव से गुज़रकर शब्दों में ढला हुआ दिखाई देता है।
उत्तर प्रदेश के कंधला में जन्म लेने वाले अहसान दानिश की ज़िन्दगी का बड़ा हिस्सा अभावों और संघर्षों में बीता। औपचारिक शिक्षा अधिक न मिल सकी, मगर जीवन स्वयं उनका सबसे बड़ा मदरसा साबित हुआ। रोज़ी-रोटी की तलाश की, उन्होंने कठिन मज़दूरी की, खेतों में काम किया और उस तबक़े की ज़िन्दगी को बहुत क़रीब से देखा जिसके कंधों पर सभ्यता की पूरी इमारत खड़ी है, लेकिन जिसका नाम अक्सर इतिहास के पन्नों में दर्ज नहीं होता।
यही वजह है कि अहसान दानिश की शायरी में मज़दूर केवल एक पात्र नहीं, बल्कि एक जीवित और सांस लेता हुआ इंसान बनकर सामने आता है। वे उसके दुःख-दर्द, भूख, थकान, उम्मीद और स्वाभिमान को आवाज़ देते हैं। स्वयं को परिचित कराते हुए उनका यह शेर केवल एक शेर नहीं, बल्कि उनके समूचे अदबी व्यक्तित्व का घोषणापत्र है
"मुझको क्या तकता है मैं तो शायर मज़दूर हूँ
बन्दगी मेरे अशआर का मफ़हूम नहीं।"
यहाँ एक ऐसा शायर बोल रहा है जो किसी चौखट का मुहताज नहीं। जिसकी शायरी का उद्देश्य किसी की खुशामद नहीं, बल्कि इंसान और इंसानियत की बात करना है। यही ख़ुद्दारी अहसान दानिश को अपने दौर के अनेक शायरों से अलग करती है।
अहसान दानिश ने मज़दूर को दया का पात्र नहीं बनाया, बल्कि उसकी अज़मत को पहचान दिलाने की कोशिश की। वे जानते थे कि महलों की ऊँची दीवारें और आलीशान इमारतें उन्हीं हाथों की देन हैं जिन्हें समाज अक्सर हाशिये पर छोड़ देता है। उनकी नज़र में मेहनत सबसे बड़ा सम्मान है। इसी भावना को उन्होंने बड़े प्रभावशाली अंदाज़ में व्यक्त किया
"मेहनत से अगर मिल सकती इंसान को फ़राग़त दुनिया में
मज़दूर का परचम लहराता शाही के बुलन्द ऐवानों पर।"
यह शेर केवल सामाजिक विषमता की शिकायत नहीं करता, बल्कि उस विडम्बना की ओर संकेत करता है जिसमें निर्माण करने वाला व्यक्ति स्वयं सुविधाओं से वंचित रह जाता है।
अहसान दानिश की शायरी का एक और महत्वपूर्ण पक्ष उनकी सादगी और जीवन-दृष्टि है। उन्होंने कभी अपने लिए विशेष दर्जे की मांग नहीं की। वे किसी राजनीतिक मंच के नेता नहीं थे, बल्कि जीवन के मैदान में संघर्ष करने वाले एक साधारण इंसान थे। उनका यह शेर उनकी पूरी मानसिकता का प्रतिनिधित्व करता है
"मैं शायरे मज़दूर हूँ, लीडर तो नहीं हूँ
खाने मुझे दरकार है बासी हो के ताज़ा।"
यह सादगी दरअसल उनकी ताक़त थी। उन्होंने शायरी को जीवन से अलग नहीं किया। उनके शब्द वही कहते हैं जो उनका जीवन कहता है।
हालाँकि अहसान दानिश को "शायर-ए-मज़दूर" कहा जाता है, लेकिन उनकी शायरी का संसार केवल मज़दूरी और मुफ़लिसी तक सीमित नहीं है। वे जीवन, समाज, इंसान और अस्तित्व से जुड़े प्रश्नों पर भी गहरी नज़र रखते हैं। उनकी फ़िक्र की गहराई इस शेर में देखी जा सकती है
"कौन माशूक़ है क्या इश्क़ है सौदा क्या है
मैं तो इस फ़िक्र में गुम हूँ कि दुनिया क्या है।"
यह शेर बताता है कि दानिश केवल जज़्बाती शायर नहीं, बल्कि एक सोचने-विचारने वाले फ़िक्रमंद इंसान भी थे। वे दुनिया को उसकी बाहरी चमक से नहीं, बल्कि उसकी वास्तविकता से समझना चाहते थे।
दौलत और मुफ़लिसी के संबंध में भी उनका दृष्टिकोण संतुलित और गहरा है। वे लिखते हैं
"दौलत हो के अफ़लास हम अंजाम हैं दोनों
दोनों से उखड़ जाती हैं ईमान की बुनियादें।"
इस शेर में अहसान दानिश केवल आर्थिक स्थिति की बात नहीं करते, बल्कि इंसानी चरित्र और नैतिकता के संकट की ओर भी संकेत करते हैं। उनके लिए असली पूँजी इंसान का ईमान और उसका अख़लाक़ है।
यह धारणा कि अहसान दानिश केवल मज़दूरों के शायर थे, उनके कलाम को सीमित करके देखने जैसा होगा। उनकी ग़ज़लों में मोहब्बत, रूहानियत और जीवन की नाज़ुक अनुभूतियाँ भी पूरी शिद्दत के साथ मौजूद हैं। महबूब की एक झलक को वे इस तरह चित्रित करते हैं
"ये उड़ी-उड़ी-सी रंगत, ये खुले-खुले से गेसू
तेरी सुबह कह रही है तेरी रात का फ़साना।"
जबकि मोहब्बत की अनिश्चितता और उसके भीतर छिपे भय को वे यूँ व्यक्त करते हैं
"ना जाने मोहब्बत का अंजाम क्या है
मैं अब हर तसल्ली से घबराता हूँ।"
इन अशआर से स्पष्ट होता है कि अहसान दानिश की शायरी केवल सामाजिक दस्तावेज़ नहीं, बल्कि मानवीय संवेदनाओं का विस्तृत संसार भी है।
उनकी फ़ितरत में एक अजीब तरह की आज़ादी भी थी। वे बंधनों से दूर रहकर अपनी राह बनाने वाले इंसान थे। शायद इसी कारण उन्होंने कहा
"मैं दीवाना भला मुझको मेरे सहरा में पहुँचना दो
कि मैं पाबन्दे आबादे गुलिस्ताँ हो नहीं सकता।"
यह शेर उनके स्वतंत्र व्यक्तित्व और आत्मसम्मान का प्रतीक है। वे भीड़ में शामिल होने के बजाय अपनी राह स्वयं बनाने पर विश्वास करते थे।
अहसान दानिश को अपने फ़न की शक्ति पर पूरा यक़ीन था। वे जानते थे कि सच्चे अनुभव और ईमानदार अभिव्यक्ति से निकला हुआ कलाम वक़्त की गर्द में गुम नहीं होता। इसलिए उन्होंने पूरे विश्वास के साथ कहा
"'अहसान' गो मैं शायर मज़दूर हूँ लेकिन
पायिन्दा ओ ज़िन्दा असर रहेंगे।"
आज जब हम उनके कलाम को पढ़ते हैं तो यह शेर भविष्यवाणी की तरह सच प्रतीत होता है। उनका शरीर भले 21 मार्च 1982 को ख़ामोश हो गया हो, मगर उनके अशआर आज भी मेहनतकश इंसान की आवाज़ बनकर हमारे बीच मौजूद हैं।
उर्दू अदब में अहसान दानिश का महत्व केवल इस बात में नहीं है कि उन्होंने मज़दूरों पर लिखा, बल्कि इस बात में है कि उन्होंने अदब को ज़िन्दगी से जोड़ा। उन्होंने बताया कि शायरी केवल हुस्न और इश्क़ का बयान नहीं, बल्कि समाज के दबे कुचले लोगों की आवाज़ भी हो सकती है। उनके यहाँ दर्द है, मगर निराशा नहीं संघर्ष है, मगर पराजय नहीं, मुफ़लिसी है, मगर आत्मसम्मान से समझौता नहीं।
यही कारण है कि अहसान दानिश आज भी उर्दू अदब में एक ऐसे शायर के रूप में याद किए जाते हैं जिसने अपने पसीने को शेरों में ढाल दिया और अपनी ज़िन्दगी को साहित्य का हिस्सा बना दिया। उनकी शायरी हमें याद दिलाती है कि दुनिया की असली रौनक़ महलों में नहीं, बल्कि उन मेहनतकश हाथों में बसती है जो हर सुबह एक बेहतर कल की उम्मीद के साथ काम पर निकल पड़ते हैं। यही अहसान दानिश की शायरी का पैग़ाम है और यही उनकी सबसे बड़ी अदबी विरासत।