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श्राद्धपक्ष शुरू : जमीं पर उतरे दिवंगत, तर्पण से हो रहे तृप्त

हे दिवंगतों, स्वीकार करो... कुशा थामे हाथों में तिल-पुष्प, अंजुलि भर-भर कर जलार्पण, ताकि तृप्त हों आत्माएं

 

Rudra News Express Bikaner. 

बीकानेर का धरणीधर तालाब। घाट की सीढ़ियों पर मंत्रोच्चार करते पंडित नवरतन व्यास। कमर तक पानी में खड़े दर्जनों लोग। दोनों हाथों की अंजुलि में जल भर-भर कर पूर्वजों को अर्पित करते लोग। हाथों में कुशा, तिल और पुष्प और जुबां पर मंत्र। इसे ही तर्पण कहा जाता है। मान्यता है कि श्राद्धपक्ष में किया गया यह जलार्पण दिवंगत पूर्वजों तक पहुंचता है और उन्हें तृप्त करता है।

धरणीधर तालाब ही नहीं, बीकानेर शहर और आसपास के दूसरे तालाबों पर भी शनिवार से यही दृश्य नजर आया। कई स्थानों पर कुंड और स्विमिंग पूल में भी तर्पण की व्यवस्था की गई है। पंडित राजेन्द्र व्यास ‘ममू महाराज’ सूर्य मंदिर परिसर के विशेष कुंड में अपने शिष्यों के साथ तर्पण कर रहे हैं। वहीं सैकड़ों लोग कोलायत के कपिल सरोवर में तर्पण के लिए पहुंचे। कई लोग नदी और दूसरे प्रमुख तीर्थस्थलों की ओर भी रवाना हुए हैं। बिहार के बोधगया में भी बड़ी संख्या में लोग तर्पण और पिंडदान के लिए जुटे हैं।

15 दिन पितरों का स्मरण : 

दरअसल, शनिवार से श्राद्धपक्ष की शुरुआत हुई है। मान्यता है कि इन दिनों पूर्वजों का स्मरण, तर्पण और श्राद्ध करने से पितरों की तृप्ति होती है। इस दौरान अर्पित किए जाने वाले जल, तिल और भोग को पूर्वजों के निमित्त समर्पित किया जाता है। धार्मिक मान्यता के अनुसार पितरों की तृप्ति से परिवार में सुख, समृद्धि और शांति आती है। इसी मान्यता के चलते श्राद्धपक्ष में बड़ी संख्या में लोग अपने पूर्वजों के निमित्त तर्पण और श्राद्ध कर्म करते हैं।

किस दिवंगत का श्राद्ध किस दिन?

श्राद्धपक्ष में सभी दिनों पितरों को तर्पण किया जाता है, लेकिन जिस तिथि को किसी पूर्वज या दिवंगत व्यक्ति का निधन हुआ था, पितृपक्ष में उसी तिथि के दिन उसके निमित्त विशेष श्राद्ध किया जाता है। श्राद्ध कर्म में अंग्रेजी तारीख के बजाय मृत्यु की हिंदू चंद्र तिथि को आधार माना जाता है। अर्थात यदि किसी व्यक्ति का निधन पूर्णिमा तिथि को हुआ था तो श्राद्धपक्ष की पूर्णिमा तिथि पर उसके निमित्त विशेष श्राद्ध, पिंडदान या ‘कागबोल’ किया जाएगा। इसलिए पूर्वज की मृत्यु की केवल अंग्रेजी तारीख याद होना पर्याप्त नहीं है, बल्कि उसकी हिंदू तिथि का पता होना भी जरूरी है। जिन पितरों की मृत्यु की तिथि ज्ञात नहीं है या किसी कारण से निर्धारित तिथि पर श्राद्ध नहीं हो पाया, उनके लिए 10 अक्टूबर को होने वाली सर्वपितृ अमावस्या महत्वपूर्ण मानी जाती है। कागबोल की परंपरा में कौओं के माध्यम से पूर्वजों तक भोग पहुंचने की मान्यता है।

30 सितंबर को चतुर्थी-पंचमी का श्राद्ध एक ही दिन : 

श्राद्धपक्ष 26 सितंबर से शुरू होकर 10 अक्टूबर को सर्वपितृ अमावस्या तक चलेगा। बीकानेर सहित कई स्थानों पर इसके अगले दिन मातामह श्राद्ध यानी ‘नान श्राद्ध’ भी किया जाता है। इसमें दोहित अपने नाना के निमित्त श्राद्ध करता है। इस वर्ष श्राद्धपक्ष की तिथियों में विशेष स्थिति बनी है। 30 सितंबर को चतुर्थी और पंचमी दोनों तिथियों का श्राद्ध एक ही दिन किया जाएगा।