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13 दिन का ये अनशन हर राजस्थानी के लिए सोचने की बात, निष्ठुर सत्ता को संवेदनशील बनना चाहिए

निष्ठुर सत्ता को संवेदनशील बनना चाहिए
सत्ता का मौन राजस्थानियों की एकजुटता से ही टूटेगा
 

मधु आचार्य ' आशावादी '

RNE Special.


राजस्थान को एक सभ्य समाज का राज्य देश में माना जाता है और गिना जाता है। क्योंकि यहां के लोगों के पास साहित्य, संस्कृति और भाषा की एक गोयरवमयी विरासत है। जिसके कारण यहां के लोग गांधीवादी रास्ते को ही अपनी बात कहने के लिए चुनते हैं। वे कभी भी उग्र होने की बात भी नहीं करते। क्योंकि उनकी संस्कृति ने उनको यह संस्कार ही नहीं दिया है।

भाषा को 12 करोड़ लोग बोलते हैं। इतनी बड़ी संख्या में उन भाषाओं को लोग नहीं बोलते, जिनको संवैधानिक मान्यता मिली हुई है। उन भाषाओं को बोलने वालों ने उग्र आंदोलन के जरिये सरकार पर दबाव बनाया, तभी तो राजनीतिक कारणों से उनको बहुत पहले मान्यता मिल गयी। जिन भाषाओं को मान्यता मिल गयी उनका भी राजस्थानी विरोध नहीं करते, सम्मान करते हैं। वे तो शांत तरीके से अपनी राजस्थानी को संवैधानिक मान्यता देने व दूसरी राजभाषा बनाने की मांग कर रहे हैं।

राजस्थानी साहित्यकारों, संस्कृतिप्रेमियों व भाषा प्रेमियों को तो कई बार लगता है कि उनकी शांति और गांधीवादी तरीके को उनकी कमजोरी मान लिया गया है। यह बात सत्य नहीं है। राजस्थानी लोग तो रेगिस्तान को भी अपनी जिजीविषा से नखलिस्तान बनाने वाले लोग हैं। यहां के रणबांकुरे पूरे देश में अलग पहचान रखते हैं। हर राजस्थानी के खून में संघर्ष घुला हुआ है। यह बात शायद नेताओं और सत्ताओं को याद नहीं है। याद दिलाने के अलावा अब कोई विकल्प भी नहीं बचा।

खूब ठग लिया सत्ताओं ने राजस्थानियों को:

सात दशक में राजस्थानियों को सत्ताओं ने खूब ठग लिया। हर बार मान्यता और दूसरी राजभाषा की लॉलीपॉप पकड़ाते है, चुनाव के बाद उसे राजस्थानियों के हाथों से वापस छीन लेते हैं। राजस्थानी लोग फिर ठगे से रह जाते हैं। यह एक बार नहीं अनेक बार हो चुका है, इस पर अब हर राजस्थानी को सोचना चाहिए। कब तक नेता उनको इस तरह ठगते रहेंगे। वे कब अपना तीसरा नेत्र खोलेंगे। वे कब अपने खून में शामिल संघर्ष को जीवित करेंगे। अब यदि यह सब नहीं सोचा तो कुछ भी हाथ नहीं आना है। पूर्व की पीढ़ियां और आने वाली पीढ़ियां हमें कभी माफ नहीं करेगी। हम पर तोहमत लगायेगी।

शुभम रैवोड़ को सेल्यूट:

राजस्थान विश्वविद्यालय, जयपुर में एक बार फिर पूरी ताकत से छात्र नेता शुभम रैवोड़ ने राजस्थानी भाषा को दूसरी राजभाषा बनाने के लिए आंदोलन शुरू किया है। सेल्यूट है इस छात्र नेता को। क्योंकि हर राजस्थानी अपनी भाषा की मान्यता की लड़ाई इस कारण लड़ रहा है कि उसके युवा का भविष्य सुरक्षित हो। क्योंकि मान्यता की बात मूलतः तो रोजगार से जुड़ी हुई है।

यह मांग साहित्यकारों की नहीं मानी जानी चाहिए। उनकी तो पुस्तकें छप चुकी, पुरस्कार भी मिल चुके। प्रतिष्ठा भी वे प्राप्त कर चुके। वे तो ये लड़ाई अपनी अस्मिता और युवाओं के रोजगार के लिए लड़ रहे हैं। यदि राजस्थानी को मान्यता मिलती है तो राजस्थान रोजगार के लिए अन्य प्रदेशों के छात्रों के लिए चारागाह नहीं बन सकेगा। चपरासी से लेकर प्रशासनिक अधिकारी तक की भर्ती में फिर राजस्थानी ही दिखेंगे। क्योंकि हर प्रश्न पत्र में 20 प्रतिशत अंक उनकी मायड़ भाषा के होंगे, जिनके जवाब केवल राजस्थानी छात्र ही दे सकेंगे। अन्य प्रदेशों के छात्र नहीं दे सकेंगे।
 

छात्र नेता शुभम रैवोड़ ने यहां के बेरोजगार युवाओं के , छात्रों के दर्द को समझा है और आमरण अनशन का यह बड़ा कदम उठाया है। कल उनके अनशन को 13 दिन हो गए। सेल्यूट है इस छात्र नेता को। 

असंवेदनशीलता की हद है:

मगर अफसोस की बात है, सरकार ने उनके इस आंदोलन की तरफ सकारात्मक भाव से ध्यान ही नहीं दिया। इसे असंवेदनशीलता ही कहा जा सकता है। वो भी उस समय में जब माननीय न्यायालय ने भी प्राथमिक शिक्षा राजस्थानी में देने के लिए कहा है। विपक्ष के कुछ नेता जरूर शुभम के आंदोलन को बल देने आए, मगर अधिकतर नेता चुप है। वे नेता भी चुप है जो चुनाव के समय राजस्थानी में वोट मांगते हैं और राजस्थानी भाषा की मान्यता की बात करते हैं। 13 दिन हो गए, अब तो हर राजस्थानी को सोचना चाहिए।

अब एकजुटता की बड़ी जरूरत:

अब वक्त आ गया कि अपनी भाषा, अपनी अस्मिता, अपनी संस्कृति के लिए राजस्थानियों को एकजुट होकर अपनी बात रखनी चाहिए। तभी शुभम का त्याग सफल होगा। सभी राजस्थानियो को सोचकर अपनी भाषा के लिए संवेदनशील होने का समय है। अभी नहीं, तो कभी नहीं।