जो साहित्यकार वीसी के बोलने के बाद भी बैठे रहे, उनको क्या मानें, बात बात में बयान, प्रदर्शन करने वाले लेखकों की चुप्पी चिंताजनक
मधु आचार्य ' आशावादी '
RNE Special.
कथाकार मनोज रूपड़ा के प्रकरण से अब साहित्य जगत व साहित्य पाठक वर्ग अपरिचित नहीं है। कई दिनों से मीडिया व सोशल मीडिया पर यह प्रकरण सुर्खियां पाये हुए है। प्रतिबद्ध रचनाकारों को उम्मीद थी कि अवार्ड वापसी जैसे प्रकरणों की तरह इस मुद्दे को भी वे उठाएंगे। अपने वजूद को बताएंगे। ये भी साबित करेंगे कि वे बदले नहीं, प्रतिकार को अपनाए हुए है।
पिछले दिनों साहित्य अकादेमी, नई दिल्ली के प्रकरण को लेकर भी रचनाकारों के एक समूह ने हल्ला किया। तथ्यों पर न भी जाएं तो ये तो कहना ही पड़ेगा कि एक माहौल बनाया गया। उसके कारण अकादमी की कार्यप्रणाली पर बड़ा असर पड़ गया। शायद इस बारे में उन्होंने सोचा नहीं।
जिस मुद्दे पर वे बोले, उस पर कुछ भी कहना नहीं है मगर उसके बाद अकादेमी में जो हुआ नीतिगत रूप से, उस पर चुप्पी तो कई गहरे सवाल खड़े करती है। ऐसा भी नहीं है कि जो हुआ है और जो होने की आशंका है, उससे प्रतिकार करने वाले रचनाकार अपरिचित हों।
रूपड़ा प्रकरण की बात:
फिलहाल हमारी बात मनोज रूपड़ा प्रकरण तक ही सीमित है। एक प्रभावी कथाकार के रूप में हर रचनाकार व पाठक उनको जानता है। हिंदी कथा साहित्य में प्रयोगवादी इस रचनाकार ने बड़ा काम किया है। हिंदी कहानी की शैली में भी एक बदलाव किया है।
कथानक व ट्रीटमेंट के लेवल पर रूपड़ा के लेखन को सभी पसंद करते है। युवाकाल से उन्होंने एक समर्थ कथाकार होने का आभाष करा दिया था। उनकी कहानियों में संवेदना धड़कती है और मानव मूल्यों की प्रतिस्थापना होती है। कुल मिलाकर इस दौर के वे प्रभावी कथाकार है।
क्या गलत किया रूपड़ा ने:
इस समूचे प्रकरण में मनोज रूपड़ा ने कुछ भी गलत नहीं किया। जब वीसी ने पूछा तो उनके सवाल के जवाब में उन्होंने कहा कि आप विषय पर बोलिये। ये कहना तो एक रचनाकार का धर्म है। उन्होंने अपने धर्म की पालना की। उसे अनुचित नहीं कहा जा सकता।
यदि मंच से वीसी के स्थान पर कोई लेखक बोल रहा होता तो उसे ये सहज अभिव्यक्ति लगती। क्योंकि वो भी कभी इस दौर से गुजरा हुआ ही होता है। वीसी से तो उस तरह की उम्मीद नहीं की जाती। उन्होंने जो व्यवहार किया, उससे ही यह प्रकरण खड़ा हुआ है।
अब एक मौन का अवलंबन क्यों?
मनोज रूपड़ा को जब कहा गया तो बाकी रचनाकार बैठे क्यों रहे। बाद में प्रकरण जब सार्वजनिक हुआ तो लेखकों के लम्बरदार, लेखक संगठनों के मुखिया कड़ा प्रतिकार क्यों नहीं कर रहे। सरकार को वीसी के बारे में क्यों नहीं बता रहे।
होना तो ये चाहिए कि पूरे देश मे, हर राज्य - जिले - तहसील - गांव से , वहां जो रचनाकार है, उनके द्वारा मनोज रूपड़ा के समर्थन में आवाज उठनी चाहिए। तभी समाज भी साहित्यकारों से जुड़ेगा। समाज तो इन दिनों साहित्य, पुस्तकों से ही कटा हुआ है। इस प्रकरण को साधन बना समाज को वापस साहित्य, पुस्तकों से जोड़ा जा सकता है। ये दूरदर्शी लेखक क्यों नहीं सोच रहे।
अध्यक्ष का निर्णय बेमिसाल:
साहित्य अकादेमी, नई दिल्ली के आयोजन में मनोज रूपड़ा के साथ ये हुआ। विवि को आयोजन अकादेमी ने ही दिया था। ये अलग बात है और पता भी करना चाहिए कि इस आयोजन के लिए अकादेमी के हिंदी परामर्श मंडल ने पहले स्वीकृति दी थी या नहीं। कार्यक्रमो के निर्धारण के बाद यदि ये कार्यक्रम तय हुआ है या नहीं, ये भी पता चलना चाहिए।
बहरहाल, अकादेमी अध्यक्ष माधव कौशिक का इस मामले में जो स्टैंड सामने आया, वो बड़ी राहत देने वाला है। उन्होंने अपने बयान में लेखक के साथ हुए व्यवहार को अनुचित ठहराया और भविष्य में उस विवि को अकादेमी के कार्यक्रम न देने की बात कही। अध्यक्ष सीधे तौर पर साहित्य व लेखकों के साथ खड़े दिखे। अब भी समय है, देश के रचनाकार इस प्रकरण पर ठोस निर्णय कर प्रतिकार के स्वर बुलंद करें, ताकि लेखक की प्रतिष्ठा को फिर कभी कोई ठेस पहुंचाने की कोशिश न करे।