Anil Kalla Bikaner Mayor : 50 वोटों के साथ अनिल कल्ला बीकानेर में कांग्रेस के मेयर, BJP के सुरेन्द्रसिंह को मिले 30 वोट
Bikaner : 42 पार्षदों वाली कांग्रेस को मेयर चुनाव में मिले 50 वोट, क्या BJP की ओर से हुआ क्रॉस वोट या बीजेपी खेमे में मौजूद सभी निर्दलीय ने दिया कांग्रेस को वोट
पंचायती : धीरेन्द्र आचार्य
Rudra News Express Bikaner.
बीकानेर के नगर निगम चुनाव मंे आखिरी वोट पोलिंग तक बढ़ी धड़कनों के बाद अब मेयर का नतीजा आ गया है। कांग्रेस के अनिल कल्ला बीकानेर शहर के नए महापौर चुने गए हैं। यहां बड़ी बात यह है कि कांग्रेस अपने 42 पार्षदों के बहुमत को बचाने में न केवल सफल रही वरन उसने कुल इतने वोट लेकर चौंकाया।
चौंकना इसलिए कहा जा सकता है क्योंकि पूर्ण बहुमत होने के बावजूद बीकानेर में कांग्रेस के लिये बोर्ड बनाना आसान नहीं रह गया था। पहले उसके बागी नवरतन डागा मैदान में आ गए। फिर प्रदेशाध्यक्ष गोविंदसिंह डोटासरा से डागा मैदान से हटे। भाजपा ने सुरेन्द्रसिंह शेखावत को प्रत्याशी बनाया और प्रत्याशी बनते ही शेखावत ने दावा किया ‘बोर्ड हम बनाएंगे।’ यह सिर्फ राजनीतिक दावा होता तब तक बात ठीक थी। कुछ ही समय मंे हड़कंप मच गया और मैदान से निर्दलीय गायब हो गए। इनकी तस्वीर शेखावत ने जारी की। इसके साथ ही दावा हुआ, कांग्रेस खेमे से भी ‘अंतरात्मा की आवाज’ पर वोट आएंगे।
इतना ही नहीं पुलिस, बीडीए के नोटिस का दौर शुरू हुआ और कांग्रेस पार्षदों की एकतरह से ‘सरकारी घेरेबंदी’ भी शुरू हो गई। मकसूद अहमद, मनोज बिश्नोई, नवरतन डागा को नोटिस दिए। थाने में हाजिर होने का निर्देश। साफ लगता था कि वोटिंग से रोकने की कवायद है।
मकसूद ने दिखाई कोर्ट की राह, पुलिस बैकफुट पर आई:
इस बीच बीती देर रात बीकानेर चुनाव मंे कोर्ट की एंट्री हो गई। कांग्रेस पार्षद और पूर्व मेयर मकसूद अहमद ने कोर्ट का दरवाजा खटखटाया। देर रात कोर्ट खुला। मकसूद अहमद की सुनवाई हुई और गिरफ्तारी पर रोक का आदेश दिया। ऐसे मंे सुबह वोटिंग से पहले पुलिस की ओर से धरपकड़ करने की आशंका खत्म हो गई। यहीं से कांग्रेस में फिर से आत्मविश्वास लौटा। पुलिस यानी सरकारी हस्तक्षेप बैकफुट पर आया।
बी डी कल्ला फ्रंट पर, बिखरी कांग्रेस को संभाला :
यहां बड़ी बात यह है कि पूर्व मंत्री एवं कांग्रेस के दिग्गज नेता बीकानेर नगर निगम चुनव मंे टिकट वितरण से लेकर मेयर के चुनाव तक पूरी तरह डटे हुए दिखाई दिए। शहर कांग्रेस अध्यक्ष मदनगोपाल मेघवाल, देहात अध्यक्ष बिशनाराम सियाग का भी साथ रहा। एकबारगी अवसर ऐसा भी आया जब कांग्रेस को अपने पार्षद बचाने के लिए कलेक्टर के यहां जाकर गुहार लगानी पड़ी। इस चुनावी जंग का मुआयना करें तो साफ लगता है कि चुनाव शुरू होते ही कांग्रेस पूरी तरह पिछड़ी हुई लग रही थी। एक वार्ड मंे उसे निर्विरोध हार मिली और भाजपा को जीत। टिकट वितरण के साथ ही पार्टी में जमकर फजीहत हुई और पार्टी के अध्यक्ष मदनगोपाल मेघवाल को पार्टी के ही कार्यकर्ताओं ने मिलकर सरेआम पीट डाला। कपड़े फाड़े। पार्टी को अपने ही कार्यकर्ताओं के खिलाफ धरना देने के लिए बैठना पड़ा।
प्रतिष्ठा दांव पर लगाकर राजस्थान में पहला मेयर लाए कल्ला :
ऐसे मंे कल्ला ने इस बिखरी स्थिति में बाजी को हाथ में लिया और पूरे शहर में घूमकर माहौल बनाया। खासतौर पर अपने विधानसभा क्षेत्र बीकानेर पश्चिम में उन्हांेने बाजी पलट डाली। अपने भतीजे अनिल कल्ला को ऐसे वार्ड से मैदान मंे उतारा जो भाजपा की जीत का पुख्ता वार्ड माना जाता था। उस वार्ड में खुद की प्रतिष्ठा दांव पर लगाई जिसे सेफ मानते हुए भाजपा के कथित मेयर प्रत्याशी दीपक पारीक ने पर्चा दाखिल किया था। इस वार्ड में तो जीत हासिल की ही इसका असर कई वार्डों पर हुआ। बीकानेर पश्चिम मंे भाजपा के कई धुरंधर हार गए।
सुरेन्द्रसिंह ने बदल दी चुनावी फिजा :
दूसरी ओर भाजपा के मेयर प्रत्याशी सुरेन्द्रसिंह शेखावत को भले ही मात्र 30 वोट मिले लेकिन उन्होंने चुनाव को रोचक के साथ रोमांचक भी बनाए रखा। भाजपा के पास अपने सिंबल पर जीते 27 पार्षद हैं। निर्दलीय पार्षदों के समर्थन का पहले से दावा किया गया था। उनके फोटो भी शेयर किये। यह कहना अतिश्योक्ति नहीं होगी कि कम ताकत के बावजूद सुरेन्द्रसिंह ने कांग्रेस को मनोवैज्ञानिक दबाव में ले लिया। जिस तरह राजस्थान में पार्षदों की धरपकड़ चल रही थी उसे देखते हुए लगने लगा कि अब भाजपा का बोर्ड भी बन सकता है। इस अनुमान को तब बल मिला जब एक-एक कर कांग्रेस पार्षदों को पुलिस के नोटिस मिलने लगे और वोटिंग से ठीक पहले थाने पहुंचने का आदेश दिया। बीडीए के नोटिस भी चर्चा में रहे। इसके साथ ही मिठाई की उन फैक्ट्रियो पर भी छापे पड़े जिन उद्यमियों ने खुलकर कांग्रेस प्रत्याशियों का समर्थन किया। दावा किया गया कि कांग्रेस खेमे में फूट है। अपील हई ‘अंतरात्मा की आवाज’ पर वोट देने की। चर्चा रही कि ‘अंतरात्मा के साथ छिपी हुई आवाज’ भी दी जा रही थी।
अकेले सुरेन्द्र ने कांग्रेस खेमे में मचा दिया हड़कंप :
हालात यह हुए कि दिग्गज कांग्रेस नेता के हाथ में कमान होते हुए भी एकबारगी उस खेमे में हड़कंप मच गया। जिन निर्दलीयों को कांग्रेस की तरफ से ‘जवाब’ मिल चुका था उनकी वापस पूछताछ होने लगी लेकिन तब तक वे हाथ से निकले हुए लगने लगे थे। यहां यह कहने मंे भी गुरेज नहीं होना चाहिए कि भाजपा खेमा भी पूरी तरह सुरेन्द्रसिंह शेखावत के साथ नहीं था।
माना जा रहा है कि यदि पार्टी बहुमत के नजदीक होती तो सुरेन्द्रसिंह के लिए मेयर का प्रत्याशी बनना इतना आसान नहीं था। ऐेसे में डूबती नैया सौंपने के बाद भी ज्यादातर नेताओं ने चुनाव से किनारा कर लिया। कुछ दिखावटी चेहरों के साथ सुरेन्द्रसिंह अपने गिने-चुने समर्थक, मित्रों को साथ लिए चुनाव में डटे रहे। कांग्रेस को इतन मनोवैज्ञानिक दबाव में ला दिया कि लगने लगा कि नतीजा कुछ भी हो सकता है।
राजनीतिक भविष्य की मजबूत नींव :
हालांकि यह गलत कहते हैं कि ‘जंग और मोहब्बत में सब जायज है’ लेकिन इस गलत को चुनावी राजनीति में पूरी तरह स्वीकार कर लिया गया है। माना जाता है कि चुनाव में वोट के लिए ‘सबकुछ सही’ है। ऐसे में वैचारिक प्रतिबद्धता की छवि वाले सुरेन्द्रसिंह भी यह खेल पूरी ताकत से खेलते नजर आए। इसी ताकत के बूते उन्होंने खुद को साबित भी किया है। यह साबित होना उनके बड़े राजनीतिक भविष्य की नींव भी माना जा सकता है।