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अध्यक्ष बनने के 3 महीनें में भी कार्यकारिणी नहीं, एक अध्यक्ष कैसे चलायेगा संगठन, ये विचार ही नहीं

पंचायत व निकाय चुनाव पर पड़ेगा प्रतिकूल असर
गुटबाजी को ही मिलेगा प्रश्रय
 

मधु आचार्य ' आशावादी '

RNE Special.
 

कांग्रेस ने अपने संगठन को चुस्त दुरुस्त करने के लिए संगठन सृजन अभियान चलाया। अन्य राज्यों की तर्ज पर राजस्थान में भी 50 जिलाध्यक्ष बनाये गए। इस बार जिला अध्यक्ष बनाने की प्रक्रिया पूरी तरह से एआईसीसी से संचालित हुई। बाहरी राज्यों से राज्य के जिलों में पर्यवेक्षक लगाए गए। राज्य के नेताओं को इससे दूर रखा गया।
दूसरे राज्यों से आये इन ऑब्जर्वर ने अपने अपने आवंटित जिले में 10 से 15 दिन का प्रवास किया। कार्यकर्ताओं से मिले, दावेदारों से मिले और वरिष्ठ नेताओं से चर्चा की। फिर जितने दावेदार सामने आये उन पर तटस्थ लोगों की राय ली। जिनमें बुद्धिजीवी, पत्रकार, आम आदमी शामिल थे।

पूरी प्रक्रिया के बाद इन लोगों ने कहीं 2 तो कहीं 3 नाम का पैनल राष्ट्रीय संगठन महामंत्री के सी वेणुगोपाल को दिया। उनके साथ वेणुगोपाल ने उनके साथ बैठक की। फिर एक या दो नाम का पैनल नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी को प्रस्तुत हुआ। राहुल की टीम के पुष्ट होने के बाद जिला अध्यक्ष तय हुए। जिनके साथ राहुल ने बैठक की और बताया कि अब पार्टी में जिला अध्यक्ष मजबूत कड़ी होंगे। टिकट निर्धारण में भी उनकी भूमिका रहेगी और वे सीधे एआईसीसीसी के संपर्क में रहेंगे।

मेघवाल व सियाग को मौका:

एआईसीसीसी ने बीकानेर शहर के अध्यक्ष के लिए लोकसभा का चुनाव लड़ चुके मदन मेघवाल को चुना। वहीं एक कार्यकाल सफल रहने वाले बिसनाराम सियाग को देहात अध्यक्ष फिर से बनाया गया।

दोनों के पास अपना अपना संगठन का अनुभव था और उस आधार पर उन्होंने काम भी शुरू कर दिया। आलाकमान व प्रदेश से आये कार्यक्रमों को भी पूरा करने लगे। 
पहली बार देहात व शहर कांग्रेस में इस तरह का सुगठित तालमेल दिखाई दिया, जो कांग्रेस के लिए अच्छा संकेत था। अब इन दोनों के पास अपनी अपनी कार्यकारिणी बनाने का काम था। जिसके लिए भी उन्होंने कवायद आरम्भ कर दी।

कार्यकारिणी के लिए भी निर्देश:

इस बार मेघवाल व सियाग को भी राज्य के अन्य जिलाध्यक्षों की तरह कार्यकारणी गठित करने के लिए विशेष निर्देश मिले। 
1.. कार्यकारिणी छोटी होगी। अनावश्यक बड़ी नहीं, पहले की तरह। शहर कांग्रेस के लिए 31 व देहात के लिए 51 की संख्या तय की गई।
2.. ओबीसी, अजा, जजा, अल्पसंख्यक, महिला , युवाओं को वाजिब प्रतिनिधित्व।
3.. सक्रिय कार्यकर्ताओं को ही पद दिया जाये।
4.. भाजपा के प्रति जो सॉफ्ट है, उनको पद न दिए जाएं।
5.. सिफारिश आधार न हो, काम व प्रतिबद्धता आधार हो।

इन मोटे सिद्धांतो पर मदन मेघवाल व बिसनाराम सियाग ने अपनी तरफ से पदाधिकारियों की लिस्ट पीसीसी चीफ गोविंद डोटासरा को सौंप दी।

3 महीनें में भी कार्यकारिणी नहीं:

संगठन का इतना काम नये तरीके से स्मूथली पूरा हो गया। मगर लगभग 3 महीनें में भी कार्यकारिणी की घोषणा नहीं हो सकी है। ये कमजोरी ही मानी जायेगी। इस तर्क में कोई दम नहीं कि पंचायत व निकाय चुनावों के बाद कार्यकारिणी घोषित होगी। क्योंकि पार्टी संगठन का काम भाजपा सरकार के निर्णयो पर आधारित थोड़े ही होता है। 
यह अपने आपने चिंतनीय बात है कि एक अकेला अध्यक्ष कैसे पार्टी का संगठन चलाएगा। इससे तो सार्वजनिक रूप से कमजोर प्रदर्शन रहेगा विपक्ष का। यदि अध्यक्ष के साथ टीम होगी तो वो भी पूरी ताकत लगाएगी और बेहतर प्रदर्शन होगा।

चुनावों पर प्रतिकूल प्रभाव:

शहर और देहात कार्यकारिणी देरी से घोषित होगी तो उसका निकाय व पंचायत चुनावों पर प्रतिकूल असर पड़ेगा। काम करने वाले लोग कम होंगे और गुटों में बंटे रहेंगे। इससे इन चुनावों में गुटबाजी हावी होगी। सरकार निकाय व पंचायत चुनाव टाल रही है, उस सूरत में कांग्रेस को अपनी जिला कार्यकारिणी घोषित कर चुनावी तैयारी में पूरी टीम को झोंकना चाहिए, मगर इस पर कोई निर्णय सामने नहीं आया है।