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नगर निगम चुनाव भले ही दूसरे चरण में अगले महीनें है, मगर दावे जारी, खुद ही खुद को कर रहे उम्मीदवार घोषित

पार्टियां असहाय, किसे रोके - किसे टोके ?
 
 

मधु आचार्य ' आशावादी '

RNE Special.
 

स्थानीय सरकार के चुनाव का बिगुल बज गया है और लोगों ने इसमें जोर आजमाईश के लिए पूरी तरह से कमर भी कस ली है। हालांकि चुनाव अगले महीनें में है, उसका पूरा शिड्यूल जारी हो गया। वार्डों का आरक्षण हो गया। दावेदारों ने अपने लिए वार्ड चुन लिया। पार्टी ने भले ही उनको टिकट के लिए न चुना हो, उन्होंने अपने को टिकट के लिए चुन जोर शोर से प्रचार भी आरम्भ कर दिया है, ताबड़तोड़।

कहते हैं, राजनीति का ककहरा पार्षद के चुनाव से ही आरम्भ होता है। यही पहला पायदान है, जिस पर चढ़े बिना अनमोल, सपनों की राजकुमारी, प्यारी प्यारी राजनीति का वरण किया ही नहीं जा सकता। इस वजह से स्थानीय सरकार में हिस्सेदारी करने वालों की तादात भी बहुत बड़ी है। अब राजनीति लुभाती तो है ही। जो अब तक कार्यकर्ता की भूमिका निभा रहे थे, उनको यह चुनाव नेता का किरदार निभाने का अवसर देता है, दे रहा है।
 

स्थानीय निकाय चुनाव की चर्चा बीकानेर पश्चिम क्षेत्र में अधिक है, बीकानेर पूर्व में बंद कमरों में भले ही चर्चा हो, पश्चिम की तरह सार्वजनिक चर्चा तो बिल्कुल नहीं है। पश्चिम के हर गली, हर मोहल्ले, हर चौक, हर चौकी, हर पाटे पर अभी तो पार्षद व मेयर के चुनाव कक बात हो रही है। मेयर का पद अनारक्षित हो जाने के कारण चर्चा कुछ ज्यादा ही हो रही है इस बार।

सटोरियों ने भी बिजनेस खोल दिया:

वैसे तो सट्टा किसी भी बात पर करने में माहिर होते हैं सटोरिये। बीकानेर के सटोरिये बरसात से ज्यादा और क्रिकेट से थोड़ा कम चुनाव पर ही सट्टा करते हैं। निकाय  चुनाव की तारीख का ऐलान होते ही इन सटोरियों ने भी अपनी सट्टे की दुकान के शटर ऊंचे कर लिए है। अभी तो मेयर को लेकर ही आरम्भिक सौदा होना शुरू हुआ है। असली रंगत उम्मीदवार सामने आने के बाद जमेगी। सटोरियों की पोबारा तो उसी समय होगी।

जय हो ' एआई '  माता या पिता की:

पहले जब कोई अपने को खुद उम्मीदवार घोषित करता तो उसे कम्प्यूटर के तकनीकी व्यक्ति के पास अपना पोस्टर सोशल मीडिया पर डालने के लिए पैसे देकर बनवाना पड़ता था। अब तो काम ज्यादा आसान हो गया। जय हो माता है या पिता पता नहीं पर जो भी है महान है, वो है ' एआई ' । अपना फोटो डालो, कुछ शब्द लिखो, एआई पोस्टर बनाकर बिना पैसे दे देता है। बस, उसे चस्पा कर दो फेसबुक पर, इंस्टाग्राम पर और प्रसाद की तरह वाट्सएप पर भी खुले हाथ बांट दो। थोड़ी देर में ही लोगों के फोन, समर्थक तैयार, चर्चा शुरू। इनके लिए ही तो पोस्टर चस्पा किया था, चुनाव लड़ना है या नहीं, यह तो बाद में देखेंगे। पार्टी उम्मीदवार घोषित न करे तब तक तो रोज नया पोस्टर लगाकर चर्चा में तो रहें।

स्वंयम्भू उम्मीदवार बन रहे हैं:

एक एक वार्ड में एक पार्टी से 20 - 20 लोग अपने को पार्टी उम्मीदवार घोषित कर चुके हैं। आश्चर्य है, खुद को अपने वार्ड का उम्मीदवार बता पार्टी का चुनाव चिन्ह भी अपने पोस्टर पर लगा रहे हैं। दोनों पार्टियों में यही स्थिति है। इनको कोई टोक भी नहीं रहा। अपने को स्वंयम्भू उम्मीदवार भी घोषित कर लिया, प्रचार शुरू कर दिया, वार्ड में घूमना शुरू कर दिया। लोगों को चाय - नाश्ता कराना आरम्भ कर दिया।

 

देखा जाए तो पार्टी के सिंबल के साथ खुद को उम्मीदवार बता पोस्टर जारी करना अनुशासनहीनता है, मगर कार्यवाई कौन करे। कौन रोके। किसकी हिम्मत है। भाजपा के एक पदाधिकारी ने माना कि नीतिगत रूप से यह अनुशासनहीनता है, मगर पार्टी कैसे रोके। उसे विरोध हो जाने, नाराज हो जाने का डर है। कमोबेश यही प्रतिक्रिया एक कांग्रेसी नेता ने भी दी। इतना असहाय तो पार्टियां कभी नहीं दिखी।

कमाल है, पार्षद का मादा नहीं, मेयर की कर रहे दावेदारी:

इस बार के स्थानीय निकाय चुनाव में मेयर का पद अनारक्षित है तो कईयों की दबी ईच्छाएं जाग गयी है। कुछ तो अपने को मेयर उम्मीदवार समझ ही बैठे हैं। दोनों पार्टियों में कुछ ऐसे लोगों ने स्वंयम्भू बनकर मेयर के लिए दावा किया है जिनको अपने वार्ड में 100 वोट भी मुश्किल से मिलने की स्थिति है। पार्टी उनको बेकार समझती है, मगर वे खुद को मेयर योग्य समझ रहे हैं।

 

अभी तो निकाय चुनाव की शुरुआत हुई है। आगे आगे देखेंगे कि इससे भी अधिक रोचक तस्वीरें सामने आयेगी।