भाजपा की लगातार जीत को थामने की कोशिश, गौरव गोगोई को पहले ही चेहरा बना दिया गया है
आक्रामक अंदाज में प्रियंका लड़ेगी यह चुनाव
मधु आचार्य ' आशावादी '
RNE Special.
इस साल जिन 4 राज्यों व 1 केंद्रशासित प्रदेश में विधानसभा के चुनाव होने है, उनमें असम भी शामिल है। पूर्वोत्तर का यह राज्य लंबे अर्से तक कांग्रेस के साथ रहा था। गोगोई परिवार के पास यहां कांग्रेस की कमान रही है। इस परिवार की पूरे असम में एक अलग छवि है।
गोगोई परिवार की छांव में ही असम की वर्तमान भाजपा सरकार के मुख्यमंत्री हेमंत बिस्वा ने अपनी राजनीतिक पारी शुरू की थी। वे गोगोई के बाद असम में कांग्रेस के दूसरे सबसे कद्दावर नेता थे। कांग्रेस का भी उन पर बहुत भरोसा था। तभी तो जब भाजपा इस राज्य में चुनावी छांव में सक्रिय हुई तो उसके निशाने पर हेमंत बिस्वा ही थे। उनके खिलाफ भाजपा ने भ्रष्टाचार का एक परिपत्र भी जारी किया और गंभीर आरोप लगाये।
बाद में, राजनीतिक समीकरण बदले। हेमंत बिस्वा ने कांग्रेस छोड़ दी और भाजपा के साथ हो लिए। फिर क्या था, उन पर लगे सब भ्रष्टाचार के आरोप हवा हो गए और वे भाजपा के मुख्य नेता बन गए। कांग्रेस को उन्होंने कमजोर भी किया, नेता व कार्यकर्ता तोड़कर। अब वे असम में भाजपा सरकार के मुखिया है। वे खुद को अब कट्टर हिंदूवादी नेता के रूप में तब्दील कर चुके है।
गोगोई परिवार की दूसरी पीढ़ी:
अब तरुण गोगोई तो रहे नहीं, उनका निधन हो गया। उनकी विरासत को उनके पुत्र गौरव गोगोई ने संभाला है। भाजपा की आंधी के बीच वे लोकसभा का चुनाव जीते। राहुल गांधी ने उन्हें लोकसभा में उप नेता प्रतिपक्ष बनाया। वे असम में पॉपुलर है और युवा है। इस कारण ही इस बार विधानसभा चुनाव में कांग्रेस ने उन पर दाव लगाया है।
कांग्रेस ने उनको असम में कांग्रेस का कार्यकारी अध्यक्ष बनाकर एक तरह से सीएम फेस भी घोषित कर दिया है। नई भूमिका मिलते ही गौरव प्रदेश में सक्रिय हो गये। उनको पारिवारिक पृष्ठभूमि का भी विशेष लाभ मिल रहा है। गौरव गोगोई अब पूरी तरह से असम में आक्रामक भूमिका में आ गए है।
वोटों का बंटवारा रोकना होगा:
असम में मुस्लिम मतदाताओं की संख्या ज्यादा है, उसे ही पीछे छोड़ने के लिए हेमंत बिस्वा ने कट्टर हिंदूवादी छवि अपनायी और उसी तरह के निर्णय अपनी सरकार की तरफ से लिये।
क्षेत्रीय मुस्लिम दल भी यहां चुनाव लड़ते है, जिस कारण ही कांग्रेस कमजोर होती है और भाजपा को उसका फायदा मिलता है। ठीक इसी तरह वहां के स्टूडेंट्स ने असम गण परिषद बनाई, सत्ता में आये, अब उनका प्रभाव कम हो गया है। उसका फायदा भाजपा को हुआ है।
कांग्रेस इस बार वोट बंटवारे को रोकने के ध्येय से मैदान में उतरी है। राहुल गांधी ने अपनी भारत जोड़ो यात्रा के दौरान भी इसके लिए प्रयास किया था। गौरव गोगोई भी यही प्रयास कर रहे है। वोटों का बंटवारा रोकने में यदि कांग्रेस कामयाब हुई तो फायदे में रहेगी।
अब प्रियंका को कमान:
कांग्रेस इस बार असम में विधानसभा चुनाव को लेकर काफी गंभीर है, इस कारण ही यहां चुनाव की कमान प्रियंका गांधी को कमान दी गई है। प्रियंका ने अपनी लोकसभा की परफॉर्मेंस से पूरे देश का ध्यान अपनी तरफ खींचा है। वे भाजपा पर तथ्यों के साथ आक्रामक रहती है। उससे लगता है कि वे असम में चुनाव भी आक्रामक अंदाज में लड़ेंगी। उनके सहयोग के लिए भी कांग्रेस ने ऐसे नेताओं को लगाया है जो कांग्रेस के संकटमोचक माने जाते है। छत्तीसगढ़ के पूर्व मुख्यमंत्री भूपेश बघेल को मुख्य ऑब्जर्वर बनाया गया है, ये ओबीसी वोट बैंक को साधने का प्रयास है। इनके अलावा कांग्रेस के संकटमोचक व कर्नाटक के डिप्टी सीएम डी के शिवकुमार को प्रियंका के साथ रखा गया है, जो हर परिस्थिति को अनुकूल बनाने में माहिर माने जाते है। यह चुनाव प्रियंका की बड़ी परीक्षा है।
भाजपा भी सतर्क:
कांग्रेस की चुनावी गणित से भाजपा बेखबर नहीं है। उसने भी इस राज्य के लिए अभी से चुनावी रणनीति पर काम शुरू कर दिया है। गृहमन्त्री अमित शाह ने खुद इस राज्य की कमान संभाल ली है। पीएम मोदी भी अपने दौरे शुरू कर चुके है। मगर इतना तय है कि इस बार असम विधानसभा चुनाव में मुकाबला कांटे का होगा, किसी भी दल के लिए राह आसान नहीं होगी।