अपने बयानों से पार्टी में हलचल मचाने वाली राजे मौन कैसे ?, नपे तुले बोलने वाले गहलोत के अधिक बयान कैसे ?
राज्य की राजनीति में उथल पुथल के संकेत तो नहीं !
मधु आचार्य ' आशावादी '
RNE Special.
तेज गर्मी, लू के थपेड़ों के बीच इन दिनों राजस्थान गर्माया हुआ है। मौसम की इस मार में पानी व बिजली की कमी से भी लोग परेशान है। नहरबंदी ने तो पानी की बड़ी किल्लत को पैदा कर दिया था और 12 जिलों के लोगों को तो पानी की कालाबाजारी का शिकार होना पड़ा। अब नहरबंदी खत्म हुई है तो पानी की किल्लत भी कम होने की उम्मीद जगी है।
मगर बिजली को लेकर अब भी स्थिति को बेहतर या अच्छा नहीं कहा जा सकता। शहर हो या गांव, दोनों जगह बिजली की कमी का बोलबाला है। दरअसल, राज्य में गर्मी में प्रायः बिजली की कमी रहती ही है।
पानी - बिजली की कमी के बीच अगर लू के इस मौसम में किसी चीज की कमी नहीं है तो वह है, राजनीति की। राजनीति भरपूर हो रही है। उस पर न तो लू के थपेड़ों का असर है, न आंधी का, न पानी - बिजली का। यही तो राजनीति का कमाल है, वो विपरीत हालातों में भी खड़ी रहती है। कांग्रेस हो या भाजपा, या रालोपा, सभी इन दिनों बड़े राजनीतिक उथल पुथल में लगे हुए है। वजह है, स्थानीय निकाय व पंचायत राज चुनाव। सरकार का भी आधा कार्यकाल पूरा हो गया तो अगले विधानसभा चुनाव को लेकर भी चौसर बिछने लग गई है। यह चौसर अभी पार्टियों के भीतर अपनों के बीच बिछी है।
यकायक राजे का मौन होना ?
पिछले एक साल से अपने तंज के बयानों से भाजपा के भीतर खलबली मचा देने वाली पूर्व सीएम वसुंधरा राजे भी कुछ समय से मौन है। उन्होंने अंतिम बयान अपने क्षेत्र झालावाड़ की सभा मे दिया, काम होने से संबंधित। उसके बाद मदन राठौड़ का बयान और फिर राजे की सफाई भी। अशोक गहलोत व गोविंद डोटासरा ने राजे के उस बयान को हवा देने की खूब कोशिश की, मगर फिर वो मामला ठंडा हो गया।
उसके बाद से राजे कमोबेश चुप है। कोई नया बयान सामने नहीं आया। दो बड़े राजनीतिक निर्णय होने है। पहला तो राज्य मंत्रिमंडल का विस्तार व पुनर्गठन और दूसरा भाजपा की राष्ट्रीय कार्यकारिणी का गठन।
राज्य मंत्रिमंडल में भी राजे समर्थकों को जगह नहीं मिली है। 6 मंत्री पद खाली है और केंद्रीय नेतृत्त्व राजे समर्थक विधायकों को भी एडजेस्ट करने का कह चुका है। राजे समर्थक कालीचरण सर्राफ, श्रीचंद कृपलानी, पुष्पेंद्र सिंह , बाबूसिंह आदि के नाम संभावित मंत्रियों के रूप में लिए जा रहे है। चुप्पी का एक बड़ा कारण यह भी हो सकता है। मंत्रिमंडल विस्तार के अलावा केंद्र ने अब राजनीतिक नियुक्तियों के लिए भी सीएम भजनलाल को हरी झंडी दी है। आधा राज तो बीत गया। इन संभावित नियुक्तियों को लेकर भी राजे का मौन समझ आता है।
बंगाल, असम के चुनाव समाप्त हो गए। अब भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नवीन की टीम भी बननी है। उसमें भी राज्य से प्रतिनिधित्त्व होना है। राजे के मौन का एक बड़ा कारण यह भी हो सकता है।
गहलोत के बयानों की अधिकता:
राजस्थान की राजनीति में पूर्व मुख्यमंत्री अशोक गहलोत के बारे में यह कहा जाता है कि वो सोच समझकर बयान देते है। अधिक बोलते नहीं है और राजनीतिक संदर्भों को लेकर ही बयान अवसर पर दिया करते है। क्रिया - प्रतिक्रिया के बयानों से बचते है। मगर पिछले 6 महीनों ने उनकी ये छवि बदली है। अब वे बयान अधिक देने लग गए है और प्रतिक्रिया में भी बोलते है।
सबसे अधिक गौर करने वाली बात है कि हाल ही के उनके बयान, कहीं पे निगाहें - कहीं पे निशाना ' वाले अधिक है। वे प्रतिक्रिया तो दे रहे थे भाजपा के राज्य प्रभारी राधेमोहन के बयान पर, किंतु उसमें भी मानेसर प्रकरण ले आये। दो अन्य विषयों के बयान जो दे रहे थे भाजपा पर हमला करते हुए मगर जिक्र मानेसर का करने से नहीं चूके। कुल मिलाकर वे अपने बयानों में इन दिनों मानेसर के जरिये सचिन पायलट पर प्रहार करने से नहीं चूकते। सचिन अब सीडब्ल्यूसी के सदस्य है, कांग्रेस महासचिव है और इन दिनों गहलोत से ज्यादा आलाकमान के निकट है। जाहिर है, गहलोत उन पर बयान यूं ही तो नहीं दे रहे। हालांकि बताते है, आलाकमान के दखल के बाद इस तरह के बयान रुके है।
पायलट के मौन की भी कहानी !
भाजपा प्रदेश प्रभारी राधेमोहन ने सीधे सचिन पर उनके ही विधानसभा क्षेत्र टोंक में हमला किया। मगर उस पर भी पायलट ने नपी तुली प्रतिक्रिया शालीन भाषा मे दी। वे भी चाहते तो उसी भाषा में जवाब दे सकते थे, मगर शालीनता की या यूं कहें कि राष्ट्रीय नेता की छवि न छोड़ी।
लगातार पूर्व सीएम अशोक गहलोत भी मानेसर के जरिये पायलट पर हमला कर रहे है। बारबार यह साबित कर रहे है कि उस समय वे भटक गए थे। उनके इतने बयानों के बावजूद पूछने पर केवल इतना सा जवाब देते है कि गहलोत हमारे वरिष्ठ नेता है। हां, पायलट समर्थक विधायक मुकेश भाकर, अभिषेक पूनिया, रामनिवास गावड़िया आदि ने जरूर गहलोत के बयान का विरोध किया है और उन पर टिप्पणी भी की है।
पायलट इस विषय पर या तो मौन रहते है या फिर संयत भाषा में कुछ बोलते है। उससे लगता है कि यह भी उनका राजनीतिक कदम है। आलाकमान का निरंतर भरोसा जीतना इनका टारगेट है। कयास यह भी है कि राजस्थान कांग्रेस में संभावित बदलाव के कारण मौन है। अगले विधानसभा चुनाव को लेकर रणनीतिक मौन है।
उथल पुथल के तो संकेत नहीं:
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि राजे, गहलोत व पायलट की इन गतिविधियों को बड़ी रणनीति का हिस्सा मानना चाहिए। इनसे लगता है कि दोनों तरफ कुछ राजनीतिक उथल पुथल की संभावना बनी है। उसका ही ये रिफ्लेक्शन है।