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10 दिन के आवासीय शिविर का कैसे सही होगा उपयोग, कांग्रेस को क्यों लौटना पड़ रहा है पुरानी कल्चर की तरफ

सेवादल की इस कल्चर को भाजपा ने अपनाया, सफल रही
बड़े नेता ही पलीता लगाते है संगठन के कार्यक्रमों को
 

मधु आचार्य ' आशावादी '

RNE Special.
 

कांग्रेस एक समय में इस देश का सबसे बड़ा राजनीतिक संगठन था और उसके बाद भी बहुत ही करीने से चलता था। इसकी युवा, महिला, छात्र, सेवादल, किसान आदि शाखाएं भी थी जो अपना अपना काम पार्टी के निर्देशों के अनुसार किया करती थी। कांग्रेस संगठन के बराबर किसी भी दूसरे राजनीतिक दल का संगठन नहीं था।

कालांतर में सत्ता संगठन पर हावी हो गयी और कांग्रेस का संगठन अपनी सरकार का पिछलग्गू बनकर रह गया। संगठन का पदाधिकारी तो छोटा हो गया और मंत्री बड़ा हो गया। बस, तभी से संगठन का ढांचा पूरी तरह बिखर गया। यहां तक कि सेवादल जैसे मजबूत संगठन का ढांचा भी भरभराकर गिर गया।
 

मूल रूप से कांग्रेस उसी दिन से कमजोर होनी आरभहो गयी थी। बिखराव आने में कुछ वर्ष लगे पर इसकी नींव उसी दिन पड़ गयी जब सरकार संगठन पर हावी हो गयी। जब संगठन बिखरता है तो सरकारें भी नहीं बचती है, यह कांग्रेस सरकारों के पतन से हमारे सामने साबित हो गया है।

पुष्कर शिविर का कैसे होगा सही उपयोग:

कांग्रेस अब उस ढर्रे पर चल पड़ी है तो फिर फायदा कैसे होगा इन शिविरों का। अब बड़े नेता हावी हो गए है संगठन पर तो लाभ कैसे मिलेगा। हालांकि राहुल गांधी ने संगठन सृजन अभियान के तहत संगठन को बड़ा बनाने की कवायद फिर से शुरू की है, यदि बड़े नेताओं ने उनके विचारों को पलीता नहीं लगाया तो उनको सफलता मिल भी सकती है। 

पुष्कर में 10 दिन का आवासीय शिविर राजस्थान व दिल्ली के जिलाध्यक्षों का हो रहा है। राहुल इससे पहले हरियाणा, गुजरात, मध्यप्रदेश, जम्मू कश्मीर , पंजाब आदि के संगठन सृजन शिविर आयोजित कर चुके है, जिनके परिणाम बेहतर न सही, पर बुरे भी नहीं कहे जा सकते।
 

पुष्कर का जो शिविर है उसमें बूथ प्रबंधन, संगठन का ढांचा व चुनावी रणनीति पर विचार के लक्ष्य रखे गए है। उन पर गंभीरता से मंथन होना है और निष्कर्ष तक पहुंचना है। यहां राहुल गांधी खुद जिलाध्यक्षों से सीधे बात करेंगे। यह सत्र ज्यादा महत्त्वपूर्ण होगा।

इसी सत्र में केंद्रीय नेतृत्त्व तक यहां तक के नेताओं की गुटबाजी की असली तस्वीर पहुंचेगी। मतलब सच पहुंचेगा। यह एक अच्छा संकेत है। राहुल ने इस बार यह भी स्पष्ट किया है कि टिकट चयन में जिलाध्यक्षों की महत्ती भूमिका रहेगी, इससे भी बड़े नेताओं का रुख बदलेगा। वे इनकी उपेक्षा नहीं कर पायेंगे।

कांग्रेस आ रही पुरानी कल्चर पर:

इस तरह के आवासीय शिविरों का जरिये कांग्रेस अपनी पुरानी कल्चर की तरफ लौट रही है। क्योंकि उसे समझ आ गया कि कॉरपोरेट कम्पनी की तरह राजनीतिक दल को चलाया जाना संभव नहीं। राज के निकट पहुचना ही मुश्किल हो जाता है। कांग्रेस के साथ भी तो 12 साल से यही हो रहा है।

भाजपा ने कल्चर अपनाया, सफल रही:

भाजपा के पास आरएसएस जैसे संगठन का अनुभव था, उसे अपनाया और सांगठनिक ढांचे को मजबूत किया। सेवादल का स्वरूप भी देखा था, उससे भी अनुभव का लाभ लिया।

साफ है, संगठन को केवल चुनाव के समय सक्रिय नहीं रखती भाजपा। हर दिन सक्रिय रखती है। परिणाम हमारे सामने है।