छात्र आंदोलन का असर: मंत्री पद गया, अब संगठन में मिलेगी नई जिम्मेदारी?
मधु आचार्य ' आशावादी '
RNE Special.
केंद्र की मोदी सरकार के 12 साल के शासन के बाद पहली बार किसी मंत्री को आंदोलन के परिणाम स्वरूप मंत्री पद से त्यागपत्र देना पड़ा है। भाजपा को मजबूरीवश परिस्थियों के आंकलन के बाद यह निर्णय करना पड़ा।
जबकि इससे पहले जब भी विपक्ष किसी मंत्री के इस्तीफे की मांग करता तो उसे स्वीकारा ही नहीं जाता था। रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने तो एक बार मीडिया के सामने यह तक हंसकर कहा कि यह यूपीए सरकार नहीं है, एनडीए की सरकार है। इसमें मंत्रियों के इस्तीफे नहीं होते, यूपीए में होते थे।
मगर उनकी यह बात गलत साबित हुई। छात्र आंदोलन के दबाव में सरकार को केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफा लेने को मजबूर होना पड़ा। जाहिर है, भाजपा इससे भीतर ही भीतर कसमसा रही है। मगर युवाओं का आंदोलन हाथ से निकल जाए इस कारण पहली बार किसी मंत्री से इस्तीफा लिया गया।
अब आगे क्या होगा प्रधान का:
धर्मेंद्र प्रधान को पीएम नरेंद्र मोदी का सबसे विश्वसनीय माना जाता है। प्रधान ने अपना राजनीतिक सफर विद्यार्थी परिषद से आरम्भ किया था। वे अनेक राज्यों के प्रभारी रहे हैं। जहां सफलता पूर्वक उन्होंने संगठन का विस्तार भी किया।
प्रधान अनेक उन राज्यों में पार्टी की तरफ से चुनाव प्रभारी रहे, जहां भाजपा कमजोर स्थिति में थी। प्रधान ने अपने बूते ऐसे राज्यों का चुनाव प्रबंधन संभाला और पार्टी को सफलता दिलाई। जिनमें बिहार, महाराष्ट्र व उत्तर प्रदेश जैसे राज्य भी शामिल हैं। प्रधान के सांगठनिक कौशल की भाजपा कद्र करती रही है और उनको सदा मुश्किल टास्क देकर सफलता पाती रही है। प्रधान का पार्टी संगठन का काम सदैव चर्चित रहा है।
नितिन नवीन की टीम में जगह ?
राजनीतिक गलियारों में इस बात की चर्चा है कि धर्मेंद्र प्रधान को अब नितिन नवीन की टीम में महत्ती जिम्मेवारी मिल सकती है। पार्टी उनकी संगठन क्षमता का उपयोग करेगी।
अगले साल पंजाब सहित अनेक राज्य विधानसभाओं के चुनाव है, उनमें से मुश्किल राज्य की कमान उनको मिल सकती है। भाजपा ने संसद पहुंचने पर प्रधान का स्वागत करके यह तो स्पष्ट कर ही दिया कि उनके लिए प्रधान अब भी विशेष है। अभी तो छात्रों व युवाओं के गुस्से को शांत करने के लिए एकबारगी उनसे मंत्री पद से इस्तीफा लिया गया है।
अब उनके सामने चुनोती ज्यादा:
छात्र आंदोलन में निशाने पर आने और उनके दबाव में इस्तीफा देने के बाद धर्मेंद्र प्रधान का आगे का राजनीतिक सफर इतना आसान नहीं है। क्योंकि यह आंदोलन अब एक नजीर बन गया है और युवा व छात्र सड़क पर आ गया है।
ऐसे में जहां भी वे जाएंगे, उनको इनका तो सामना करना ही पड़ेगा। इस सूरत में पार्टी को उनको लेकर फूंक फूंककर कदम रखने की जरूरत है। एक भावभूमि भी पार्टी को उनके लिए तैयार करनी पड़ेगी। मगर प्रधान इस तरह की परिस्थियों से मुकाबला करेंगे, यह संकेत तो मिल रहे हैं। क्योंकि वे उस समय से पार्टी में सक्रिय हैं, जब पार्टी की शक्ति बहुत कम थी। उसके सांसद व विधायक भी कम थे। अब तो भाजपा बड़ी पार्टी है। इस बात से फिर भी इंकार नहीं किया जाना चाहिए कि उनकी आगे की राह कठिन जरूर है। क्योंकि विपक्ष इस मुद्दे को हर जगह उठायेगा।