{"vars":{"id": "127470:4976"}}

भाजपा की रणनीति के सामने विपक्ष पूरी तरह धराशायी, वाम दल सिमटने के बाद भी नहीं सुधरे

पहले आप, अब टीएमसी को अलग राह से झटका मिला
भाजपा की पूर्णकालिक राजनीति की सोच जीती है
 

मधु आचार्य ' आशावादी '

RNE Special.


5 राज्यों, असम, पश्चिमी बंगाल, तमिलनाडु, केरल व पुडुचेरी के चुनाव परिणाम कल आ गए। जिनको बहुमत मिलना था , मिला। उनकी जीत के अपने मायने है। जिनको हार मिली, उनकी अपनी ही वजहें है। कल के चुनाव परिणामों में तीन राज्यों असम, पश्चिम बंगाल व पुडुचेरी में भाजपा व एनडीए ने जीत हासिल की है तो केरल में कांग्रेस गठबन्धन ने। तमिलनाडु में पहली बार द्रविड़ राजनीति हार गई। वहां एक बार द्रमुक व एक बार अनाद्रमुक का शासन चलता था। मगर इस किले को भी इस बार दक्षिण के फिल्म स्टार विजय ने धराशायी कर दिया।

पहले 27 साल तक पश्चिम बंगाल में सीपीएम की अगुवाई में वाम दलों का राज रहा। उसे ममता दीदी ने हटाया। 15 साल के उनके राज को भाजपा ने हटाया। त्रिपुरा राज्य माकपा व वाम दल पहले ही हार चुके थे। उनके पास अंतिम राज्य केरलम बचा था। इस बार यहां भी कांग्रेस ने उनको सत्ता से बेदखल कर दिया। अब देश में कहीं भी वाम दलों का राज नहीं है।

कांग्रेस एक राज्य में और बढ़ी:

इस बार के विधानसभा  चुनावों से पहले कांग्रेस कर्नाटक, तेलंगाना व हिमाचल प्रदेश में राज था। अब उसके खाते में केरलम भी जुड़ गया है। अब देश के 4 राज्यों में कांग्रेस का शासन होगा। मगर इस बार के विधानसभा चुनाव परिणामों के बाद कांग्रेस को भी अपनी राजनीति के बारे में फिर से मंथन करना चाहिए। यदि नहीं किया तो भाजपा उसे धीरे धीरे बहुत ही सीमित कर देगी।

बंगाल, असम, तमिलनाडु बड़ा झटका:

विपक्ष की राजनीति को पश्चिम बंगाल, असम व तमिलनाडु के चुनाव परिणामों से बड़ा झटका लगा है। यहां की हार ने ही विपक्षी इंडिया गठबन्धन को झकझोर दिया है। यह प्रमाणित हो गया है कि एनडीए गठबंधन के सामने इंडिया गठबंधन बहुत विफल है। रणनीतिक आधार पर, एकजुटता के आधार पर और आपसी सामंजस्य के आधार पर। आपसी अहंकार की टकराहट से इंडिया गठबन्धन को ताकत होते हुए भी हार मिल रही है। यदि अहं की लड़ाई नहीं हटी तो गठबन्धन बिखर जायेगा या कभी भी एनडीए के सामने टिक नही पायेगा।

बंगाल सबसे बड़ा उदाहरण:

बंगाल में टीएमसी काफी अच्छी हालत में थी। ममता ने विधानसभा  चुनाव की घोषणा से पहले ही ऐलान कर दिया कि वो कांग्रेस से समझौता नहीं करेगी। जबकि कांग्रेस लोकसभा चुनाव से इस चुनाव तक सीटों के समझौते के प्रयास करती रही। टीएमसी उसे आंख दिखाती रही और इंकार करती रही। इतना ही नहीं लोकसभा चुनाव के बाद से तो टीएमसी इंडिया गठबन्धन का नेतृत्त्व भी ममता को देने के लिए लॉबिंग करने लग गयी थी।

 

हारकर कांग्रेस ने इस बार बंगाल में अकेले ही सभी सीटों पर चुनाव लड़ा। अच्छे वोट लिए और ये वोट कटे टीएमसी के। इन वोटों में बड़ा हिस्सा मुस्लिम वोट का भी था। ममता की हार का ये भी बड़ा कारण बना। जबकि दोनों इंडिया गठबंधन में ही है। इनको लड़ना भाजपा से था, मगर आपस में लड़े। परिणाम हार मिली, भाजपा जीत गयी।

असम की भी यही कहानी:

असम की कहानी भी काफी कुछ बंगाल की तरह ही है। यहां कांग्रेस पूरे दमखम से लड़ने उतरी मगर उसके सामने टीएमसी ने भी अपने उम्मीदवार उतार दिए। वोट कटे और कांग्रेस हार गई। भाजपा को दो तिहाई वोट मिले। यहां भी इंडिया गठबंधन के दल आपस में लड़े, भाजपा से नहीं लड़े। जबकि दिल्ली में आम आदमी पार्टी की हार का उदाहरण टीएमसी के सामने था। उसने कांग्रेस से सीट शेयरिंग नहीं की, परिणामस्वरूप दिल्ली की सत्ता गंवानी पड़ी। पहले हरियाणा में कांग्रेस को भी अहम के कारण हार मिली थी, तब उसने आप को तवज्जो नहीं दी थी।

वाम दल भी हार से नहीं सुधरे:

सीपीएम और सीपीआई, दोनों ही इंडिया गठबन्धन का हिस्सा है। इन वाम दलों का शासन केवल केरलम में रह गया था, वे पूरी तरह सिमट गये थे। फिर भी अपने में सुधार नहीं किया। लोकसभा चुनाव भी केरलम में कांग्रेस के खिलाफ लड़ा और हारे। विधानसभा में भी हारे। अब वाम दल किसी भी राज्य की सत्ता में नहीं।


भाजपा के सामने विफल:

इन 5 राज्यों के चुनाव परिणामो ने साफ कर दिया कि भाजपा की चुनावी रणनीति के सामने विपक्षी गठबन्धन की रणनीति पूरी तरह से विफल है। भाजपा का संगठन पूर्णकालिक कार्य करता है और हर राज्य में सक्रिय रहता है। विपक्ष के अनेक दलों की तरह केवल चुनाव से पहले सक्रिय नहीं होता। ये ही वृत्ति भाजपा को लगातार सफल कर रही है।