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पिछले सत्र में भी दोनों केवल एक - एक बार आये, इस बार गहलोत 50 मिनट व राजे 20 मिनट सदन में रही

भाजपा - कांग्रेस को नहीं मिला वरिष्ठ नेताओं का लाभ
 

मधु आचार्य ' आशावादी '

RNE Special.
 

विधानसभा का बजट सत्र 28 जनवरी से शुरू हुआ और 10 मार्च तक चला। बजट आने से पहले अवकाश भी रहा। इस बार बजट सत्र की कुल अवधि में विधानसभा की 24 बैठकें हुई। पक्ष व विपक्ष के बीच जबरदस्त टकराहट रही। अनेक बार हंगामा हुआ और विपक्ष ने सदन से बहिर्गमन भी किया। 

बहुत कुछ हुआ बजट के दौरान। वित्तीय वर्ष 2026 - 27 का बजट पारित हुआ। उस पर बहस हुई। कई विधेयक पारित हुए। कुल मिलाकर 24 दिन विधानसभा सक्रिय रही और उसकी बैठकें हुई। पिछ्ले और इस विधानसभा सत्र में सब कुछ बदलाव था, सिर्फ एक बदलाव नहीं हुआ।

जो नहीं बदला, वह था विधानसभा में कांग्रेस के पूर्व मुख्यमंत्री अशोक गहलोत व भाजपा की पूर्व मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे की सदन में उपस्थिति। पिछले सत्र में भी दोनों नेता एक - एक बार सदन में आये और इस बार भी एक - एक बार आये। ये एक समानता की बात थी, जिसकी राजनीतिक गलियारों में बड़ी चर्चा है।

राजे - गहलोत एक - एक दिन:

बजट सत्र में उस बार विधानसभा की कुल 24 बैठकें हुई। मगर पूर्व मुख्यमंत्री अशोक गहलोत केवल एक दिन 23 फरवरी को सदन में आये। वे सदन में लगभग 50 मिनट रुके। प्रश्नकाल के दौरान वे सदन में उस दिन बैठे। सीएम के 5 साल बनाम 2 साल के चैलेंज का यह अगला दिन था। गहलोत सदन के भीतर 50 मिनट बैठे। फिर बाहर आये और प्रेस से बात करके निकल गये।

इससे अगले दिन यानी 24 फरवरी को पूर्व मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे विधानसभा पहुंची। इस दिन शाम के समय राजे विधानसभा आई। सदन के भीतर करीब 20 मिनट बैठी। बाद में विधायकों से मिली और निकल गयी। 
 

गहलोत और राजे, वर्तमान में सरदारपुरा व झालरापाटन से विधायक है। मगर इन दोनों नेताओं ने विधानसभा में न तो कोई सवाल लगाया और न ही किसी चर्चा में भाग लिया। इस बार बजट सत्र में भाजपा के 9 व कांग्रेस के 7 विधायक सवालों से दूर रहे। जिनमे गहलोत व राजे शामिल है।

पार्टियों को नहीं मिला लाभ:

एक तरह से इस सदन में पूर्व मुख्यमंत्री होने के नाते संसदीय कार्यों, प्रशासनिक कार्यों व सरकारी योजनाओं की वास्तविकता की सर्वाधिक जानकारी गहलोत व राजे को है। उन्होंने सरकार चलाई है।

मगर कांग्रेस को गहलोत का व भाजपा को राजे के अनुभव का कोई लाभ नहीं मिला। अगर सदन में यह दोनों नेता रहते तो विधायकों में भी एक तरह से उल्लेखनीय अनुशासन आता। 
 

सरकार व उसके मंत्री अनेक बार विपक्ष के सवालों पर घिरे और जवाब भी सही नहीं दे पाए। यदि राजे उपस्थित रहती तो स्थितियों को आसानी से संभाल सकती थी। ठीक इसी तरह यदि गहलोत उपस्थित रहते तो 5 साल बनाम 2 साल पर अच्छी बहस होती। विपक्ष को बारबार बहिर्गमन व शोर नहीं करना पड़ता। गहलोत की वरिष्ठता से विपक्ष की आवाज बुलंद होती।