क्या यह सॉफ्टनेस किसी रणनीति का हिस्सा तो नहीं, वसुंधरा भी उनके बयानों पर रिएक्ट क्यों नहीं करती
कुछ न कुछ तो राजनीति छिपी है इस एजेंडे में
मधु आचार्य ' आशावादी '
RNE Special.
राजस्थान की राजनीति वसुंधरा राजे के बिना आज भी अधूरी लगती है। शायद इसी वजह से कांग्रेस के दिग्गज नेताओं की जुबान पर भी उनका ही नाम रहता है। तो दूसरी तरफ, वसुंधरा राजे खुद अपने इन दिनों के बयानों से चर्चा के केंद्र में आई हुई है। उनके बयान पिछले एक साल से बहुत सुर्खियां बटोर रहे है।
बात इतनी भर भी होती तो ठीक है, मगर इस बात पर विराम यहीं नहीं लगा है। उनके बयानों में ' कहीं पे निगाहें, कहीं पे निशाना ' वाली बात भी होती है। वो भी ऐसी बात कि चोट किसको की गई है, यह पता होता है, मगर चोट खाने वाला और उसके साथ वाला, बोल भी नहीं पाते है। यहां तक कि सरकार के हिस्सेदार व पार्टी संगठन के अगुआ लोग भी मन मारकर चुप रह जाते है। क्योंकि बयान में सीधा सीधा कुछ भी नहीं होता। इसके अलावा पार्टी के लोग कुछ बोलकर रिस्क लेने से भी बचते है।
मगर, वसुंधरा राजे को मुख्य विपक्षी दल कांग्रेस के बड़े नेताओं का साथ अवश्य मिलता है। वे अपनी पहल से राजे के समर्थन में तुरंत बोल उठते है। उनके शासनकाल मे उनका तीखा विरोध करने वाले कांग्रेस नेता भी इन दिनों उनके प्रति सहानुभूति के और उनके बयानों का समर्थन करते नजर आते है। इस बदलाव की राजनीतिक हलकों में बड़ी चर्चा है। सबके मन में यह जानने का कौतूहल है कि कांग्रेस के ये नेता ऐसा आखिर कर क्यों रहे है। इस यक्ष प्रश्न का उत्तर तलाशने में पूरा सियासी गलियारा लगा हुआ है।
सपा सुप्रीमो अखिलेश का बयान:
अभी थोड़े दिन पहले सपा सुप्रीमो व यूपी के पूर्व सीएम अखिलेश यादव भी राजस्थान के दौरे पर आये। पत्रकारों एक सवाल पर उन्होंने भी कहा कि यदि राज्य की मुख्यमंत्री वसुंधरा होती तो राजस्थान में शासन बेहतर होता और विकास के भी काम होते। अब अखिलेश के बयान पर भाजपा नेता क्या बोले, उनकी समझ में ही नहीं आ रहा।
वसुंधरा का ताजा प्रसंग:
हाल ही में वसुंधरा राजे ने अपने क्षेत्र के एक कार्यक्रम में मीडिया रिपोर्ट के अनुसार यह कह दिया कि मेरा ही काम नहीं हो रहा तो मैं आपके काम क्या कराऊं। खबरों में यह भी बता दिया कि उन्होंने कहा कि मैं तो अपनी कुर्सी तक नहीं बचा सकी।
यह खबर अखबारों की सुर्खियां बनी। भाजपा संगठन व सरकार भी भीतर तक हिल गये। अगले दिन भाजपा प्रदेशाध्यक्ष मदन राठौड़ बीकानेर आये हुए थे। मीडिया ने इस मुद्दे पर उनको घेरा तो बोलना पड़ा कि हर कोई पार्टी में बारबार मुख्यमंत्री बने, यह जरूरी नहीं। राठौड़ ने उस बात को भी खारिज करते हुए कहा कि राज में वसुंधरा जी के काम हो रहे है। आज ही थोड़ी देर पहले मेरी उनसे बात हुई है।
बस, सियासत शुरू हो गयी। राठौड़ के जवाब के बाद राजे ने स्पष्ट किया कि मैंने इस तरह की बातें कही ही नहीं जो खबरों में आई। उन्होंने खबरों में आई सभी बातों और राठौड़ के जवाब पर स्पष्टीकरण दिया।
राज्य में एक बार फिर सियासत गर्मा गयी। कई तरह के कयास लगाए जाने लगे। राजे के पूर्व के बयानों का हवाला दिया जाने लगा। भाजपा में अंदरखाने एक बड़ी हकचल होनी थी और वो हुई भी।
गहलोत ने राजनीति गर्माई:
इन दिनों पूर्व सीएम अशोक गहलोत भी अपने बयानों के कारण सुर्खियों में है। वे अपने बयानों से कोई न कोई नया विवाद कर सरकार पर हमला करने से नहीं चूकते।
इस प्रसंग में भी वे बोले कि वसुंधरा जी को अपने बयान पर सफाई देने की जरूरत ही नहीं थी। उनकी बात अपनी जगह थी, मदन राठौड़ की बात अपनी जगह। इस बयान ने राजनीति को और गर्मा दिया। जिसकी अभी तक सियासी गलियारे को गर्म रखे हुए है।
राजे पर यह सॉफ्टनेस क्यों ?
विधानसभा में भी अनेक बार पीसीसी चीफ गोविंद डोटासरा अपने वक्तव्य में वसुंधरा के प्रति सॉफ्टनेस दिखा चुके है। अशोक गहलोत तो अक्सर अपने बयानो में राजे के साथ खड़े दिखते है। ये दोनों नेता भाजपा, सीएम व सरकार के मंत्रियों पर तो सदा प्रहार करते है मगर राजे के प्रति सॉफ्ट ही रहते है। राजनीति के जानकर अभी तक इस सॉफ्टनेस की वजह लाख कोशिशों के बाद भी पता नहीं लगा सके है।
कुछ न कुछ राजनीति है इसमें !
गहलोत और डोटासरा वसुंधरा राजे को लेकर जिस तरह से सॉफ्ट है, उसके पीछे कुछ न कुछ तो वजह है, इससे कोई भी जानकर इंकार नहीं कर सकता। राजनीति के जानकारों का मानना है कि इस सॉफ्टनेस की अपनी एक रणनीति है, जो भले ही अभी समझ न आये।
आश्चर्य तो इस बात का है कि जब जब गहलोत व डोटासरा राजे के पक्ष में बोलते है, तब तब उनके बयानों पर राजे चुप रहती है। कुछ भी प्रतिक्रिया नहीं देती। ये बात भी राजनीति के जानकारों को अचंभे में डाले हुए है। इस कारण ये कहा जाता है कि अशोक गहलोत व गोविंद डोटासरा, साथ मे वसुंधरा राजे भी, किसी न किसी रणनीति के तहत ही अपने को रोके हुए है। राजनीति अपनी जगह, मगर रणनीति भी अपनी जगह रहती है।
पायलट को तो विचलित नहीं कर रहे:
एक कयास लगाया जा रहा है। पूर्व डिप्टी सीएम व कांग्रेस महासचिव सचिन पायलट जब राजे सीएम थी तब प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष थे। उन्होंने राजे व उनकी सरकार के खिलाफ खूब आंदोलन किये। प्रदर्शन किए। पायलट से गहलोत की बनती नहीं। डोटासरा से भी अच्छे संबंध पहले तो नहीं थे। कयास ये लगाया जा रहा है कि पायलट को राजनीतिक रूप से विचलित करने के लिए भी राजे के प्रति यह सॉफ्टनेस हो सकती है। पर ये यक्ष प्रश्न है अनुत्तरित ही।