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अनेक ऐसे लोग दावा कर रहे जिनको वार्ड में 100 वोट मिलने मुश्किल, खुद का वार्ड अनारक्षित नहीं, अकड़ ये कि दूसरे वार्ड से जीतेंगे

बाहरी उम्मीदवारों को पार्टी वाले ही घेरेंगे
 

मधु आचार्य ' आशावादी '

RNE Special.
 

स्थानीय सरकार के चुनाव की धमक दिन ब दिन बढ़ती ही जा रही है। हर पान की, चाय की दुकान पर, गलियों में बस नगर निगम के चुनाव की ही बात हो रही है। लोग बाकी सब चर्चाएं छोड़ चुके। शहर के पाटों पर पहले जहां हर दिन डोनाल्ड ट्रम्प की नीतियों का पोस्टमार्टम होता था, वो भी अब तो बन्द हो गया है। अब कोई भी ट्रम्प की धमकियों की बात नहीं करता, वो तो बागियों को पार्टियों को दी जा रही धमकियों की बात करने में तन्मयता से लगा है।

इस बार नगर निगम में मेयर का पद अनारक्षित है, इस कारण महापौर की चर्चा ज्यादा ही हो रही है। जो नेता विधायक का टिकट लेने में फिस्सडी साबित हुए, उनको अब महापौर की कुर्सी में अटकी अपनी आत्मा दिख रही है। मन भटक रहा है, उनकी छटपटाहट सोशल मीडिया पर साफ साफ नजर आ रही है। वे दबाव देकर अपने रिश्तेदारों व मित्रों से अपने पक्ष में सोशल मीडिया पर एआई से पोस्ट बनवाकर डलवा रहे हैं। वे बेचारे अनमने मन से पोस्ट डाल भी रहे हैं। सफेद कड़प के कुर्ते पायजामे को धारण कर शहर में और इंगित वार्ड में बिना मतलब बाइक लेकर फर्राटे भर लोगों का ध्यान खींचने की कोशिश कर रहे हैं। भले ही लोग उनको न देखे, भले ही जाने के बाद खिल्ली उड़ाए। ऐसे दावेदारों का बोलबाला दोनों ही पार्टियों में है। 

ये शहर के लोगों के मनोरंजन का भी साधन बन रहे हैं। लोग इनको रोककर इनकी झूठी तारीफों के पुल बांधते हैं और उनकी कार्ययोजना पूछते हैं। वे भी बेसिरपैर की योजनाएं बता खुद ही हंसी का पात्र बन रहे हैं। कई तो ऐसे है जो अधिकतर भाजपा के लोगों के साथ समय बिताते हैं पर दावा कांग्रेस से कर रहे हैं। ठीक इसी तरह कुछ कांग्रेस वालों के साथ रहते हैं और दावा भाजपा से कर रहे हैं। ऐसे ही मसखरों का ज्यादा बोलबाला है। लोग भी इनको मसखरी में लेते हैं, यह इनको पता ही नहीं है।

कुछ ऐसे जिनको 100 वोट वार्ड में मिलने मुश्किल:

इन मेयर के दावेदारों में कुछ तो ऐसे हैं जिनको यदि पहले वार्ड पार्षद का टिकट मिले तो उनको अपने वार्ड में 100 वोट भी मुश्किल से मिलने निश्चित है। मतलब यह कि पार्षद बनना मुश्किल है, मगर दावा महापौर का है। अब इन कड़प छाप नेताओं को कौन समझाए कि मेयर बनने के लिए पहले पार्षद का चुनाव जीतना जरूरी है। 

 

वोट का शतक नहीं लगेगा, यह भीतरखाने उनको भी पता है। मगर फिर भी वे दावे करते रह रहे हैं, क्योंकि उनको तो अपनी राजनीति का खोमचा चलाये रखना है, लोगों में नेता होने का भ्रम बनाये रखना है। ये ही तो उनके बने होने की बडी जरूरत है।

दूसरे वार्ड को लेकर दिखा रहे अकड़:

यह एक बड़ा तथ्य है कि दोनों पार्टियों के जो लोग महापौर की दावेदारी कर रहे हैं, उनके अपने वार्ड अन्य जातियों के लिए आरक्षित हो गए हैं। इस सूरत में वे अपने वार्ड में तो लड़ ही नहीं सकते। इस सूरत में वे दूसरे ऐसे वार्ड तलाश रहे हैं जो उनको अपने लिए मुफीद समझते हैं।

 

राजनीति में एक बात कई बार कही गयी है कि उधारी पर चुनाव नहीं जीते जाते। इस सूरत में वे अकड़ किस बात की दिखा रहे हैं, यह उनको समझ ही नहीं आ रहा। बाहरी का मुद्दा राजनीति में सबसे ज्यादा प्रभावी रहता ही है। इस वजह से इन दावेदारों की भी हवा निकलती नजर आ रही है।

बाहरी को पार्टी वाले ही घेरेंगे:

भाजपा और कांग्रेस के अनेक वार्ड पार्षद के दावेदारों से बात हुई तो उन्होंने साफ साफ कहा कि यदि हमारे वार्ड में बाहरी उम्मीदवार आया तो हम उसके सामने बागी होकर लड़ेंगे। हम भले ही न जीतें, उनको तो जीतने नहीं देंगे। पार्टी को पहले चेतायेंगे, फिर भी पार्टी नहीं मानी तो उस उम्मीदवार को हरायेंगे, भले ही वो पार्टी के सिंबल पर लड़ रहा हो। 

मुद्दे की बात यह है कि इस बार पार्टियों का खेल बागी व निर्दलीय खराब करेंगे। तभी तो लोग यह कहने से अभी बच रहे हैं कि इस बार किसका बोर्ड बनेगा। अभी तो चुनावी रंग चढ़ा है, देखते हैं वो रंग निखरता है या नहीं।