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उम्मीदवार चयन में पार्टियां रख रही है जातीय समीकरणों का ध्यान, आजादी के 80 वें साल में तो यह सब त्यागों माननीयों

पार्टियां गलती करे, तो जनता को हक़ है उसे सुधारने का, ध्यान रखना
 
 

मधु आचार्य ' आशावादी '

RNE Special.
 

15 अगस्त 1947 को देश आजाद हुआ तब भारत में रहने वाले हर भारतीय ने सुकून महसूस किया और ठंडी सांस ली। उस दिन से उसे अहसास हुआ कि यह देश मेरा है। इसकी जमीन, इसका आकाश और इसकी हवाएं मेरे लिए है। इन पर हर भारतीय का अधिकार है। हम भारतवासियों को इस बात का अहसास है कि आजादी कितने लम्बे संघर्ष के बाद मिली है। अनेकों भारतीयों ने इसके लिए अपने प्राण न्यौछावर किये।

हिन्दू हो या मुस्लिम, सिक्ख हो या ईसाई, पारसी हो जैनी, सभी ने मिलकर आजादी की लड़ाई लड़ी। आजादी के संघर्ष में उन्होंने जाति, धर्म, सम्प्रदाय नहीं देखा, केवल भारत देश देखा, जो हर भारतीय के दिल में बसता था।
आखिरकार 15 अगस्त 1947 को भारत आजाद हो गया। देश में अनेक जातियां, धर्म, संस्कृति थी, उन सबको भारत ने स्वीकार किया और देश को लोकतंत्र के सिद्धांत के जरिये चलाने की सहमति बनाई। उस समय के प्रकांड विद्वान व कानून की पढ़ाई पढ़े हुए बाबा साहेब भीमराव अंबेडकर की अगुवाई में देश के लिए संविधान बनाने का काम शुरू हुआ। इस कठिन काम को बाबा साहेब ने पूरा किया और 26 जनवरी 1950 को देश में संविधान लागू हो गया। वह दिन हमारा गणतंत्र दिवस बना। अब उस दिन लागू हुए संविधान से ही देश चलता है। संविधान हमारे लिए गीता है, बाइबिल है, कुरान है, गुरु ग्रंथसाहिब है, मतलब सबसे पवित्र और महान है।


सरकार का आधार भी यही:

अब देश में केंद्र सरकार, राज्यों में विधानसभा के जरिये राज्य सरकार, शहरों में निकाय चुनाव के जरिये स्थानीय सरकार और गांवों में पंचायत व जिला परिषद के जरिये गांव की सरकार चुनी जाती है। निर्धारित अवधि के बाद चुनाव होते हैं, सरकार अच्छी हो तो जनता वोट देकर फिर से चुन लेती है। सरकार से लोग संतुष्ट न हो तो लोग विरोध में वोट देकर उसे कुर्सी को उतार देते हैं, दूसरे को सरकार सौंप देते हैं।

यह स्वाभाविक प्रक्रिया है। पडौसी मुल्कों की तरह बंदूक या विरोध के जरिये भारत मे सरकारें नही बदली जाती, एक वोट के जरिये सरकार को बदल दिया जाता है। बड़ी स्वस्थ परम्परा है, तभी तो भारत के लोकतंत्र को दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र कहा जाता है।

अब आयी है इसमें कुछ खामियां:

बाबा साहेब भीमराव अंबेडकर ने संविधान में धर्म, जाति को लेकर कोई विभेद नहीं रखा। सभी धर्मों के लोगों को अपने अपने धर्म की पालना का अधिकार दिया। धर्म को राजनीति से न जोड़ने की बड़ी व्यवस्था की। लोग काफी वर्षों तक इसी व्यवस्था को लेकर जी रहे थे। अपने अपने धर्म का पालन भी कर रहे थे और सरकार का चुनाव भी कर रहे थे।

मगर पिछले कुछ वर्षों में इस व्यवस्था में कुछ खामियां आ गयी। अब ये खामियां इतनी बड़ी हो गयी है कि चिंताजनक स्थिति बन गयी है। हर दल ने अंदरखाने से राजनीति के लिए धर्म, जाति, सम्प्रदाय का सहारा लेना शुरू कर दिया है। जनता के वोट पाने का उनको यह आसन तरीका जो लगा। इस चिंता से अब हर भारतवासी ग्रसित है।

बात निकाय चुनावों की:

पहले निकाय चुनाव दलीय आधार पर नहीं होते थे। तब वार्डवासी अपनी पसंद के उस व्यक्ति को पार्षद चुनते थे जो सेवा का भाव रखता था। उसकी जाति क्या है, धर्म कौनसा है, किस सम्प्रदाय से आता है, यह कोई नहीं देखता था। क्योंकि उस समय इन सबको लेकर व्यक्ति - व्यक्ति के बीच दूरी ही नहीं थी। निकाय चुनाव से राजनीतिक दल एक तरह से दूर का रिश्ता रखते थे। 

 

मगर कहते हैं ना कि राजनीति करने वाले को हर जगह राजनीति करने की लत पड़ जाती है। वो तो किसी जाति के ट्रस्ट तक में राजनीति के लिए उतर जाता है। वार्ड तो फिर बहुत बड़ी बात है। पिछले 30 साल से स्थानीय निकाय के चुनाव भी पूरी तरह से राजनीति के गिरफ्त में आ गए हैं और यहां भी धर्म, जाति और संप्रदाय की बातें होने लग गयी है। यह स्थानीय सरकार की दृष्टि से चिंता की बात तो है ही।

टिकट का आधार ही जाति बन गयी:

जहां पहले जाति , धर्म को अवॉयड किया जाता था, वहीं अब टिकट देने या मिलने का आधार ही जाति बन गयी है। राजनीतिक पार्टियां जब टिकट के लिए आवेदन लेती है तो टिकट की चाह रखने वाले से यह भी पूछती है कि उसके वार्ड में उसकी जाति के वोट कितने है। उसको टिकट देने का बड़ा आधार माना जाता है।

यही नहीं, जब इन राजनीतिक दल की तरफ से लोग वार्ड में सर्वे के लिए जाते हैं तो भी पहला कॉलम यही होता कि वार्ड में कौन कौन से जातियां है और उनके कितने कितने वोट हैं।
 

इस बार भी पार्षद के टिकट का वितरण दोनों पार्टियां जाति को आधार बनाकर कर रही है। उनकी नजर अच्छे और सच्चे लोगों को पार्षद बनाना नहीं, अपितु जीतने वाले को पार्षद बनाना है। ये आधार सही और उचित तो नहीं। तभी तो बाद में ठेकेदारों की शिकायत आती है कि पार्षद वार्ड में काम करते हैं तो एवज में पैसे मांगते हैं। यदि पार्षदों की सेवा न की जाए तो वे शिकायत कर ठेकेदार का भुगतान रुकवा देते हैं। हम बबूल का बीज बोकर आम के फल की कामना करते हैं तो हम मूर्ख ही हुए।

पार्टियों की गलती को जनता सुधारे:

राजनीतिक दल तो धड़ाधड़ गलती कर ही रहे हैं। जाति, धर्म को आधार बनाकर टिकट दे ही रहे हैं, इस बार भी ये लोग तो यही करेंगे। मगर अवसर जनता के हाथ में है, इस गलती को वो सुधार सकती है। पार्टियों के सामने अपने वार्ड के योग्य उम्मीदवार को उतार पार्टियों को शिकस्त दे सकती है। सच मानिये, एक बार जनता ने पार्टियों की इस गलती को सुधार दिया, सबक सीखा दिया तो भविष्य में वे इस तरह की गलती करने की हिमाकत नहीं करेंगे। बस, एक बार साहस दिखाना जरूरी है, उसके लिए दलीय राजनीति से ऊपर उठना पड़ेगा, अच्छे काम के लिए यह भी कर लेना चाहिए।

 

साथ ही हे माननीयों ! अब हम आजादी के 80 वें साल में है। आप भी अपने को सुधारिये। इस आधार को हटाएं, ये राजनीति का ककहरा सीखने के चुनाव है, यहीं से स्वस्थ शुरुआत कीजिये। आपको भी जनता सिर आंखों पर बिठाएगी। एक बार यह साहस भी करके देखिए। आप लोगों को भी शुकुन मिलेगा।